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नवग्रहों की महादशा का सटीक फलादेश: जानें कौन सा ग्रह चमकाएगा आपकी किस्मत? | गोचर में

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महामहोपाध्याय आचार्य रामेश्वर झा और कश्मीर शैव दर्शन: अद्वैत शिवत्व एवं संपूर्ण जीवनी

मुख्य पृष्ठ > अध्यात्म > कश्मीर शैव दर्शन एवं आचार्य रामेश्वर झा महामहोपाध्याय आचार्य रामेश्वर झा: कश्मीर शैव दर्शन, अद्वैत शिवत्व और संपूर्ण जीवन गाथा Rameshwar Jha Shiv Yogi (शिव योगी) आधुनिक आध्यात्मिक जगत में एक अत्यंत दुर्लभ व्यक्तित्व थे। वे एक ऐसे प्रकांड विद्वान थे जिन्होंने अपनी पारंपरिक शास्त्रीय शिक्षा को कभी भी अपनी आत्मिक प्राप्ति (Spiritual Realization) में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने अद्वैत और अद्वैतवादी कश्मीर शैव दर्शन (Kashmir Shaivism) के गूढ़ रहस्यों को अपनी अनुभवात्मक दृष्टि (Experiential Learning) से सरल बनाकर जन-जन तक पहुँचाया। चित्र: गुरुजी रामेश्वर झा (ध्यानमग्न अवस्था) प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और वाराणसी का अकादमिक उत्कर्ष अपनी युवावस्था में रामेश्वर झा ने पाणिनी के व्याकरण, अद्वैत वेदांत और योग का गहन अध्ययन योग्य गुरुओं के सान्निध्य में किया था। वे बचपन से ही एक असाधारण मेधावी छात्र थे और उन्होंने संस्कृत में अपनी उच्च शिक्षा प्रथम श्र...

ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य! श्रीमद भगवद गीता अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Bhagavad Gita Ch 15)

श्रीमद भगवद गीता: अध्याय १५ - पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) चेतावनी: यह अध्याय आपके जीवन और मृत्यु के प्रति देखने के नज़रिए को हमेशा के लिए बदल देगा! क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन और इस विशाल ब्रह्मांड का वास्तविक रहस्य क्या है? दुनिया के भ्रमजाल में फँसा मनुष्य अक्सर अपनी उत्पत्ति और गंतव्य को भूल जाता है। भगवद गीता का पंद्रहवाँ अध्याय—पुरुषोत्तम योग —मनुष्य की चेतना को झकझोरने वाला वह परम ज्ञान है, जो इस रहस्यमयी दुनिया को एक उल्टे पीपल के पेड़ (अश्वत्थ वृक्ष) के रूप में परिभाषित करता है। यदि आप जीवन के चक्र, कर्म, और आत्मा के परमात्मा से मिलन को समझना चाहते हैं , तो यह अध्याय आपकी आध्यात्मिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। जीवन की अनिश्चितताओं के बीच प्रश्न कुंडली (Prashna Kundali) के माध्यम से अचूक मार्गदर्शन पाने वाले जिज्ञासुओं के लिए, यह योग यह स्पष्ट करता है कि हमारा अंतिम लक्ष्य और उत्तर केवल उस 'पुरुषोत्तम' (परम पुरुष) में निहित...

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हस्त सामुद्रिक रहस्यम्: सम्पूर्ण हस्त रेखा ज्ञान (ब्रह्म विद्या)

हस्त सामुद्रिक रहस्यम्: सम्पूर्ण हस्त रेखा ज्ञान (ब्रह्म विद्या)   हस्त- सामुद्रिक रहस्यम् ब्रह्म विद्या (रेखा) आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च |  पञ्चैतान्यापि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः || अर्थात्  आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पञ्च गर्भ में ही जातको को विधाता दे देते है |                     हस्त रेखा विज्ञान का वास्ताविक नाम सामुद्रिक शास्त्र है | इसके दो भेद माने जाते है, उनमे से प्रथम भाग हाथ , अंगुली और हथेली आदि की बनावट है और दूसरा मणिबंध और मस्तक रेखा आदि पर पड़ीं रेखाओं का ज्ञान है | सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार चार प्रकार के पुरुष होते है-  अथ शशकादितुर्यपुरुषाणां जीवन चरित्राणि :-  1. शशक पुरुष सुन्दर सुविचार से युक्त ६ फिट से उपर के होते थे, 2. मृग सुडौल सुन्दर सद्विचार से युक्त ६ फिट के होते है, ३ . तुरंग पुरुष माध्यम विचार और सुन्दर ५ /३० के होते है और ४ . बृषभ पुरुष (अधम पुरुष) जो बहुसख्यक सामान्य सकल, अधम विचार वाले ५ - ५ 1/2  फिट ...

10 प्राण और उपप्राण (The 10 Pranas): शरीर में स्थान, कार्य और रहस्य | Dhananjay Pran & Vayu

शरीर के 10 प्राण: स्थान, कार्य और रहस्य (The 10 Pranas) By Astrologer Dr. Sunil Nath Jha (Vedic & Medical Astrologer) उत्तर तथा पश्चिम दिशा के मध्य कोण को वायव्य (North-West) कहते है। इस दिशा का स्वामी या देवता 'वायुदेव' है। वायु पञ्च होते है:- प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान। हर एक मनुष्य के जीवन के लिए पाँचों में एक प्राण परम आवश्यकता होता है। पांचो का शरीर में रहने का स्थान अलग-अलग जगह पर होता है। हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है, उसका नाम ‘प्राण’ (Vital Life Force) है। शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियां, नेत्र-श्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा अन्य सब अवयव-अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों को करते है। Quick Guide: 5 मुख्य प्राणों के स्थान (Summary Table) प्राण का नाम (Name) स्थान (Location) मुख्य कार्य (Function) 1. प्राण (Prana) नासिका से हृदय तक (Chest area) ...

Wealth & Profession Astrology: दशम भाव और धन प्राप्ति के अचूक ज्योतिषीय योग

Wealth & Profession Through Astrology आपका धनागम वा व्यवसाय चुनाव कुण्डली में धन योग और माता लक्ष्मी की कृपा " सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलं अर्थः | वृत्ति मूलं अर्थः अर्थ मूलौ धर्मकामौ || आयुः कर्म च वित्तं विद्या निधनमेव च | पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः || धनमाजर्य काकुत्स्थ धन मूल मिदं जगत् | अन्तर ना भी जानाति निर्धनस्य मृत्स्य च || " जातक के व्यवसायों (Profession) के प्रकार का निर्णय ग्रहों की स्वरुप, बल आदि पर निर्भर करता है | जो ग्रह अत्यधिक बलवान् होकर लग्न , लग्नेश आदि आजीविका के द्योत्तक भाव पर प्रभाव डालता है | अतः ग्रहों के स्वरुप का ज्ञान आजीविका के निर्णय करने के लिए अत्यावश्यक है | अतः धन ही कमाना हर कार्य का प्रथम उदेश्य रहता है | जातक का व्यवसाय profession सभी आचार्यों वराह मिहिर, पराशर और कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने दशम भाव (10th House) की ओर संकेत किया है | हमारा मत है ...