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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रश्न कुण्डली (Horary Astrology): जीवन के हर अनसुलझे सवाल का सटीक ज्योतिषीय समाधान

Palmistry - हस्त ज्योतिष - सामुद्रिकरहस्यम् By Astrologer Dr. Sunil Nath Jha

हस्त-ज्योतिष - PALMISTRY सामुद्रिकरहस्यम् ज्योतिष विद्या वह दिव्य विज्ञान है जो भूत, वर्त्तमान और भविष्य तीनों कालों को जानने की कला सिखलाता है | उस में से एक “ हस्त-रेखा ” या “ सामुद्रिकरहस्यम् ” भी  है मनुष्य में भविष्य जानने की इच्छा होती है I जातक की भविष्य देखेने की भिन्न भिन्न विधायें  भिन्न भिन्न देश , काल व सस्कृति के कारण भिन्न भिन्न रूप में परिष्कृत हुई ,परन्तु आज भी मानव सस्कृति-सभ्यता के सामने अनुत्तरित खड़ा है |  वह यह है कि भविष्य को जान लेने के बाद क्या भविष्य बदला जा सकता है तो मैं यह कह सकता हूं कि:-  भगवान् ! “आत्मा”- को जिस कुल ,जाति और धर्म में भेजते है उसका निर्धारण “गर्भधारण” के समय जो निर्धारित (कुंडली या हस्त में) करते है वैसे ही “शीर्षोदय” के बाद जीवन भर शुभाशुभ भोगना पड़ता है :---   “ आयुः कर्मं च वितं च विद्यानिधन मेव I पंञ्चैतान्यायं सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः II अर्थात् -- इसका अर्थ है कि आपको वर्त्तमान (तात्कालिक)  समय कुण्डली या हाथ में सब कुछ निर्धारित कर दिया गया हैं | उसके माध्यम से सारे कार्यक्रम मिल गया है | इस कुंडली य...

Vastu Shastra Architecture Tips by Dr. Sunil Nath Jha | Vasturahasyam

Vasturahasyam -वास्तुरहस्यम् ARCHITECTURE & IMPORTANT POINTS (2) By Astrologer Dr. Sunil Nath Jha “ श्रीवास्तुदेवताभ्योनमः“ ↈ वास्तुरहस्यम् ↈ ARCHITECTURE & IMPORTANT POINTS  “ श्रीनमश्चण्डिकायैः“ ↈↈↈ ↈↈ ↈ   लेखक :--संकलनकर्ता   तथा संपादक डॉ सुनील नाथ झा , ज्योतिषाचार्य गणित एंव फलित , एम 0 ए 0,  साहित्याचार्य , व्याख्याता- ज्योतिर्विज्ञानविभाग , लखनऊ विश्वविद्यालय ,  लखनऊ | प्राक्कथन   वास्तु विद्या   बहुत प्राचीन विद्या है । विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। वास्तु से वास्तु विशेष की क्या स्थित होनी चाहिए। उसका विवरण प्राप्त होता है। श्रेष्ठ वातावरण और श्रेष्ठ परिणाम के लिए श्रेष्ठ वास्तु के अनुसार जीवनशैली और गृह का निर्माण अति आवश्यक है। जिस देवताओं ने उसको अधोमुख करके दबा रखा था , वह देवता उसके उसी अंग पर निवास करने लगा। सभी देवताओं के निवास करने के कारण वह वास्तुनाम से प्रसिद्ध हुआ। इनके ये अठारह वास्तुशास्त्र केउपदेषटा है:----   “ भृगुरत्रिर्वसिष्ठविशवक...

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हस्त सामुद्रिक रहस्यम्: सम्पूर्ण हस्त रेखा ज्ञान (ब्रह्म विद्या)

हस्त सामुद्रिक रहस्यम्: सम्पूर्ण हस्त रेखा ज्ञान (ब्रह्म विद्या)   हस्त- सामुद्रिक रहस्यम् ब्रह्म विद्या (रेखा) आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च |  पञ्चैतान्यापि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः || अर्थात्  आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पञ्च गर्भ में ही जातको को विधाता दे देते है |                     हस्त रेखा विज्ञान का वास्ताविक नाम सामुद्रिक शास्त्र है | इसके दो भेद माने जाते है, उनमे से प्रथम भाग हाथ , अंगुली और हथेली आदि की बनावट है और दूसरा मणिबंध और मस्तक रेखा आदि पर पड़ीं रेखाओं का ज्ञान है | सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार चार प्रकार के पुरुष होते है-  अथ शशकादितुर्यपुरुषाणां जीवन चरित्राणि :-  1. शशक पुरुष सुन्दर सुविचार से युक्त ६ फिट से उपर के होते थे, 2. मृग सुडौल सुन्दर सद्विचार से युक्त ६ फिट के होते है, ३ . तुरंग पुरुष माध्यम विचार और सुन्दर ५ /३० के होते है और ४ . बृषभ पुरुष (अधम पुरुष) जो बहुसख्यक सामान्य सकल, अधम विचार वाले ५ - ५ 1/2  फिट ...

Tripataki Chakra Vedh: त्रिपताकी चक्र वेध से ग्रहों का शुभाशुभ विचार | Dr. Sunil Nath Jha

भारतीय ज्योतिष शास्त्र (Indian Astrology) में जन्म कुंडली के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए कई चक्रों का उपयोग किया जाता है, जिनमें से Tripataki Chakra (त्रिपताकी चक्र) सबसे महत्वपूर्ण है। अक्सर लोग इसे बोलचाल की भाषा में Tipayi Cycle या Tipai Cycle के नाम से भी खोजते हैं, लेकिन इसका शुद्ध ज्योतिषीय नाम 'त्रिपताकी चक्र' है। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य Dr. Sunil Nath Jha द्वारा प्रस्तुत यह लेख आपको Tripataki Chakra Vedh की गणना, वेध दोष और ग्रहों के शुभाशुभ प्रभाव को समझने में मदद करेगा। यदि आप ज्योतिष के मूल आधार को समझना चाहते हैं, तो पहले ज्योतिष शास्त्र का परिचय (Jyotish Shastra) अवश्य पढ़ें। 1. त्रिपताकी चक्र क्या है? (Tripataki Chakra in Hindi) Tripataki Chakra Meaning: यह एक विशेष ज्योतिषीय चार्ट है जिसका उपयोग मुख्य रूप से 'बालारिष्ट' (बच्चों के स्वास्थ्य संकट) और जीवन में आने वाले अचानक संकटों (Vedh) को देखने के लिए किया जाता है। इसमें ग्रहों की एक विशेष ज्यामितीय स्थिति (Geometry) बनाई जाती है जिससे यह पता चल...

10 प्राण और उपप्राण (The 10 Pranas): शरीर में स्थान, कार्य और रहस्य | Dhananjay Pran & Vayu

शरीर के 10 प्राण: स्थान, कार्य और रहस्य (The 10 Pranas) By Astrologer Dr. Sunil Nath Jha (Vedic & Medical Astrologer) उत्तर तथा पश्चिम दिशा के मध्य कोण को वायव्य (North-West) कहते है। इस दिशा का स्वामी या देवता 'वायुदेव' है। वायु पञ्च होते है:- प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान। हर एक मनुष्य के जीवन के लिए पाँचों में एक प्राण परम आवश्यकता होता है। पांचो का शरीर में रहने का स्थान अलग-अलग जगह पर होता है। हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है, उसका नाम ‘प्राण’ (Vital Life Force) है। शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियां, नेत्र-श्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा अन्य सब अवयव-अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों को करते है। Quick Guide: 5 मुख्य प्राणों के स्थान (Summary Table) प्राण का नाम (Name) स्थान (Location) मुख्य कार्य (Function) 1. प्राण (Prana) नासिका से हृदय तक (Chest area) ...