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ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य! श्रीमद भगवद गीता अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Bhagavad Gita Ch 15)

ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य! श्रीमद भगवद गीता अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Bhagavad Gita Ch 15)

श्रीमद भगवद गीता: अध्याय १५ - पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)

चेतावनी: यह अध्याय आपके जीवन और मृत्यु के प्रति देखने के नज़रिए को हमेशा के लिए बदल देगा!

क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन और इस विशाल ब्रह्मांड का वास्तविक रहस्य क्या है? दुनिया के भ्रमजाल में फँसा मनुष्य अक्सर अपनी उत्पत्ति और गंतव्य को भूल जाता है। भगवद गीता का पंद्रहवाँ अध्याय—पुरुषोत्तम योग—मनुष्य की चेतना को झकझोरने वाला वह परम ज्ञान है, जो इस रहस्यमयी दुनिया को एक उल्टे पीपल के पेड़ (अश्वत्थ वृक्ष) के रूप में परिभाषित करता है।

यदि आप जीवन के चक्र, कर्म, और आत्मा के परमात्मा से मिलन को समझना चाहते हैं, तो यह अध्याय आपकी आध्यात्मिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। जीवन की अनिश्चितताओं के बीच प्रश्न कुंडली (Prashna Kundali) के माध्यम से अचूक मार्गदर्शन पाने वाले जिज्ञासुओं के लिए, यह योग यह स्पष्ट करता है कि हमारा अंतिम लक्ष्य और उत्तर केवल उस 'पुरुषोत्तम' (परम पुरुष) में निहित है।

Bhagavad Gita Chapter 15 Purushottama Yoga Infographic Hindi Ashvattha Tree
चित्र: भगवद गीता अध्याय १५ - पुरुषोत्तम योग का प्रतीकात्मक अश्वत्थ वृक्ष और आत्मा-परमात्मा का गूढ़ संबंध।

(संसार रूपी वृक्ष का वर्णन)

श्रीभगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥ (१)

भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। (१)

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ (२)

भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बंधन उत्पन्न करती हैं। (२)

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ (३)

भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृढ़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है। (३)

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ (४)

भावार्थ : वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य (परमात्मा) के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये, जिस परमात्मा से इस आदि-रहित संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार होता है। (४)

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌ ॥ (५)

भावार्थ : जो मनुष्य मान-प्रतिष्ठा और मोह से मुक्त है तथा जिसने सांसारिक विषयों में लिप्त मनुष्यों की संगति को त्याग दिया है, जो निरन्तर परमात्म स्वरूप में स्थित रहता है, जिसकी सांसारिक कामनाएँ पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है और जिसका सुख-दुःख नाम का भेद समाप्त हो गया है ऎसा मोह से मुक्त हुआ मनुष्य उस अविनाशी परम-पद (परम-धाम) को प्राप्त करता हैं। (५)

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ (६)

भावार्थ : उस परम-धाम को न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा प्रकाशित करता है और न ही अग्नि प्रकाशित करती है, जहाँ पहुँचकर कोई भी मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आता है वही मेरा परम-धाम है। (६)

(जीव और आत्मा का वर्णन)

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ (७)

भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है। (७)

आध्यात्मिक चिंतन 💡: जब हम जीवात्मा के इस सनातन अंश को पहचानते हैं, तब जीवन में वास्तविक शांति का उदय होता है। सहज आत्मा से साधना (Astrology & Spirituality) की प्रक्रिया इसी ईश्वरीय अंश को जाग्रत कर शाश्वत शांति प्राप्त करने का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग है। श्री कृष्ण के प्रति इसी अनन्य प्रेम और समर्पण को श्री कृष्ण पर आधारित हिंदी कविता (Hindi Poem on Shri Krishna) के माध्यम से भी गहराई से महसूस किया जा सकता है।

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌ ॥ (८)

भावार्थ : शरीर का स्वामी जीवात्मा छहों इन्द्रियों के कार्यों को संस्कार रूप में ग्रहण करके एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से ग्रहण करके दूसरे स्थान में ले जाती है। (८)

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ (९)

भावार्थ : इस प्रकार दूसरे शरीर में स्थित होकर जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन की सहायता से ही विषयों का भोग करता है। (९)

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ (१०)

भावार्थ : जीवात्मा शरीर का किस प्रकार त्याग कर सकती है, किस प्रकार शरीर में स्थित रहती है और किस प्रकार प्रकृति के गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग करती है, मूर्ख मनुष्य कभी भी इस प्रक्रिया को नहीं देख पाते हैं केवल वही मनुष्य देख पाते हैं जिनकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो गयी हैं। (१०)

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ (११)

भावार्थ : योग के अभ्यास में प्रयत्नशील मनुष्य ही अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख सकते हैं, किन्तु जो मनुष्य योग के अभ्यास में नहीं लगे हैं ऐसे अज्ञानी प्रयत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते हैं। (११)

(जगत में परमात्मा की स्थिति का वर्णन)

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌ ॥ (१२)

भावार्थ : हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ। (१२)

वैदिक ज्योतिष रहस्य 🔭: सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश का यही ईश्वरीय अंश ज्योतिष शास्त्र में राशियों और ग्रहों का मूल है। वैदिक ज्योतिष में राशि का वैज्ञानिक अर्थ (Scientific Meaning of Rashi) इसी दिव्य तेज के ब्रह्मांडीय वितरण और मानव चेतना पर उसके प्रभाव का अति गहन अध्ययन है।

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ (१३)

भावार्थ : मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणियों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणियों का पोषण करता हूँ। (१३)

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌ ॥ (१४)

भावार्थ : मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ। (१४)

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥ (१5)

भावार्थ : मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों को जानने वाला हूँ। (१५)

(शरीर, आत्मा और परमात्मा का वर्णन)

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (१६)

भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है। (१६)

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ (१७)

भावार्थ : परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणियों का भरण-पोषण करता है। (१७)

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ (१८)

भावार्थ : क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ। (१८)

कृष्ण की विराट सत्ता ⚡: भगवान के इसी उग्र, परम और परमेश्वर रूप के दर्शन और उस चेतावनी को समझने के लिए कृष्ण की चेतावनी (Krishna ki Chetawani) का पाठ अवश्य करें। यह पुरुषोत्तम की शक्ति का ही साहित्यिक और वीर रस से भरा रूप है।

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ (१९)

भावार्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है। (१९)

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (२०)

भावार्थ : हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं। (२०)


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥

इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में पुरुषोत्तम-योग नाम का पंद्रहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ ॥

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

Bhagavad Gita 18 Chapters Teachings Krishna Arjuna Key Verses Hindi Master Guide
चित्र: भगवद गीता के १८ अध्याय एवं श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद के मुख्य उपदेश।

निष्कर्ष: पुरुषोत्तम की शरणागति और सर्वोच्च भक्ति

पुरुषोत्तम योग (अध्याय १५) हमें यह सिखाता है कि यह संसार एक नाशवान अश्वत्थ वृक्ष है जिसे अनासक्ति (वैराग्य) के शस्त्र से काटना अत्यंत आवश्यक है। केवल सर्वोच्च सत्य 'पुरुषोत्तम' की पहचान और उनकी निर्मल भक्ति ही हमें जन्म-मृत्यु के इस विकराल चक्र से बाहर निकाल सकती है।

सच्ची भक्ति की अथाह शक्ति क्या होती है, इसे हम भारतीय साहित्य और भजनों में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। जिस प्रकार मीरा बाई ने सांसारिक मोह को त्याग कर कृष्ण को अपनाया—जिसका अत्यंत गहन और भावुक वर्णन "माई म्हानें सुपन्या में परण्या दीनानाथ" (Meera Bai Bhajan) में मिलता है—उसी प्रकार सच्ची श्रद्धा हमें सीधे परमात्मा के निकट ले जाती है। इसी निश्छल भक्ति का एक और अद्वितीय उदाहरण सुदामा का चरित्र है, जहाँ स्वयं त्रिलोकीनाथ अपने मित्र के स्वागत के लिए नंगे पाँव दौड़े आते हैं, जिसे "दर पे सुदामा गरीब आ गया है" (Bhajan Lyrics) में बहुत ही मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।

अतः, पुरुषोत्तम योग का परम सार यही है कि जो जीव संशय रहित होकर ईश्वर को 'परम पुरुष' मानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है और सर्वभाव से प्रभु का ही भजन करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: भगवद गीता के अध्याय 15 का मुख्य विषय क्या है?

उत्तर: 15वें अध्याय, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है, का मुख्य विषय संसार रूपी उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वर्णन, आत्मा के स्वरूप और क्षर (नाशवान) तथा अक्षर (अविनाशी) से परे परम सत्ता 'पुरुषोत्तम' की व्याख्या करना है।

प्रश्न 2: अश्वत्थ वृक्ष को उल्टे रूप में क्यों दर्शाया गया है?

उत्तर: इसकी जड़ें ऊपर (परमात्मा) की ओर हैं और शाखाएँ नीचे (भौतिक जगत) की ओर। यह दर्शाता है कि भौतिक संसार का उद्गम परमेश्वर से होता है, और जीव अपनी सकाम कर्मों की जड़ों के कारण नीचे के लोकों में फँस जाता है।

प्रश्न 3: 'पुरुषोत्तम' का क्या अर्थ है?

उत्तर: पुरुषोत्तम का अर्थ है 'सर्वोच्च पुरुष'। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को क्षर (भौतिक शरीर) और अक्षर (मुक्तात्मा) दोनों से श्रेष्ठ बताते हैं, इसलिए उन्हें वेदों और संसार में पुरुषोत्तम कहा गया है।

वीडियो: अध्याय 15 - पुरुषोत्तम योग (संपूर्ण श्लोक पाठ)

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