प्रश्नाध्याय – प्रश्न कुण्डली (Prashna Kundali): अचूक ज्योतिषीय रहस्य
भावैर्विचार्य विषयान् जानीयात् प्राग् बुधस्ततः |
बलाऽबलविवेकेन शुभाऽशुभफलं दिशेत् ||
स्वरुपलक्षणं प्रश्न- कर्तुर्दुःखसुखे तनोः |
रत्नाना लाभहानी तु धनस्थानात् विचिन्तयेत् ||
ज्योतिषशास्त्र पुराण गणकैरादेश इत्युच्यते अर्थात् ज्योतिषशास्त्र ज्ञान का आदेशात्मक शास्त्र है। मानव स्वभाव से ही अत्यंत जिज्ञासु होता है। वह अपने वर्तमान एवं भविष्य से सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता है तथा उसके समाधान के लिए ज्योतिष की सहायता चाहता है।
✍️ लेखक परिचय: डॉ. सुनील नाथ झा
डॉ. सुनील नाथ झा एक प्रख्यात ज्योतिषी, अंकशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, वास्तुकार और व्याख्याता हैं। वे 1998 से ज्योतिष, अंक ज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान और वास्तुकला की शिक्षा व अभ्यास कर रहे हैं। डॉ. झा ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान तथा लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। उन्होंने वास्तुकला और ज्योतिष पर "वास्तुरहस्यम्" और "ज्योतिषतत्त्वविमर्श" नामक दो बहुचर्चित पुस्तकें लिखी हैं, तथा "संस्कृत व्याकर-सारः" और "ललितासहस्रनाम" का सफल संपादन भी किया है।
ज्योतिषियों के लिए फलादेश के नियम
अतः ज्योतिषियों को प्रश्नों का फलादेश करने से पहले जातक को पहचान लेना चाहिए; यदि प्रश्न कर्ता ठग, शठ, नास्तिक और निंदक हो तो उसके समक्ष इस शास्त्र का ज्ञान प्रकाशित नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धावान् हो, उसी को प्रश्नों का उत्तरित करना चाहिए। प्रश्न कर्ता अंग स्पर्श करते हुए प्रश्न करता हो तो उसके शुभाशुभ का निर्णय लेना चाहिए और अभीष्ट सिद्धि होती है।
प्रश्न के प्रारंभ में सूर्याधिष्ठित राशि से प्रश्न लग्न पर्यन्त गिनती करने पर विषम अंक निकले तो शुभ माना जाता है, सम अंक हो तो अशुभ का सूचक होता है।
लग्नेश की स्थिति: लग्नेश जहाँ है उसका स्वामी यदि शुभ भाव में हो तो शुभ कार्य की सिद्धि होती है। यदि नीच का हो, शत्रु भाव का हो, अस्तंगत हो अथवा षष्ठ, अष्टम या द्वादश अशुभ भाव में हो तो कार्य की सिद्धि नहीं होती। लग्न या चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो शुभ, पाप ग्रह की दृष्टि हो तो अशुभ होता है।
यदि विषम राशि लग्न हो उसपर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो शुभ, यदि पाप ग्रह की दृष्टि हो अशुभ फल होगा। यदि लग्न चतुष्पद प्रथम, द्वितीय, पञ्चम और दशम भाव तथा धनु का परार्द्ध लग्न हो अथवा द्विपद राशि तृतीय, षष्ठ और सप्तम, धनु का पूवार्द्ध लग्न हो उसपर पाप ग्रह हो या दृष्टि हो तो अशुभ फल देता है। यदि सिंह लग्न हो उच्चस्थ ग्रह है, नीच सिंह लग्न हो उच्चस्थ ग्रह अन्य शुभ ग्रहों को देखता हो तो प्रश्न कर्त्ता को सुख, धन और राज्य वृद्धि की प्राप्ति होती है।
नीच राशि में स्थित, अस्त, पापयुक्त, शत्रु से हारा, रुक्ष, बलहीन, अल्प (०-५ अंश) हो या शेष अल्प (२५-३०अंश) हो ऐसा ग्रह कुछ भी काम करने में समर्थ नहीं होता है। जो ग्रह पाप ग्रह के साथ हो, ग्रह के आगे पीछे भाव में पाप ग्रह हो, रश्मि हीन हों उन्हें नष्ट ग्रह खा जाता है।
✨ ग्रहों के हर्ष स्थान (Joy of Planets)
कुंडली में गुरु एकादश भाव में हों, बुध लग्न में, चन्द्र तृतीय भाव, सूर्य दशम भाव, शनि व्यय भाव, मंगल षष्ठ भाव, शुक्र पञ्चम भाव में और सब ग्रहों का अपना भाव हर्ष स्थान होता है। सूर्य लग्न में, चन्द्र २, ४, १० भाव में, मंगल सप्तम में, बुध चतुर्थ में, शनि नवम भाव में हर्ष दायक रहता है।
प्रश्न कुण्डली में 12 भावों का सूक्ष्म विचार
तिथि प्रहर संयुक्त स्तारका वार मिश्रिताः |
सप्तभिश्चाहरेद भागम शेषंचैव शुभाशुभम् ||
प्रथमे संस्थिति तव द्वाभ्यांआगमनं भवेत् ||
त्रितिये चार्द्धमार्गस्थश्चतुर्थ यानमादिशेत् |
पञ्चमे पुनरावृत्ति षष्ठे व्याधिं विनिर्दिशेत् |
शुन्य शून्यं विजानीयात् शास्दावचनं यथो ||
अर्थात् परदेशी या कोई वस्तु पर विचार प्रश्न लग्न से शुभ ग्रहों के अनुसार गुरु और शुक्र यात्रा या प्रिय वस्तु के लिए समय के तिथि, प्रहर, नक्षत्र, वार के योग में ७ का भाग दें। १ शेष में अपने स्थान पर, २ शेष में आगमन, ३ शेष में आधे रास्ते में, ४ शेष में सवारी पर, ५ शेष में पुनः लौट गये, ६ शेष में रोगी और ७ शेष यानि ० शेष में शून्य फल (यानि जहाँ है वहीँ है) जानना चाहिए।
जिस भाव का प्रश्न है, उस भाव को लग्न मानना चाहिए। भूतकाल के प्रश्न का द्वादश भाव से और भविष्य प्रश्न का द्वितीय भाव से विचार करना चाहिए। पशु का विचार सप्तम भाव से, मित्र का चतुर्थ भाव से, व्यापार और झगड़े का विचार सप्तम भाव से, वाद-विवाद का विचार एकादश भाव से, यात्रा का विचार सप्तम भाव से, रोग अथवा व्याधि का विचार सप्तम भाव से, रोगी का विचार दशम भाव से, चोर का विचार सप्तम भाव से, चोरी हुए द्रव्य का विचार चतुर्थ भाव से, किसान का विचार लग्न से, खेत का विचार चतुर्थ भाव से, कृषि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिए।
महत्वपूर्ण नियम: लग्नेश खरीददार है, लाभेश बेचने वाला है। लाभ एकादश भाव है। अर्थात् प्रश्न में किस भाव से किस सम्बन्ध में विचार किया जाना चाहिए, वे इस प्रकार हैं:
- 🔴 प्रथम भाव: शरीर सम्बन्धित प्रश्न, सुख, आयु, स्वास्थ्य, साहस, गुण, क्लेश, आकृति, यश आदि।
- 🔴 द्वितीय भाव: परिवार, धन, सुनार सम्बंधित समान, वस्त्र, मित्र, वाणी, दक्षिण नेत्र, क्रय-विक्रय, मार्ग सम्बन्धित कार्य।
- 🔴 तृतीय भाव: पराक्रम, पत्र-पत्रिका, लेखन कार्य, तार, चिठ्ठी, धैर्य, शौर्य, छोटे भाई-बहन, लघु यात्रा, नौकर और सहायक।
- 🔴 चतुर्थ भाव: घर, सवारी, सुख, माता, जमीन, खलिहान, धरोहर, गड़ा धन, सुरंग, बगीचा, खेती, औषधि, आसन, लालित्य और गृह प्रवेश।
- 🔴 पञ्चम भाव: विद्या, बुद्धि, विवेक, शक्ति, विनय, नीति, मैत्री, गर्भ, संतान, सब प्रकार कलाए, प्रबंध, शासन, कविता लिखना, शिक्षा-दीक्षा।
- 🔴 षष्ठ भाव: मानसिक कष्ट, भौतिक कष्ट, नैतिक कष्ट, व्यवहारिक कष्ट, आर्थिक कष्ट, शत्रु, रोग, भय, क्रूर कर्म, युद्ध, आतंक, ताप, शंका, विघ्न, व्याधि और ऋण।
- 🔴 सप्तम भाव: व्यवसाय, विवाह, प्रेम, खोई हुई वस्तु या चोरी का विचार, मिलाप, दूसरों से विवाद, यात्रा।
- 🔴 अष्टम भाव: मार्ग संकट, स्त्री धन, रोग, मृत्यु, आयु विचार, जीवन संकट, जल/जीव-जन्तु से कष्ट, भूत-प्रेतादिक कष्ट, अपशकुन, विपत्ति-आपदा।
- 🔴 नवम भाव: धर्म, कर्म, यज्ञ, तीर्थ यात्रा, गुरु, सौन्दर्य, मन्दिर, दीक्षा, विदेश यात्रा, दान, उपासना, सुशीलता, शुभ संस्कार।
- 🔴 दशम भाव: नौकरी, व्यवसाय, राज्य मुद्रा, विशेष पुण्य, विशिष्ट स्थान की प्राप्ति, प्रयोजन, नगर सभा और राजनीति।
- 🔴 एकादश भाव: व्यापार, धन लाभ, इच्छा, हाथी-घोड़े, सवारी, अन्न वस्त्र, पाण्डित्य, विद्या, पतोहू, साढू और दामाद।
- 🔴 द्वादश भाव: भोग, त्याग, विवाद, दान इष्टकर्म, खेती, उधार देना, सट्टे में घाटा, चोरी, लूटमार, विफलता, पाप, और स्थानान्तरण।
चोरी गई वस्तु, धन और चोर का ज्ञान (Stolen Items & Recovery)
क्या वस्तु चोरी हो गई? ➖ प्रश्न लग्न में जो ग्रह केंद्र में हो उसकी दिशा में चोरी की वस्तु को कहना चाहिए। यदि केंद्र में दो या अधिक ग्रह हो तो उनमें से जो बली हो, उस ग्रह की दिशा में धन या वस्तु या चोर का कहना चाहिए। यदि केंद्र में ग्रह नहीं हो तो लग्न राशि की दिशा में चोरी गयी वस्तु बतलानी चाहिए। सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो या लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो अथवा क्षीण चन्द्र सप्तम भाव में हो तो चोरी गयी या भूली हुई वस्तु मिलती नहीं।
लग्न पर सूर्य चन्द्र की दृष्टि हो तो आत्मीय चोर होता है। लग्नेश और सप्तमेश लग्न में हो तो कुटुम्ब का व्यक्ति चोर होता है। सप्तमेश द्वितीय भाव या द्वादश भाव में हो तो नौकर चोर होता है।
मेष प्रश्न लग्न हो तो ब्राह्मण चोर, वृष हो तो क्षत्रिय, मिथुन लग्न हो तो वैश्य चोर, कर्क लग्न हो तो शुद्र चोर, सिंह लग्न हो तो अन्त्यज चोर, कन्या लग्न हो तो स्त्री चोर, तुला लग्न हो तो पुत्र, भाई या मित्र चोर, वृश्चिक हो तो नौकर, धनु हो तो स्त्री या भाई चोर, मकर हो तो वैश्य, कुम्भ हो तो मनुष्येत्तर प्राणी चूहा आदि और मीन हो तो ऐसे ही भूली हुई समझना चाहिए।
प्रश्न लग्न राशि अनुसार चोर और वस्तु का विचार:
- मेष लग्न: चोरी की वस्तु पूर्व दिशा में समझनी चाहिए। चोर ब्राह्मण जाती का व्यक्ति होता है उसका नाम 'स' अक्षर से आरम्भ होता है।
- वृष प्रश्न लग्न: चोरी वस्तु पूर्व दिशा में ही समझनी चाहिए। चोरी करनेवाला व्यक्ति क्षत्रिय जाती का होता और उसके नाम में 'म' और चार अक्षर का रह सकता है।
- मिथुन प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु आग्नेय कोण में रहती है। चोरी करनेवाला व्यक्ति वैश्य वर्ण का होता है और उसका नाम ककार से युक्त तीन अक्षर वाला होता है।
- कर्क प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु दक्षिण दिशा में मिलती है। और चोरी करनेवाला शुद्र या अन्त्यज होता है इसका नाम तकार युक्त तीन वर्ण होता है।
- सिंह प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु नैऋत्य कोण में पायी जाती है। चोर नौकर या अन्त्यज होता है।
- कन्या प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु पश्चिम दिशा में समझनी चाहिए। स्त्री चोर होती मकार युक्त नाम वाली होती है।
- तुला प्रश्न लग्न: चोरी वस्तु पश्चिम दिशा में समझनी चाहिए घर के ही लोग होते हैं। इसका नाम मकार युक्त तीन वर्ण होता है।
चोर ज्ञान, नाम एवं स्वरुप
चोर ज्ञान :- यदि प्रश्न लग्न स्थिर राशि हो या स्थिर राशि के नवांश में प्रश्न लग्न हो अथवा अपने वर्गोत्तम नवांश की प्रश्न लग्न राशि हो तो बन्धु, स्वाजतीय, उच्च जातीय व्यक्ति या दास को चोर समझना। प्रश्न लग्न प्रथम द्रेष्काण में हो तो चोरी गयी वस्तु घर के द्वार के पास, द्वितीय द्रेष्कान में हो तो घर के मध्य में हो तथा तृतीय द्रेष्काण में हो तो घर के पीछे के भाग में होती है। प्रश्न लग्न में चन्द्र हो और गुरु की दृष्टि हो तथा शीर्षोदय राशि ३/ ५/ ६/ ७/ ८ और एकादश लग्न में हो तो तथा लग्न में बलवान् और शुभ ग्रह स्थित हों और लग्नेश, सप्तमेश, दशमेश, लाभेश, बलवान् चन्द्र परस्पर मित्र हों या इत्थाशाल आदि शुभ योग करते हो तो चोरी गयी वस्तु की पुनः प्राप्ति होती है।
चोरी वस्तु :- लग्न और लग्नेश में जो बली हो उस लग्न या लग्नेश का रुप ही वस्तु का रुप होगा। यथा लग्न और लग्नेश छोटा रुपवाला हो तो वस्तु भी छोटी होगी। यदि लग्न और लग्नेश बड़े रुपवाला हो तो वस्तु की आकृति बड़ी होगी। लग्न की राशि अथवा लग्न में जो ग्रह हो उससे नष्ट वस्तु की दिशा जाननी चाहिए।
चोर नाम :- आपको प्रश्न लग्न की राशि के अनुसार नाम जानना चाहिए। मेष लग्न हो और उस लग्न का मान ०/ ११/ १५ हो तो चोर के नाम का पहला अक्षर जानने के लिए होरा चक्र चु, चे, चो, ला, लि, लू, ले, लो, अ मेष राशि का वर्ण उल्लिखित है, लग्न का राश्यादि के अनुसार चोर के नाम का पहला अक्षर क्या होगा। इसके लिए नवांश का विचार करना चाहिए क्योंकि लग्न का चतुर्थ नवांश प्रश्न काल में व्यतीत हो रहा था। अतः चतुर्थ वर्ण 'ला' चोर के नाम का पहला अक्षर निकला।
चोर का स्वरुप :- प्रश्न कुण्डली में सप्तमेश चोर का रुप है। लग्न से चन्द्र जिस स्थान में हो वहां चोर का घर बतलाना चाहिए। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, मकर और धनु लग्न हो तो चोरी करने का समय रात बतलाना चाहिए। सप्तमेश स्त्री राशि में हो और स्त्री ग्रह से दृश्य हो तो चोर स्त्री है अन्यथा पुरुष है। बुध, शुक्र हो तो गर्भवती स्त्री, शनि हो तो वृद्ध स्त्री, मंगल हो तो मध्यावस्था की स्त्री चोर होती है।
🔍 चोरी हुई वस्तु कहाँ मिलेगी? (Recovery of Stolen Items)
आपका वस्तु चोरी हुई या क्या हुआ- इस प्रश्न के लिए लग्न द्रेष्काण से विचार करना चाहिए। प्रश्नकाल में यदि लग्न का प्रथम द्रेष्काण हो तो वस्तु की चोरी हुई, द्वितीय द्रेष्काण हो तो रस्ते में कही गिर गयी और तृतीय द्रेष्काण मर हो तो वस्तु खो गयी जानना चाहिए।
प्रश्न पर जब सूर्य और चन्द्र की दृष्टि हो और उसपर मित्रग्रह की दृष्टि हो तो नष्ट धन की प्राप्ति होती है। यदि चतुर्थ भाव का स्वामी अथवा चतुर्थ भाव का कारक चन्द्र चतुर्थ भाव में हो अथवा चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो नष्ट धन की प्राप्ति होती है। वह धन अपनी ही जगह होता है। स्व भाव से चोर की जगह है और अष्टम भाव धन की जगह है पर मंगल क्रूर ग्रह हो अथवा लग्न में राहू और अष्टम भाव में सूर्य हो तो धन नही मिलता है।
अन्य विचार :- वर्तमान सूर्य के नक्षत्र से प्रश्न काल के चन्द्र नक्षत्र तक गिनती करें प्रथम नौ नक्षत्र तक में उस दिन का नक्षत्र पड़ जाय तो गाड़ी जंगल में मिलता है, उसके बाद ६ नक्षत्रों में अपने इलाके के नजदीक या ग्राम के समीप मिलता है। उसके बाद के सात नक्षत्रों में स्वयं घर पर आ जाता है, उसके बाद के डॉन नक्षत्रों में नहीं मिलता अन्त के तीन नक्षत्रों में गाड़ी बर्वाद हो गई जानना चाहिए।
तिथिंवारं च नक्षत्रं प्रहरेण समन्वितम्... प्रश्न लग्न समय के तिथि, दिन, नक्षत्र और प्रहर का योग कर दश से गुणा कर सात का भाग दें। यदि शेष १ बचे तो पृथ्वी नीचे में, २ बचे तो किसी वस्तु में, ३ बचे तो जल में, ४ बचे तो आकाश मकान पौधा के ऊपर में, ५ बचे तो तुषस्थ भूसा, बालू में, ६ बचे तो गोबर के ढे़र गोरहे, उपलों में, यदि ७ बचें तो धन घर से बाहर रखी गयी है।
प्रश्न लग्न यदि चर लग्न हो तो दूरदेश में धन गया होता है, स्थिर लग्न में घर में ही, द्विस्वभाव लग्न हो तो घर से बाहर वस्तु या धन होगा। प्रश्न लग्न से २/३/५ पञ्चम भावों में शुभ ग्रह हो तो परदेशी लौट आयेगा। खोई हुई वस्तु मिल जाएगी। उक्त भावों में गुरु और शुक्र स्थिति हो तो परदेशी और खोई वस्तु भी शीघ्र ही लौटेगा।
लग्न में चन्द्र हो तो पूर्व की ओर दशम भाव में हो तो दक्षिण की ओर, सप्तम भाव में हो तो पश्चिम को ओर और चतुर्थ भाव में हो तो उत्तर की ओर चोरी गयी वस्तु होती है या चोर या चोर का घर होता है। प्रश्न लग्न सूर्य और चन्द्र से विलोकित हो तो अपने घर का चोर होता है। लग्नेश सप्तम भाव में सप्तमेश लग्न में हो तो चोरी गयी वस्तु या धन मिल जाता है।
प्रश्न लग्न विचार और विविध कार्य सिद्धि
प्रश्न लग्न विचार :- वारर्क्षतिजि दिशा परिमिति संयोज्य नागैर्भजेतलब्धां फलञ्च नागनयने दोषं पितुश्वान्यथा... अर्थात् दिन, नक्षत्र, तिथि, दिशा की संख्या का योग करें ८ का भाग दें शेष के अनुसार फल होगें। यथा- ८/२ शेष रहने पर पैत्रिक दोष, ७/ ३ शेष में देव दोष, ६/ ४ शेष में प्रेत दोष, १/ ५ शेष में ग्रह दोष होता है।
- 👉 प्रश्न लग्न से अनेकों कार्यों में पहले किस कार्य की सिद्धि होगी: यदि लग्नेश शुभ ग्रह होकर केंद्र में हो तो पहले कार्य की पहले सिद्धि होती है दुसरे कार्यों की सिद्धि बाद में होता है।
- 👉 प्रश्न लग्न से धन ज्ञान: प्रश्न लग्न यदि चार हो तो दुर्दश में धन गया होता है, स्थिर लग्न में घर में ही सामान रहता है, द्विस्वभाव लग्न हो तो घर से बाहर धन होता है।
- 👉 प्रश्न लग्न से जीव जन्तु खो जाने पर मिलेगा या नहीं: प्रश्न लग्न द्वितीय या तृतीय भावों में से एक भाव में चुष्पद राशियों में से (मेष, २, ५ और मकर राशि) एक राकश हो और उसमे शुभ ग्रह हो तो पशु मिल सकता है।
बाधा ज्ञान (Obstacles & Curses):
मेषे च देवी दोषः स्याद्वृषे दोषश्च पैत्रिकः |
मिथुने शाकिनी दोषः कर्क ते भूत दोषकः ||
सिंघे सहोदाराणां वै कन्यायां कुलमातृजः |
तुले दोषश्चण्डिका या नाड़ी दोषों हि वृश्चिके ||
चापे च यक्षिणी पीड़ा कमरे ग्राम देवतात् |
अपुत्रा दृष्टिजः कुम्भे मीने आकाश गामिनः ||
अर्थात् मेष लग्न में देवी के दोष से मानसिक कष्ट, वृष लग्न में पैत्रिक दोष से शान्ति नहीं, मिथुन लग्न में शाकिनी के दोष उपद्रव होता है। कर्क लग्न से भूत दोष से थकावट रहता है, सिंह में अपने सहोदर भाई से, कन्या लग्न में वंश माता से, तुला लग्न में देवी दोष से, वृश्चिक लग्न में नाड़ी दोष से, धनु में यक्षिणी दोष से मकर लग्न में ग्राम देवता के दोष से कुम्भ में अपुत्र की दृष्टि दोष से और मीन में आकाश गामी ग्रहों के दोष से पीड़ा होती है।
वर्ष का शुभाशुभ ज्ञान:
प्रश्न समय की तिथि, दिन, नक्षत्र और योग के योग से संवत्सर की संख्या का योग करें योगफल में प्रश्न कर्त्ता के नाम की संख्या का योग करें उसमे तीन का भाग दें। एक शेष हो तो क्लेश, दो शेष हो तो मध्यम और तीन शेष रहे तो महान सुख होता है।
कार्य सिद्धि योग प्रश्न लग्न से:
लग्नेश और कार्येश लग्न में हो या कार्य भाव में हो और एक साथ हो तो कार्य की सिद्धि होती। कार्य सिद्धि के प्रश्न में यदि केंद्र एवं त्रिकोण में शुभ ग्रह हो, त्रिषडाय में पाप ग्रह हो तो सिद्धि होती है। इसमें चन्द्र की दृष्टि हो तो निश्चित रूप से कार्य की सिद्धि होती है।
प्रश्नकर्त्ता से १ से लेकर १०८ तक के अंकों में से कोई अंक मुख से कहनें। उस अंक को १२ से भाग दें। यदि शेष १, २ और ७ रहें तो कार्य सिद्धि देर से होती है। शेष ४, ५, ८ और १० हो तो कार्य सिद्धि नहीं होती है। ११ बचे तो सिद्धि, २ बचे तो वृद्धि और ३, ६ और १२ बचे तो शीघ्र सिद्धि कहना चाहिए।
दोस्ती होगी या नहीं :- प्रश्न लग्न का तिथियो, दिन नक्षत्र और जिससे दोस्ती करनी है उसका नामाक्षर के योग में ३ योग करें २ का भाग दे, शेष १ हो तो मैत्री होगी, २ हो तो नहीं होगी।
विवाह और सन्तान विचार (Marriage & Progeny)
लग्नेश सप्तमेश के स्फुटैक्य सही राशि में जब गोचर का गुरु पहुँचता है तब विवाह होता है। या चन्द्र राशि और लग्न के स्फुटैक्य में गुरु के जानेपर विवाह होता है। गुरु अपने मित्र के नवांश में बली हो विषम नवांश में हो तो विवाह होता है। अपने उच्च राशि के गुरु होने से २-३ विवाह या सम्बन्ध करा सकता है।
प्रश्न लग्न से २/ ३/ ६/ ७/ १० और एकादश भावों में चन्द्र को गुरु देखे तो विवाह होगा। यदि चन्द्र के साथ पाप ग्रह हों या पापग्रहों की दृष्टि हो तो विवाह नहीं होगा। यदि लग्न से ३/ ५/ ६/ ७/ और एकादश भावों में चन्द्र को सूर्य, बुध, गुरु इनमें से कोई ग्रह देखे अथवा व्ययेश, सप्तम भाव में और सप्तमेश लग्न में हो अथवा २/ ३/ और सप्तम भावों में से किसी एक भाव में चन्द्र या शुक्र हो तो अवश्य विवाह होगा।
प्रश्न कुंडली में शनि सम भाव में स्थित हो तो वर लड़के को कन्या मिलती है अन्यथा नहीं, चन्द्रमा और शुक्र विषम राशि या विषम नवांश में स्थित लग्न को देखें हो कन्या को वर मिलता है। कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा लग्न से सम भावों में स्थित हो तथा और पाप ग्रह से दृष्टि हो तो विवाह नहीं होता है।
विवाह प्रश्न में पूर्व रीती से पिण्डांग तैयार कर उसमे ८ का भाग दें १ शेष में विना यत्न से, २ शेष में अधिक यत्न से, ३ शेष नहों, ४ और ५ शेष में कन्या का मरण, ६ शेष में राजभय, ७ शेष में वर कन्या दोनों का मरण या श्वसुर का मृत्यु और ८ शेष हो तो विवाह से संतान का मरण कहना चाहिए।
जन्म पत्री पुरुष या स्त्री की है :- लग्न का अंक सूर्य, मंगल और राहू के राशि अंकों का पीछे का योग करें उसमे १ घटाकर ३ से भाग दें शेष ०/१ में पुरुष और दो शेष हो तो स्त्री की जन्मपत्री होती है।
संतान विचार (Progeny Astrology)
यदि प्रश्न लग्न का तिथि, वार, नक्षत्र गर्भिणी सस्त्री के नामाक्षर के योग करें उसमे ७ का भाग दें। शेष विषम अंक मिले तो पुत्र और सम अंक मिले तो कन्या कहना चाहिए। यदि सूर्य, गुरु, मंगल प्रथम भाव/ ३/ ७/ और पञ्चम भाव में हो तो गर्भ में लड़का होता है और दुसरे भावों में इनके होने से गर्भ में लडकी होती है।
प्रश्न लग्न से पञ्चम भाव में बुध या शुक्र हो तो जातक को कन्या होगी। लाभ भाव में चन्द्र हो तो कन्या होती है। लग्नेश की पञ्चम भाव में स्थिति और पंचमेश तथा गुरु का बलवान् होना भी संतति कारक योग बनाता है।
यदि पञ्चम भाव में सूर्य, मंगल, केतु और राहू तीनों हो तो सन्तान देर से होती है। यदि प्रश्न कुण्डली में चतुर्थ भाव में पाप ग्रह और पञ्चम भाव में गुरु हो तो सन्तान के अभाव का योग होता है। यदि तृतीय अष्टम भाव में शनि नीच न हो तो संतान नहीं होती। यदि द्वितीय पञ्चम या दशम भाव में मंगल हो तो पुत्रहीन योग बनता है। यदि पञ्चम भाव में शनि और राहू के साथ सूर्य हो तो सन्तान उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाते है।
संख्या- पुत्र या पुत्री ➖
अर्थात् प्रश्न लग्न, सूर्य, गुरु, चन्द्र विषम राशि में हो और पुरुष राशि मेष आदि के नवांश में हो बलयुक्त हो तो पुत्र जन्म होगा। यदि लग्न, चन्द्र, सूर्य, गुरु सम राशि वृष आदि में हो स्त्री राशि के नवांश में बलयुक्त हो तो अवश्य कन्या का जन्म कहना चाहिए।
यदि द्विस्वभाव राशि में हो और बुध पूर्ण दृष्टि से देखे तो यमल (जुड़वां) जोड़े होते है। विषम नवांश हो पुरुष ग्रहों से दृष्टि या संयोग बनने से पुत्र ही होगा। यदि लग्न को छोड़कर विषम राशि में शनि हो तो वह केवल पुत्र ही देता है।
आपके कुंडली में जब पञ्चम भाव में सूर्य या दो पुरुष ग्रह स्थित-दृष्टि हो तो एक या दो पुत्र, मंगल हो तो तीन पुत्र, गुरु हो तो पञ्चम पुत्र, चन्द्रमा न हो तो दो कन्याए, बुध हो तो चार कन्याए, शुक्र और शनि हो तो अनेक कन्याए होती है।
अर्थात् कुंडली के पञ्चम भाव पर जितने ग्रहों की दृष्टि या युति होगी उतनी संख्या सन्तान की होगी। समानताय पञ्चम भाव, भावेश और करक गुरु को जितने ग्रह देखते है एवं उनसे युति करते है, उतनी संख्या सन्तान की होती है। इनमें जितने पुरुष ग्रह होगें उतने पुत्र, जितने स्त्री ग्रह होगें उतनी कन्या और नपुंसक ग्रह होगें।
प्रश्न लग्न की तिथि की संख्या को चार से गुणाकर उसमे एक जोड़ दें। पुनः दिन और योग की संख्या जोड़कर दो का भाग दें लब्धि को तीन से गुणा करें उसमे चार का भाग दें। १ शेष में विलम्ब से पुत्र होगा (पार्थिव पूजन करें), २ शेष हों तो पूर्व जन्म के पाप से संतान सुख नही (पितृ दोष शांति करें), ३ शेष में पुत्र लाभ होगा (दान दें), ४ एक और ७ शेष से शीघ्र संतान का लाभ होगा।
मुकदमे (Litigation), शत्रु बाधा, नौकर और शिकार
नौकर और मालिक का सम्बन्ध :- प्रश्न लग्न से २/ ७/ और अष्टम भावों में शुभ ग्रह हो ३/ ६ भावों में पाप ग्रह हो तो दोनों में अच्छा सम्बन्ध होता है। यदि इसके विपरीत ग्रह बैठे हो तो स्वामी और नौकर के बिच हमेशा कलह होती है।
भागा हुआ नौकर आयेगा या नहीं :- प्रश्न लग्नेश सप्तम भाव में स्थित होकर लग्न को देखें तो भागा हुआ नौकर मिल जाता है। यदि सप्तमेश लग्न में हो तो वह स्वयं आ जाता है। यदि सप्तम भाव में सूर्य हो और उसपर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो, स्थिर राशि में शुभ ग्रह हो तो वह नहीं मिलता है।
केश में जय पराजय (Court Case) :- प्रश्न लग्न के तृतीय भाव से अष्टम भाव तक शुभ गृह अधिक बलवान् हो तो प्रति वादी मुद्दालाह जीतेगा। यदि नवम भाव से द्वितीय भाव शुभ गृह अधिक बलवान् हो तो मुदई (वादी) जीतेगा। पाप गृह लग्न में स्थिति हो प्रश्न कर्त्ता जीतेगा, परन्तु वहां पाप गृह नीच राशि में हो या अस्त हो अथवा शत्रु राशि में हो तो हार जाएगा।
यदि लग्न और सप्तम स्थान में पाप ग्रह तुल्य बली हो या लग्नेश और सप्तमेश परस्पर मित्र हो तो संधि हो जायेगी। यदि लग्न स्थित पाप ग्रह बली हो तो प्रश्न कर्त्ता की विजय होगी और सप्तमस्थ पाप ग्रह बलवान् हो तो शत्रु की विजय होगी। यदि लग्न सप्तमातिरिक्त भाव में दोनों पाप ग्रहों की परस्पर पूर्ण दृष्टि हो तो वादी प्रतिवादी दोनों शस्त्रों से घायल होते है। प्रश्न काल में लग्नेश, सप्तमेश परस्पर मित्र हो तो युद्ध छिड़ेगा।
पति और पत्नी में पहले किसकी मृत्यु होगी :-
अर्थात् प्रश्न लग्न में पति पत्नी के नाम के वर्ण व्यंजन अक्षरों को २ से गुणा करे, मात्रा स्वर को ४ से गुणा करें और दोनों को जोड़े उसमें ३ का भाग दें यदि १ या 0 शेष हो तो पुरुष की मृत्यु पहले होती है, २ शेष में पत्नी की मृत्यु पहले होती है।
किसी वस्तु या शिकार सम्बन्धित प्रश्न :- प्रश्न लग्न में मंगल और बुध के बली होने पर शिकार खेलने (खेल/प्रतिस्पर्धा) में सफलता मिलती है। इन दोनों के निर्बल होने पर शिकार खेलने में सिद्धि नहीं मिलती। जल राशि में बलवान् ग्रह हो तो मछली आदि जलीय जानवरों का शिकार करते है। जब वनचर राशियाँ बलवान् ग्रह हो तो जंगल से शिकार खेलना शुभ होता है। यदि लग्नेश और सप्तमेश निर्बल हो केंद्र में स्थित हो तो कष्ट होता है। बलवान् हो तो शुभ फल होता है।
सारांश (Conclusion)
जिस समय किसी भी कार्य के शुभाशुभ, लाभालाभ जानने की इच्छा हो उस समय का इष्ट कुंडली का ग्रह स्पष्ट, भावस्पष्ट, नवमांश और चलित कुंडली बनाकर विचार करना चाहिए। प्रश्न लग्न में चर राशि, बलवान् लग्नेश, कार्येश, शुभाग्रहों से युत या दृष्ट हों तथा वे प्राथन भाव / ४ / ५ / ७ / ९ और दशम भावों में हों तो प्रश्न कर्ता जिस कार्य के सम्बन्ध में पूछ रहा है वह जल्दी पूरा होगा।
यदि स्थिर लग्न हो लग्नेश और कार्येश बलवान् हों तो विलम्ब से कार्य होता है। द्विस्वभाव राशि लग्न में हों तथा प्रथम भाव / ४/ ५/ ७/ ९ या दशम भाव में बल वान पाप ग्रह हों लग्नेश, कार्येश हीनबल, नीच,अस्तंगत या शत्रू क्षेत्री हों तो कार्य सफल नहीं होता।
धन प्राप्ति के प्रश्न में द्वितीय, एकादश और दशम भाव; यश प्राप्ति के लिए तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, दशम भाव; सुख, शान्ति, गृह, भूमि आदि की प्राप्ति के लिए चतुर्थ, नवम और दशम भाव; परीक्षा में यश प्राप्ति के लिए लग्न, पञ्चम, दशम भाव; विवाह के लिए द्वितीय से वैवाहिक जीवन, चतुर्थ से वैवाहिक सुख और सप्तम से विवाह; नौकरी, व्यवसाय, बड़े व्यापार और समस्याओं से निकलने का सप्तम, दशम और एकादश भाव; और संतान प्राप्ति के लिए द्वितीय, पञ्चम और सप्तम भाव का विचार करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. प्रश्न कुण्डली क्या है और यह जन्म कुण्डली से कैसे अलग है?
जन्म कुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति पर आधारित होती है, जबकि प्रश्न कुण्डली उस सटीक क्षण (इष्ट काल) के ग्रहों की स्थिति पर बनती है जब जातक ज्योतिषी से कोई विशिष्ट प्रश्न पूछता है। यह तात्कालिक समस्याओं के समाधान में अत्यंत सटीक है।
Q2. चोरी गई वस्तु मिलेगी या नहीं, यह प्रश्न कुण्डली से कैसे जाने?
यदि सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो या लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो अथवा क्षीण चन्द्र सप्तम भाव में हो तो चोरी गयी या भूली हुई वस्तु नहीं मिलती। इसके विपरीत यदि प्रश्न लग्न से २/ ३/ ४ भावों में शुभ ग्रह हों तो नष्ट धन वापस आ जाता है।
Q3. प्रश्न कुण्डली में विवाह का विचार किन भावों से किया जाता है?
विवाह के लिए द्वितीय भाव से वैवाहिक जीवन, चतुर्थ भाव से वैवाहिक सुख, और मुख्य रूप से सप्तम भाव से विवाह और चन्द्र से भी विचार किया जाता है।
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