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ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य! श्रीमद भगवद गीता अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Bhagavad Gita Ch 15)

प्रश्न कुण्डली (Horary Astrology): जीवन के हर अनसुलझे सवाल का सटीक ज्योतिषीय समाधान

प्रश्नाध्याय – प्रश्न कुण्डली (Prashna Kundali): अचूक ज्योतिषीय रहस्य

भावैर्विचार्य विषयान् जानीयात् प्राग् बुधस्ततः |
बलाऽबलविवेकेन शुभाऽशुभफलं दिशेत् ||
स्वरुपलक्षणं प्रश्न- कर्तुर्दुःखसुखे तनोः |
रत्नाना लाभहानी तु धनस्थानात् विचिन्तयेत् ||

ज्योतिषशास्त्र पुराण गणकैरादेश इत्युच्यते अर्थात् ज्योतिषशास्त्र ज्ञान का आदेशात्मक शास्त्र है। मानव स्वभाव से ही जिज्ञासु होता है। वह अपने वर्तमान एवं भविष्य से सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता है तथा उसके समाधान के लिए ज्योतिष की सहायता चाहता है। अतः ज्योतिषियों को प्रश्नों का फलादेश करने से पहले जातक को पहचान ले कहीं प्रश्न कर्ता ठग, शठ, नास्तिक और निंदक हो तो उसके समझ इस शास्त्र का ज्ञान प्रकाशित नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धावान् हो तो उसको प्रश्नों को उत्तरित करना चाहिए। प्रश्न कर्ता अंग स्पर्श करते हुए प्रश्न करता हो तो उसके शुभाशुभ का निर्णय लेना चाहिए और अभीष्ट सिद्धि होती है।

✍️ लेखक परिचय: डॉ. सुनील नाथ झा

डॉ. सुनील नाथ झा एक प्रख्यात ज्योतिषी, अंकशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, वास्तुकार और व्याख्याता हैं। वे 1998 से ज्योतिष, अंक ज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान और वास्तुकला की शिक्षा व अभ्यास कर रहे हैं। डॉ. झा ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान तथा लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। उन्होंने वास्तुकला और ज्योतिष पर "वास्तुरहस्यम्" और "ज्योतिषतत्त्वविमर्श" नामक दो बहुचर्चित पुस्तकें लिखी हैं, तथा "संस्कृत व्याकर-सारः" और "ललितासहस्रनाम" का सफल संपादन भी किया है।

प्रश्न कुण्डली (Prashna Kundali) - तात्कालिक ज्योतिषीय समाधान
प्रश्न कुण्डली से जीवन की तात्कालिक समस्याओं का सटीक ज्योतिषीय मार्गदर्शन

नष्ट या चोरी गई वस्तु एवं धन का ज्ञान

नष्टवीतवित्तलब्धेः पृच्छायां चौर सप्तमं ततो लाभः |
हिबुकं द्रव्यस्थानं लग्नं चन्द्रश्च घनानाथः ||
पूर्णः शशी लग्नगतः शुभो वा शीर्षोदय सौम्येनिरीक्षितश्च |
तदाशु नष्टस्थ करोति लब्धिं लाभोपयातो बलवाञ्छुभश्च ||
यस्मिन्राशौ भवेच्चन्द्रस्तद्राशिराधिपेन चेत् |
दृश्यते चन्द्रमाः प्रश्ने नष्टं च लभ्यते तदा ||

अर्थात् नष्ट या चुराए गये धन या वस्तु लाभ विषयक प्रश्न लग्न के सप्तम भाव को चौर एवं लाभालाभ, कर्क भाव (चतुर्थ भाव) को धन का स्थान तथा लग्न और चन्द्र को धन या वस्तु का स्वामी जानकर विचार करना चाहिए। पूर्ण चन्द्र या शुभ ग्रह लग्न में हों अथवा शीर्षोदय राशि का लग्न हो और शुभ ग्रह से दृष्टि हो अथवा बलवान शुभ ग्रह एकादश भाव में हो तो धन का लाभ होता है जिस राशि में चन्द्र हो उस राशि का स्वामी यदि चन्द्र को देखे तो धन लाभ होता है।

पाप ग्रह से युत सप्तमेश केंद्र में हो तो चोर मिलता है। सप्तमेश यदि शुभ ग्रह से युत होकर केंद्र में हो तो चोर नहीं मिलता है। यदि द्वितीयेश सूर्य के साथ हो तो चोर हाथ आता है परन्तु धन नहीं मिलता। लग्नेश सप्तम भाव में हो तो कष्ट से नष्ट धन का लाभ होता है। सप्तमेश यदि लग्न में हो तो चोर स्वयं ही धन देता है। चन्द्र यदि द्वादश भाव में हो तो चोर ने नष्ट धन का उपयोग कर लिया है, सप्तमेश स्थिर राशि में हो तो धन उसी नगर में है, चर राशि में सप्तमेश हो तो धन अन्य स्थान में चला गया है।

स्थिर राशि का लग्न हो वा लग्न का नवांश हो अथवा लग्न में वर्गोत्तम नवांश हो तो अपने ही आदमी ने धन लिया है और घर में ही है, ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार लग्न प्रथम द्रेष्काण हो तो द्वार के पास, दूसरा द्रेष्काण हो तो घर के मध्य भाग में, तीसरा द्रेष्काण हो तो घर के पृष्ठ भाग में द्रव्य है ऐसा जानना चाहिए।

स्थान विचार: नष्ट या चोरी हुई वस्तु किस स्थान में गई- ऐसे प्रश्न में चतुर्थ भाव यदि भूमि तत्त्व राशि (वृष, कन्या या मकर) हो तो जमीन पर, अग्नितत्त्व राशि (मेष, सिंह या धनु) हो तो अग्नि के समीप, वायु तत्त्व राशि (मिथुन, तुला या कुम्भ) हो तो आकाश में जमीन से ऊँचे जगह पर, तथा जल तत्त्व राशि (कर्क, वृश्चिक या मीन) हो तो पानी के समीप वस्तु का स्थान चाहिए।

यदि चतुर्थेश चतुर्थ भाव में हो या कोई ग्रह चतुर्थ भाव में हो तो गत वस्तु आकाश स्थल पर होगा। यथा- शनि चतुर्थेश हो और चतुर्थ भाव में हो तो मलिन जगह, चन्द्र हो तो जल के समीप, गुरु हो तो देव मन्दिर या फुलवाड़ी, मंगल हो तो अग्नि के समीप, सूर्य हो तो गृह स्वामी के समीप, शुक्र हो तो शयन स्थान तथा बुध हो तो पुस्तकालय, तिजोरी, अन्न भंडार या वहां आदि रखने की जगह या उसके समीप जानना चाहिए।

चोर कौन है: ऐसे प्रश्न में सूर्य चन्द्र लग्न को देखे अपने घर का परन्तु एक ही देखे तो पड़ोसी चोर होता है। लग्नेश या सप्तमेश लग्न में हो तो अपने घर के लोग, या सप्तमेश द्वादश या प्रथम भाव में हो तो नौकर चोर होता है। चोर स्त्री है पुरुष ऐसे प्रश्न में सप्तमेश स्त्री राशि सम संख्या में हो या स्त्री ग्रह हो या सप्तम भाव बलवान स्त्री ग्रह से दृष्ट हो तो चोर स्त्री है, अन्यथा पुरुष समझना चाहिए। लग्नेश के नवमांश से चोर की जाती, अवस्था आदि का विचार करना चाहिए। अवस्था ज्ञान के लिए यदि शुक्र योग कर्ता हो तो युवावस्था, बुध हो तो बाल्यावस्था, गुरु हो तो मध्यावस्था, मंगल हो तो युवावस्था, शनि हो तो प्रौढावस्था, तथा रवि हो तो अति वृद्धावस्था वाला चोर समझना चाहिए।

भावों की वृद्धि/हानि और कार्य सिद्धि

यो यो भावः स्वामिदृष्टो युतो वा सौम्यैैर्वा स्यात्तस्य तस्यास्ति वृद्धिः |
पापैरेवं तस्य भावस्य हानिर्निर्देष्ट्व्या पृच्छतो जन्मतो वा ||

अर्थात् प्रश्न कुण्डली में वा जन्म कुंडली में जो भाव अपने स्वामी से वा शुभ ग्रह से दृष्टि हो तो उस भाव की वृद्धि होती है, किन्तु पाप ग्रह का योग वा दृष्टि हो तो उस भाव की हानि होती है। जिस भाव सम्बन्धी प्रश्न हो उस भाव को कार्येश भाव कहते है। यथा लाभ सम्बन्धी प्रश्न है तो एकादश भाव को कार्य भाव तथा फलादेश को कार्येश समझना चाहिए इस प्रकार और भावों से विचार करना चाहिए।

लग्न में शुभ ग्रह या शुभ ग्रह का वर्ग हो अथवा शीर्षोदय राशि मिथुन, सिंह, कन्या तुला, वृश्चिक या कुम्भ हो तो कार्य सिद्धि होती है, यदि इस से विपरीत पाप ग्रह या पाप ग्रह का वर्ग अथवा पृष्ठोदय राशि लग्न में हो तो कार्य हानि होती है। किन्तु यदि लग्न में शुभ और पाप ग्रहों का योग हो तो प्रयास से कार्य सिद्धि होती है। लग्नेश लग्न को और कार्येश कार्य भाव को देखें अथवा लग्नेश कार्येश को और कार्येष लग्न को देखें अथवा लग्नेश कार्येष को और कार्येश लग्नेश को देखें तथा इन दोनों लग्नेश और कार्येश पर चन्द्र की दृष्टि हो अथवा पाप ग्रह की दृष्टि रहित चन्द्र तथा अन्य शुभ ग्रह लग्न को देखें अथवा लग्न स्थित कार्येश लग्नेश को देखता हो तो कार्य सिद्धि होती है।

यदि कार्येश लग्न से भिन्न अन्य भाव में स्थित होकर लग्नेश को देखता हो तो कार्य सिद्धि विलम्ब से होती है। कार्येष लग्न, चन्द्र और लग्नेश को देखे अथवा लग्न में व कार्य भाव में इन दोनों लग्नेश और कार्येश का योग हो तो कार्य सिद्धि होती है।

यदि लग्नपं न पश्यति कार्याधीशो विलग्नमथ तस्य |
कार्यस्य हानिरुक्ता लग्नमृते किमपि नो वाच्यम् ||

यदि कार्येश लग्न वा लग्नेश को न देखें तो प्रश्न कर्त्ता के कार्य की हानि होती है। ऐसे प्रश्न में लग्न ही प्रधान मानकर शुभाशुभ फल कहना चाहिए।

✈️ प्रश्न लग्न से यात्रा विचार (Travel & Journeys)

सुखे व्योम्नि स्थिते सौम्ये तदा न गमनं भवेत् | तत्रेव गमनं पापे वक्री खेतो यदा न हि ||
चन्द्रो लग्नंपतिर्वापि केन्द्र खेटैः सहाग्रतः | सिद्धेऽपि गमने प्रष्टर्गमनं नेति निश्चितम् ||
स्थिरराशिस्थे चन्द्रे स्थिरोदये गन्तुमिच्छ्तो गमनम् | नास्तीति वक्ती शास्त्रं तथा चारे स्थातुकामस्य ||
भाग्यपो लग्नपो वा स्याच्चन्द्रगो वा विशेषतः | चन्द्रलग्नेश्वरौ भाग्ये गमस्तत्राप्यचिंतितः ||
गमनप्रश्ने नवमस्थाने गते द्युनपे भवेद् गमनम् ||

यात्रा विषयक प्रश्न लग्न कुण्डली में लग्न, चतुर्थ या दशम भाव में शुभ ग्रह हो तो यात्रा नहीं होती। यदि उक्त भाव में पाप ग्रह हो परन्तु वक्री न हो तो यात्रा होती है। चन्द्र या लग्नेश ग्रहों से युत होकर केंद्र में हो तो निश्चित होते हुए भी यात्रा नहीं होती। स्थिर राशि वृष, सिंह, कन्या कुम्भ का चन्द्र और लग्न हो तो यात्रा नहीं होती तथा चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर का चन्द्र और लग्न हो तो जातक की इच्छा न रहने पर भी प्रवास होता है। भाग्येश और लग्नेश चन्द्र युक्त हों अथवा चन्द्र और लग्नेश नवम भाव में हो तो अचिन्तित यात्रा होती है। सप्तमेश नवम भाव में हो तो यात्रा होती है।

ज्योतिषियों के लिए फलादेश के अन्य नियम

प्रश्न के प्रारंभ में सूर्याधिष्ठित राशि से प्रश्न लग्न पर्यन्त गिनती करने पर विषम अंक निकले तो शुभ माना जाता है, सम अंक हो तो अशुभ का सूचक होता है। लग्नेश जहाँ है उसका स्वामी यदि शुभ भाव में हो तो शुभ कार्य की सिद्धि होती है यदि नीच का हो, शत्रु भाव का हो, अस्तंगत हो अथवा षष्ठ, अष्टम या द्वादश अशुभ भाव में हो तो कार्य की सिद्धि नहीं होती। लग्न या चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो शुभ, पाप ग्रह की दृष्टि हो तो अशुभ होता है।

यदि विषम राशि लग्न हो उसपर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो शुभ, यदि पाप ग्रह की दृष्टि हो अशुभ फल होगा है। यदि लग्न चतुष्पद प्रथम, द्वितीय, पञ्चम और दशम भाव तथा धनु का परार्द्ध लग्न हो अथवा द्विपद राशि तृतीय, षष्ठ और सप्तम, धनु का पूवार्द्ध लग्न हो उसपर पाप ग्रह हो या दृष्टि हो तो अशुभ फल देता है। यदि सिंह लग्न हो उच्चस्थ ग्रह है। नीच सिंह लग्न हो उच्चस्थ ग्रह अन्य शुभ ग्रहों हो देखता हो तो प्रश्न कर्त्ता को सुख, धन और राज्य वृद्धि की प्राप्ति होती है।

नीच राशि में स्थित, अस्त, पापयुक्त, शत्रु से हारा, रुक्ष, बलहीन, अल्प (०-५ अंश) हो या शेष अल्प (२५-३०अंश) हो ऐसा ग्रह कुछ भी काम करने में समर्थ नहीं होता है। जो ग्रह पाप ग्रह के साथ हो, ग्रह के आगे पीछे भाव में पाप ग्रह हो, रश्मि हीन हों उन्हें नष्ट ग्रह खा जाता है। जिसे पाप ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखता है, वह पाप दृष्टि होता है जो ग्रह सूर्य की रश्मि में प्रवेश करनेवाला हो या प्रवेश कर गया हो वह रश्मि हीन ग्रह कहा जाता है।

✨ ग्रहों के हर्ष स्थान (Joy of Planets)

कुंडली में गुरु एकादश भाव में हों, बुध लग्न में, चन्द्र तृतीय भाव, सूर्य का दशम भाव, शनि का व्यय भाव, मंगल षष्ठ भाव, शुक्र पञ्चम भाव में और सब ग्रहों का अपना भाव हर्ष स्थान होता है। सूर्य लग्न में, चन्द्र २, ४, १० भाव में, मंगल सप्तम में, बुध चतुर्थ में, शनि नवम भाव में हर्ष दायक रहता है।

प्रश्न कुण्डली में 12 भावों का सूक्ष्म विचार

तिथि प्रहर संयुक्त स्तारका वार मिश्रिताः |
सप्तभिश्चाहरेद भागम शेषंचैव शुभाशुभम् ||
प्रथमे संस्थिति तव द्वाभ्यांआगमनं भवेत् ||
त्रितिये चार्द्धमार्गस्थश्चतुर्थ यानमादिशेत् |
पञ्चमे पुनरावृत्ति षष्ठे व्याधिं विनिर्दिशेत् |
शुन्य शून्यं विजानीयात् शास्दावचनं यथो ||

अर्थात् परदेशी या कोई वस्तु पर विचार प्रश्न लग्न से शुभ ग्रहों के अनुसार गुरु और शुक्र यात्रा या प्रिय वस्तु के लिए समय के तिथि, प्रहार, नक्षत्र, वार के योग में ७ का भाग दें। १ शेष में अपने स्थान पर, २ शेष में आगमन, ३ शेष में आधे रास्ते में, ४ शेष में सवारी पर, ५ शेष में पुनः लौट गये, ६ शेष में रोगी और ७ शेष यानि ० शेष में शून्य फल (यानि जहाँ है वहीँ है) जानना चाहिए।

जिस भाव का प्रश्न है, उस भाव को लग्न मानना चाहिए। भूतकाल के प्रश्न का द्वादश भाव से और भविष्य प्रश्न का द्वितीय भाव से विचार करना चाहिए। पशु का विचार सप्तम भाव से, मित्र का चतुर्थ भाव से, व्यापार और झगड़े का विचार सप्तम भाव से, वाद-विवाद का विचार एकादश भाव से, यात्रा या यात्रा की दिशा का विचार सप्तम भाव से, रोग अथवा व्याधि का विचार सप्तम भाव से, रोगी का विचार दशम भाव से, चोर का विचार सप्तम भाव से, चोरी हुए द्रव्य का विचार चतुर्थ भाव से, किसान का विचार लग्न से, खेत का विचार चतुर्थ भाव से, कृषि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिए।

कुंडली से प्रश्न का विचार यथा, नौकरी, संतान, पदोन्नति, किसी वस्तु की वृद्धि का विचार चतुर्थ भाव से करना चाहिए, किसी वस्तु से अलग होना उस से सम्बन्धित गिरना, अलग, बंधन से मुक्त लग्न से करें, दशम भाव से संतान, पशु, प्रदेश से वापसी आदि का विचार किया जाता है, सप्तम भाव से लौटने का विचार। और यथा रोगी का रोग से दूर होना, नष्ट वास्तु मिलेगा कि नहीं, कष्ट दूर होगा कि नहीं, इन स्थानों में चर लग्न हो तो शीघ्र, स्थिर लग्न हो विलम्ब से फल जानना चाहिए। महत्वपूर्ण नियम: लग्नेश खरीद दार है, लाभेश बेचने वाला है। लाभ एकादश भाव है। अर्थात् प्रश्न में किस भाव से किस सम्बन्ध में विचार किया जाना चाहिए:

  • 🔴 प्रथम भाव: कुंडली के प्रथम भाव से शरीर सम्बन्धित प्रश्न सुख, आयु, स्वास्थ्य, साहस, गुण, क्लेश, आकृति, यश आदि का विचार करना चाहिए।
  • 🔴 द्वितीय भाव: आप परिवार, धन, सुनार सम्बंधित समान, वस्त्र, मित्र, वाणी, दक्षिण नेत्र, क्रय -विक्रय, मार्ग सम्बन्धित कार्य का विचार करना चाहिए।
  • 🔴 तृतीय भाव: इस भाव से पराक्रम, पत्र-पत्रिका, लेखन कार्य, तार, चिठ्ठी, धैर्य, शौर्य, छोट भाई -बहन, लघु यात्रा, नौकर और सहायक का विचार किया जाता है।
  • 🔴 चतुर्थ भाव: इससे घर, सवारी, सुख, माता, जमीन, खलिहान, धरोहर, गड़ा धन, सुरंग, बगीचा, खेती, औषधि, आसन, लालित्य और गृह प्रवेश आदि का विचार होता है।
  • 🔴 पञ्चम भाव: इस भाव से विद्या, बुद्धि, विवेक, शक्ति, विनय, नीति, मैत्री, गर्भ, संतान, सब प्रकार कलाए, प्रबंध, शासन, कविता लिखना, शिक्षा- दीक्षा आदि का विचार करना चाहिए।
  • 🔴 षष्ठ भाव: इस भाव से किस प्रकार का कष्ट आपको मिल सकता है: मानसिक कष्ट, भौतिक कष्ट, नैतिक कष्ट, व्यवहारिक कष्ट, आर्थिक कष्ट, शत्रु, रोग, भय, क्रूर कर्म, युद्ध, आतंक, ताप, शंका, विघ्न, व्याधि और ऋण आदि।
  • 🔴 सप्तम भाव: इस भाव से आप व्यसाय, विवाह, प्रेम, खोई हुई वस्तु या चोरी का समान विचार, मिलाप, दूसरों से विवाद, यात्रा आदि पर विचार किया जाता है।
  • 🔴 अष्टम भाव: आप इस भाव से मार्ग संकट, स्त्री धन, रोग, मृत्यु, आयु विचार, जीवन संकट, मार्ग संकट, जल से कष्ट जीव-जन्तु से कष्ट, भुत_प्रेतादिक कष्ट, अपशकुन, चिरी गई या नष्ट वस्तु का विचार, असुरल, अनिष्टकारी, गुप्त कार्य, विपत्ति- आपदा, अपवाद, दास, मठ, उपग्रह आदि पर विचार होता है।
  • 🔴 नवम भाव: इस भाव से धर्म, कर्म, यज्ञ, तीर्थ यात्रा, गुरु, सौन्दर्य, मन्दिर, दीक्षा, विदेश यात्रा दान, उपासना, सुशीलता, शुभ संस्कार शुभ कार्य आदि पर विचार किया जाता है।
  • 🔴 दशम भाव: आप इस भाव से नौकरी, व्यवसाय, राज्य मुद्रा, विशेष पुण्य, विशिष्ट स्थान की प्राप्ति, प्रयो जन, वारिश, नगर सभा और राजनीति राज्य सभा लोकसभा आदि की सदस्यता का विचार किया जाता है।
  • 🔴 एकादश भाव: आप इस भाव से व्यापार, धन लाभ, इच्छा, हाथी -घोड़े, सवारी, अन्न वस्त्र, पाण्डित्य, विद्या, पतोहू, साढू और दामाद पर विचार किया जाता है।
  • 🔴 द्वादश भाव: इस से भोग, त्याग, विवाद, दान इष्टकर्म, खेती, उधार देना, सट्टे में घाटा, चोरी, लूटमार, विफलता, पाप, और स्थानान्तरण आदि पर विचार किया जाता है।

चोरी गई वस्तु, धन और चोर का सूक्ष्म विचार

महत्वपूर्ण विचार ➖ प्रश्न लग्न में जो ग्रह केंद्र में हो उसकी दिशा में चोरी की वस्तु को कहना चाहिए। यदि केंद्र में दो या अधिक ग्रह हो तो उनमें से जो बली हो, उस ग्रह की दिशा में धन या वस्तु या चोर का कहना चाहिए। यदि केंद्र में ग्रह नहीं हो तो लग्न राशि की दिशा में चोरी गयी वस्तु बतलानी चाहिए। सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो या लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो अथवा क्षीण चन्द्र सप्तम भाव में हो तो चोरी गयी या भूली हुई वस्तु मिलती नहीं।

लग्न पर सूर्य चन्द्र की दृष्टि हो तो आत्मीय चोर होता है। लग्नेश और सप्तमेश लग्न में हो तो कुटुम्ब का व्यक्ति चोर होता है। सप्तमेश द्वितीय भाव या द्वादश भाव में हो तो नौकर चोर होता है। मेष प्रश्न लग्न हो तो ब्राह्मण चोर, वृष हो तो क्षत्रिय, मिथुन लग्न हो तो वैश्य चोर, कर्क लग्न हो तो शुद्र चोर, सिंह लग्न हो तो अन्त्यज चोर, कन्या लग्न हो तो स्त्री चोर, तुला लग्न हो तो पुत्र, भाई या मित्र चोर, वृश्चिक हो तो नौकर, धनु हो तो स्त्री या भाई चोर, मकर हो तो वैश्य, कुम्भ हो तो मनुष्येत्तर प्राणी चूहा आदि और मीन हो तो ऐसे ही भूली हुई समझना चाहिए। चर प्रश्न लग्न हो तो दो तथा संयुक्त अक्षर के नामवाला चोर, स्थिर हो तो चार तथा कृदन्त -पद संज्ञक अक्षर के नामवाला चोर और द्विस्वभाव लग्न हो तो तीन तथा स्वर वर्ण अक्षर के नामवाला चोर होता है।

प्रश्न लग्न राशि अनुसार चोर और वस्तु का विचार:

  • मेष लग्न: चोरी की वस्तु पूर्व दिशा में समझनी चाहिए। चोर ब्राह्मण जाती का व्यक्ति होता है उसका नाम 'स' अक्षर से आरम्भ होता है। नाम में दो या तीन ही अक्षर होते है।
  • वृष प्रश्न लग्न: चोरी वस्तु पूर्व दिशा में ही समझनी चाहिए। चोरी करने वाला व्यक्ति क्षत्रिय जाती का होता और उसके नाम में 'म' और चार अक्षर का रह सकता है।
  • मिथुन प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु आग्नेय कोण में रहती है। चोरी करने वाला व्यक्ति वैश्य वर्ण का होता है और उसका नाम ककार से युक्त तीन अक्षर वाला होता है।
  • कर्क प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु दक्षिण दिशा में मिलती है। और चोरी करने वाला शुद्र या अन्त्यज होता है इसका नाम तकार युक्त तीन वर्ण होता है।
  • सिंह प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु नैऋत्य कोण में पायी जाती है। चोर नौकर अन्त्यज होता है और नाम नकार युक्त तीन या चार वर्णों का रहता है।
  • कन्या प्रश्न लग्न: चोरी की वस्तु पश्चिम दिशा में समझनी चाहिए। स्त्री चोर होती मकार युक्त नाम वाली होती है। वैसे कन्या लग्न में बुध और चन्द्र का नवांश हो तो ब्राह्मणी चोर होती है। यदि मंगल का नवांश होने पर क्षत्रियाणी चोर होती है। शुक्र नवांश होने पर वैश्य जाती की स्त्री चोर और शनि रवि का नवांश होने पर शुद्र या अन्त्यज जाती भी और स्त्री भी चोरी करती है।
  • तुला प्रश्न लग्न: चोरी वस्तु पश्चिम दिशा में समझनी चाहिए घर के ही लोग होता है। इसका नाम मकार युक्त तीन वर्ण होता है। तुला लग्न में गुरु, चन्द्र और बुध का नवांश हो तो चोरी करनेवाला घर के ही होते है। मंगल और शनि के नवांश में आया हुआ अतिथि या अन्य परिचित व्यक्ति ही चोरी करता है।

चोर ज्ञान, वस्तु, नाम एवं स्वरुप

चोर ज्ञान :- यदि प्रश्न लग्न स्थिर राशि हो या स्थिर राशि के नवांश में प्रश्न लग्न हो अथवा अपने वर्गोत्तम नवांश की प्रश्न लग्न राशि हो तो बन्धु, स्वाजतीय, उच्च जातीय व्यक्ति या दास को चोर समझना। प्रश्न लग्न प्रथम द्रेष्काण में हो तो चोरी गयी वस्तु घर के द्वार के पास, द्वितीय द्रेष्कान में हो तो घर के मध्य में हो तथा तृतीय द्रेष्काण में हो तो घर के पीछे के भाग में होती है। प्रश्न लग्न में चन्द्र हो और गुरु की दृष्टि हो तथा शीर्षोदय राशि ३/ ५/ ६/ ७/ ८ और एकादश लग्न में हो तो तथा लग्न में बलवान् और शुभ ग्रह स्थित हों और लग्नेश, सप्तमेश, दशमेश, लाभेश, बलवान् चन्द्र परस्पर मित्र हों या इत्थाशाल आदि शुभ योग करते हो तो चोरी गयी वस्तु की पुनः प्राप्ति होती है।

चोरी वस्तु :- लग्न और लग्नेश में जो बली हो उस लग्न या लग्नेश का रुप ही वस्तु का रुप होगा। यथा लग्न और लग्नेश छोटा रुपवाला हो तो वस्तु भी छोटी होगी। यदि लग्न और लग्नेश बड़े रुपवाला हो तो वस्तु की आकृति बड़ी होगी एवं लग्न और लग्नेश निर्बल हो तो वस्तु भी निर्बल या बली हो तो बली होगी। इस प्रकार लग्न की नवांश राशि से भी वस्तु का लघु या दीर्घ का विचार किया जाता है। लग्न के द्रेष्काण से चोर का स्वरूप बतलाना चाहिए। यथा द्रेष्काण में यदि मेष राशि है,उसका स्वामी मंगल है, मंगल जैसा चोर का कद होगा। लग्न की राशि अथवा लग्न में जो ग्रह हो उससे नष्ट वस्तु की दिशा जाननी चाहिए। यथा यदि लग्न की राशि १/ ४/ ७/ १० है तो क्रमशः पूर्व, उत्तर,पश्चिम और दक्षिण दिशा में चोर होगा। चन्द्र यदि १/ ४/ ७/ १० में हो तो क्रमशः पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण दिशा में चोरी का धन रहता है। लग्नेश या लग्न नवांशेश से चोर की अवस्था, जाति, वय,गुण आदि का विचार करना चाहिए। यथा प्रश्न लग्न में यदि मेष हो तो ब्राह्मण, वृष में हो तो क्षत्रिय, मिथुन हो तो वैश्य, कर्क हो तो शुद्र, सिंह हो तो अपना बन्धु, कन्या हो तो स्त्री, तुला हो तो भ्राता, वृश्चिक में हो तो पुत्र, धनु में हो तो नौकर, मकर में हो तो पुत्र की स्त्री, कुम्भ मर हो तो चूहा और मीन में हो तो पृथ्वी को चोर जानना चाहिए। लग्न राशि के अनुसार लग्नेश के रुप के समान रूपवाला चोर होता है। यथा लग्न राशि मेष हो तो उसके स्वामी, मंगल के समान चोर का रुप होता है। जातक ग्रन्थ में हिस्त्रो हृस्वस्तरुणः पिंगाक्ष इत्यादि मंगल के समान चोर का स्वरुप होगा एवं इसी प्रकार अन्य का रुप जानना चाहिए।

चोर नाम :- आपको प्रश्न लग्न की राशि के अनुसार नाम जानना चाहिए। मेष लग्न हो और उस लग्न का मान ०/ ११/ १५ हो तो चोर के नाम का पहला अक्षर जानने के लिए होरा चक्र चु, चे, चो, ला, लि, लू, ले, लो, अ मेष राशि का वर्ण उल्लिखित है, लग्न का राश्यादि के अनुसार चोर के नाम का पहला अक्षर क्या होगा। इसके लिए नवांश का विचार करना चाहिए क्योंकि लग्न का चतुर्थ नवांश प्रश्न काल में व्यतीत हो रहा था। अतः चतुर्थ वर्ण 'ला' चोर के नाम का पहला अक्षर निकला। चर लग्न में चोर का नाम दो अक्षर का, स्थिर लग्न में चार अक्षर का और द्विस्वभाव लग्न में तीन अक्षर का होगा। प्रश्न लग्न का नवांश के द्वारा द्रव्य का ज्ञान किया जाता है। चन्द्र राशि के वर्ण रंग के अनुसार वस्तु का रंग आदि जानना चाहिए। द्रेष्काण के राशि स्वामी के अनुसार चोर का रुप मालूम किया जाता है। लग्न राशि से समय का ज्ञान, दिशा, देश, अवस्था का ज्ञान होता है। यथा लग्न रात्री बली हो तो चोरी से रात में जानना चाहिए। राशि के अनुसार दिशा का ज्ञान पूर्व में बतलाया गया है। ग्रहों के स्थान जातक ग्रथों में बताया गया है। जैसे सूर्य का देवालय, चन्द्र का जल,मंगल का अग्नि, बुध का बिहार स्थल, गुरु का खजाना, शुक्र का शयन, शनि का खानि खनिज है। लग्नेश के अनुसार चोर के रहने का स्थान ज्ञात किया जाता ही। केंद्र में जो बलवान् ग्रह हो उसके अनुसार चोर और चोरी की गयी वास्तु की दिशा बतानी चाहिए। सू, शु,म,रा,श,चं,बु और गु आदि यथा क्रम पूर्वादि दिशाओं के स्वामी है।

चोर का स्वरुप :- प्रश्न कुण्डली में सप्तमेश चोर का रुप है। चोर का रुप सप्तमेश से बतलाना चाहिए। लग्न से चन्द्र जिस स्थान में हो वहां चोर का घर बतलाना चाहिए। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, मकर और धनु लग्न हो तो चोरी करने का समय रात बतलाना चाहिए। मेष लग्न हो तो भूमि, वृष हो तो गोकलादि, स्थान आदि बतलाना चाहिए, चन्द्र लग्नेश हो तो बालक इत्यादि अवस्था बतलाना चाहिए, गुरु शुक्र लग्नेश हो तो ब्राह्मण, मंगल सूर्य लग्नेश हो तो क्षत्रिय, बुध लग्नेश हो तो वैश्य, शनि लग्नेश हो तो शुद्र या अन्त्यज चोर होता है। केंद्र गत ग्रह से नष्ट वास्तु की दिशा कहनी चाहिए। यथा- सूर्य केन्द्र में हो तो पूर्व दिशा, जब दो तीन ग्रह केन्द्र में हो तो बली ग्रह की दिशा कहनी चाहिए। जब कोई ग्रह केन्द्र में न हो तो लग्न राशि से दिशा का ज्ञान करना चाहिए। लग्न का जितना नवांश बीता हो उतनी योजन दूरी पर वस्तु गयी है यह जानना चाहिए। सप्तमेश स्त्री राशि में हो और स्त्री ग्रह से दृश्य हो तो चोर स्त्री है अन्यथा पुरुष है। बुध, शुक्र हो तो गर्भवती स्त्री, शनि हो तो वृद्ध स्त्री, मंगल हो तो मध्यावस्था की स्त्री चोर होती है।

🔍 चोरी हुई वस्तु कहाँ मिलेगी? (Recovery of Stolen Items)

आपका वस्तु चोरी हुई या क्या हुआ- इस प्रश्न के लिए लग्न द्रेष्काण से विचार करना चाहिए। प्रश्नकाल में यदि लग्न का प्रथम द्रेष्काण हो तो वस्तु की चोरी हुई, द्वितीय द्रेष्काण हो तो रस्ते में कही गिर गयी और तृतीय द्रेष्काण मर हो तो वस्तु खो गयी जानना चाहिए। लग्न के प्रथम द्रेष्काण में खोई वस्तु दुर्दश में नानना चाहिए। द्वितीय द्रेष्काण में घर के बिच और तृतीय द्रेष्काण में घर के अन्त में जानना चाहिए एवं प्रश्न लग्न स्थिर हो अथवा स्थिर नवांश या वर्गोत्तम हो तो चोरित वस्तु अपने ही घर में अपने ही आदमी ने चुरायी है यह जानना चाहिए।

प्रश्न पर जब सूर्य और चन्द्र की दृष्टि हो और उसपर मित्रग्रह की दृष्टि हो तो नष्ट धन की प्राप्ति होती है। यदि चतुर्थ भाव का स्वामी अथवा चतुर्थ भाव का कारक चन्द्र चतुर्थ भाव में हो अथवा चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो नष्ट धन की प्राप्ति होती है। वह धन अपनी ही जगह होता है। स्व भाव से चोर की जगह है और अष्टम भाव धन की जगह है पर मंगल क्रूर ग्रह हो अथवा लग्न में राहू और अष्टम भाव में सूर्य हो तो धन नही मिलता है

विस्मृति वस्तु के प्रश्न में तृतीय भाव धन का है और चुर्थ भाव ग्राहक का है। तृतीय भाव के नवांश से लाभ भाव की संख्या के समान दिनों में विस्मृति वस्तु का लाभ होता है। प्रश्न लग्न से द्वितीय या तृतीय भावों में से एक भाव में चतुष्पद राशियों में से १/ २ / ५ १० एक राशि हो और उसमें शुभ ग्रह हो तो चतुष्पद गाड़ी मिल जाता है।

अन्य विचार :- वर्तमान सूर्य के नक्षत्र से प्रश्न काल के चन्द्र नक्षत्र तक गिनती करें प्रथम नौ नक्षत्र तक में उस दिन का नक्षत्र पड़ जाय तो गाड़ी जंगल में मिलता है, उसके बाद ६ नक्षत्रों में अपने इलाके के नजदीक या ग्राम के समीप मिलता है। उसके बाद के सात नक्षत्रों में स्वयं घर पर आ जाता है, उसके बाद के डॉन नक्षत्रों में नहीं मिलता अन्त के तीन नक्षत्रों में गाड़ी बर्वाद हो गई जानना चाहिए।

तिथिंवारं च नक्षत्रं प्रहरेण समन्वितम्... प्रश्न लग्न समय के तिथि, दिन, नक्षत्र और प्रहर का योग कर दश से गुणा कर सात का भाग दें। यदि शेष १ बचे तो पृथ्वी नीचे में, २ बचे तो किसी वस्तु में, ३ बचे तो जल में, ४ बचे तो आकाश मकान पौधा के ऊपर में, ५ बचे तो तुषस्थ भूसा, बालू में, ६ बचे तो गोबर के ढे़र गोरहे, उपलों में, यदि ७ बचें तो धन घर से बाहर रखी गयी है

कुछ और नियम - नष्ट वस्तु के नामाक्षर के गुण योग उसमें तीन अंक ऊपर से युक्त करें जो हो उसमें ५ का भाग दे। एक शेष बचें तो अपने घर में, २ बचें तो घर से बाहर, ३ बचे तो शयन स्थान में, ४ बचे तो अपने स्थान से समीप दुसरे स्थान में, ५ बचे तो स्वयं हास्य की दृष्टि से चुराया होता है।

प्रश्न लग्न यदि चर लग्न हो तो दूरदेश में धन गया होता है, स्थिर लग्न में घर में ही, द्विस्वभाव लग्न हो तो घर से बाहर वस्तु या धन होगा। प्रश्न लग्न से २/३/५ पञ्चम भावों में शुभ ग्रह हो तो परदेशी लौट आयेगा। खोई हुई वस्तु मिल जाएगी। उक्त भावों में गुरु और शुक्र स्थिति हो तो परदेशी और खोई वस्तु भी शीघ्र ही लौटेगा, जब प्रश्न लग्न स्थिर हो, उसका नवांश स्थिर और वर्गोत्तम हो तो नष्ट वस्तु घर में ही होगा एवं अपना आदमी चोर होगा। स्थिर लग्न स्थिर नवांश हो तो चोरी गई वस्तु घर के समीप होती है। तथा अपने आदमी चोर होते है। चर लग्न चर नवांश हो तो चोरी गयी वस्तु दूर में होगी और घर के बाहर के आदमी के पासा होगी। द्विस्वभाव लग्न एवं द्विस्वभाव राशि का नवांश हो तो चोर न घर का न बाहर का बीच का होता है। धन भी मध्य में होता है।

लग्न में चन्द्र हो तो पूर्व की ओर दशम भाव में हो तो दक्षिण की ओर, सप्तम भाव में हो तो पश्चिम को ओर और चतुर्थ भाव में हो तो उत्तर की ओर चोरी गयी वस्तु होती है या चोर या चोर का घर होता है। प्रश्न लग्न सूर्य और चन्द्र से विलोकित हो तो अपने घर का चोर होता है। सप्तमेश स्वक्षेत्री और स्वोच्च राशि का हो तो पुराना चोर होता है। लग्नेश सप्तम भाव में सप्तमेश लग्न में हो तो चोरी गयी वस्तु या धन मिल जाता है। यदि सप्तमेश केन्द्र में हो तो स्वयं चोर होता है, वस्तु नगर से बाहर नहीं गयी वस्तु प्राप्त हो जाती हैं।

जब प्रश्न लग्न से प्रथम भाव / २/ ३/ ४/ ५/ ९ और एकादश भावों में शुभ ग्रह बलवान् हो और केन्द्र और त्रिकोण, अष्टम और लाभभावों को छोड़कर शेष भावों में पाप ग्रह हो तो चोरी गयी वास्तु प्राप्त हो जाती है। शीर्षोंदय प्रश्न लग्न हो उसमे शुभ ग्रह हो अथवा पूर्ण चन्द्र लग्नगत हो शुभ युक्त हो दृष्टि हो, लाभ भास्व में शुभ ग्रह हो तो नष्ट वस्तु का शीघ्र लाभ होता है। प्रश्न लग्न से त्रिकोण में पूर्ण चन्द्र हो, शुभ ग्रह से दृष्टि हो लाभ भाव में बली शुभ ग्रह हो तो नष्ट वास्तु शीघ्र मिलती है। प्रश्न लग्न से द्वितीय /३ /४ भावों में हो तो नष्ट धन वापस आ जाता है। यदि लग्नेश सप्तम भाव में हो तो नष्ट धन की प्राप्ति होती है। यदि लग्न में सूर्य हो, सप्तम भाव में चन्द्र हो तो नष्ट धन मिलता है। यदि सप्तमेश या चन्द्र सूर्य के साथ असत हो तो नष्ट धन नहीं मिलता है। शीर्षोदय ३/५/६/७/८/११ लग्न हो, पूर्ण चन्द्र लग्न में हो, उसपर शुभ ग्रह की दृष्टि हो या लाभ भाव में बली शुभ ग्रह हो तो नष्ट धन शीघ्र मिलता है। यदि ३/५/७/११ भावों में शुभ ग्रह हो तो लाभ होता है, यदि पाप ग्रह हो तो लाभ नहीं होता है। अष्टमेश ७/८ भावों में हो तो प्रश्न कर्त्ता की चोर से लाभ नहीं होता है। प्रश्न लग्नेश १/२/११ भवों में किसी पर दृष्टि न हो तो नष्ट धन कभी नहीं मिलता है। प्रश्न लग्न पर सूर्य और चन्द्र की दृष्टि हो तो आत्मीय चोर होता है। यदि लग्नेश सप्तमेश लग्न में हो तो कितिम्ब चोर होता है। यदि सप्तमेश २/१२ भावों में हो तो नौकर चोर होता है। यदि हाथ घुटने के भित्तर हो तो आत्मीय चोर होता है। बाहर हो तो बाहर का चोर होता है।

प्रश्न लग्न विचार और विविध कार्य सिद्धि

प्रश्न लग्न विचार :- वारर्क्षतिजि दिशा परिमिति संयोज्य नागैर्भजेतलब्धां फलञ्च नागनयने दोषं पितुश्वान्यथा | सपते ७,राम मिते ३, सुरस्य विहितं तरके ६, च वेदे ४ तथा | प्रेत्यस्यापि च खेचरस्य विदितं चन्द्रे च बाणाधिके | लब्धांक त्रिगुणं तत्र्हा वसुयुतं वेदेन गुण्यमं ततः सप्ताप्तेष्वंधिकं यथा विधुमितं कौल्यञ्च दोषं वदेत् :-

अर्थात् दिन, नक्षत्र, तिथि, दिशा की संख्या का योग करें ८ का भाग दें शेष के अनुसार फल होगें। यथा- ८/२ शेष रहने पर पैत्रिक दोष, ७/ ३ शेष में देव दोष, ६/ ४ शेष में प्रेत दोष, १/ ५ शेष में ग्रह दोष होता है। पूर्व योगों को तीन से गुणा करें ८ जोड़ दें पुनः ४ से गुणा करें सात का भाग दें १ शेष में कुलदोष, २ शेष में ग्राम्य दोष, ३ शेष में वनोत्पन्न दोष, ४ शेष में राजकुलोत्पन्न दोष, ५ शेष में शत्रु जनित दोष, ६ शेष में पंक्ति से उत्पन्न दोष और ० शेष में आकाशोत्पन्न दोष होता है।

  • 👉 प्रश्न लग्न से अनेकों कार्यों में पहले किस कार्य की सिद्धि होगी: यदि लग्नेश शुभ ग्रह होकर केंद्र में हो तो पहले कार्य की पहले सिद्धि होती है दुसरे कार्यों की सिद्धि बाद में होता है।
  • 👉 प्रश्न लग्न से धन ज्ञान: प्रश्न लग्न यदि चार हो तो दुर्दश में धन गया होता है, स्थिर लग्न में घर में ही सामान रहता है, द्विस्वभाव लग्न हो तो घर से बाहर धन होता है।
  • 👉 प्रश्न लग्न से जीव जन्तु खो जाने पर मिलेगा या नहीं: प्रश्न लग्न द्वितीय या तृतीय भावों में से एक भाव में चुष्पद राशियों में से (मेष, २, ५ और मकर राशि) एक राकश हो और उसमे शुभ ग्रह हो तो पशु मिल सकता है।

प्रश्न लग्न से बाधा ज्ञान (Obstacles & Curses):

मेषे च देवी दोषः स्याद्वृषे दोषश्च पैत्रिकः |
मिथुने शाकिनी दोषः कर्क ते भूत दोषकः ||
सिंघे सहोदाराणां वै कन्यायां कुलमातृजः |
तुले दोषश्चण्डिका या नाड़ी दोषों हि वृश्चिके ||
चापे च यक्षिणी पीड़ा कमरे ग्राम देवतात् |
अपुत्रा दृष्टिजः कुम्भे मीने आकाश गामिनः ||

अर्थात् मेष लग्न में देवी के दोष से मानसिक कष्ट, वृष लग्न में पैत्रिक दोष से शान्ति नहीं, मिथुन लग्न में शाकिनी के दोष उपद्रव होता है। कर्क लग्न से भूत दोष से थकावट रहता है, सिंह में अपने सहोदर भाई से, कन्या लग्न में वंश माता से, तुला लग्न में देवी दोष से, वृश्चिक लग्न में नाड़ी दोष से, धनु में यक्षिणी दोष से मकर लग्न में ग्राम देवता के दोष से कुम्भ में अपुत्र की दृष्टि दोष से और मीन में आकाश गामी ग्रहों के दोष से पीड़ा होती है।

छिन्द्रे व्यये रवौ दोषो यक्षिणीक्षेत्र पालाजः |
जलमातृभूवश्चंद्रे डाकिनिजः कुजे तथा ||
बुधे भौतो गुरौ पैत्रः खेचरासुरजः सिते |
कुलदेवीकृतो मन्दे राहौ प्रेतकृतस्तथा ||
विबलग्रहजो दोषो साध्योऽसाध्योऽन्यथा मतः |
ज्ञेयोऽत्र कर्मजो दोषो रन्ध्रेऽन्त्ये च बलोज्झिते ||

प्रश्न लग्न से अष्टम द्वादश भाव में सूर्य हो तो यक्षिणी या क्षेत्रपाल सम्बन्धी, चन्द्र हो तो देवी सम्बन्धी, मंगल हो तो डाकिनी सम्बन्धी, बुध हो तो भुत सम्बन्धी, गुरु हो तो पितृ सम्बन्धी, शुक्र हो तो ग्रह या असुर सम्बन्धी, शनि हो तो कुलदेवी सम्बन्धी तथा राहू हो तो व्रत सम्बन्धी दोष होता है। यदि ग्रह निर्बल हो तो दोष साध्य होता है। परन्तु ग्रह यदि सबल हो तो दोष असाध्य होता है। अष्टम या द्वादश भाव निर्बल हो तो कर्म का दोष जानना चाहिए।

वर्ष का शुभाशुभ ज्ञान:

तिथिवारर्क्ष योगानां युति संवत्सरान्विता | प्रष्टुर्नामाक्ष्ररैर्युक्ता त्रिहृता शेष के फलम् || एकेन क्लेशः द्वाभ्यां समता त्रितयेमहत्सुख़म् ||
अर्थात् प्रश्न समय की तिथि, दिन, नक्षत्र और योग के योग से संवत्सर की संख्या का योग करें योगफल में प्रश्न कर्त्ता के नाम की संख्या का योग करें उसमे तीन का भाग दें। एक शेष हो तो क्लेश, दो शेष हो तो मध्यम और तीन शेष रहे तो महान सुख होता है।

कार्य सिद्धि योग प्रश्न लग्न से:

लग्नपः कार्यश्चापि लग्नगो कार्यगौ युतौ |
मिथस्थौ स्वस्वगौ दृष्टौ स्वोच्चादौ चेत्सुसिद्धिदौ || एषु योगेषु सत्यां कार्य सिद्धिरवश्यं भवति |

लग्नेश और कार्येश लग्न में हो या कार्य भाव में हो और एक साथ हो तो कार्य की सिद्धि होती। कार्य सिद्धि के प्रश्न में यदि केंद्र एवं त्रिकोण में शुभ ग्रह हो, त्रिषडाय में पाप ग्रह हो तो सिद्धि होती है। इसमें चन्द्र की दृष्टि हो तो निश्चित रूप से कार्य की सिद्धि होती है।

प्रश्नकर्त्ता से १ से लेकर १०८ तक के अंकों में से कोई अंक मुख से कहनें। उस अंक को १२ से भाग दें। यदि शेष १, २ और ७ रहें तो कार्य सिद्धि देर से होती है। शेष ४, ५, ८ और १० हो तो कार्य सिद्धि नहीं होती है। ११ बचे तो सिद्धि, २ बचे तो वृद्धि और ३, ६ और १२ बचे तो शीघ्र सिद्धि कहना चाहिए।

दोस्ती होगी या नहीं :- प्रश्न लग्न का तिथियो, दिन नक्षत्र और जिससे दोस्ती करनी है उसका नामाक्षर के योग में ३ योग करें २ का भाग दे, शेष १ हो तो मैत्री होगी, २ हो तो नहीं होगी।

सुखादि विचार प्रश्न लग्न से:

सुखादि से सम्बन्धित प्रश्न हो तो लग्नेश लग्न में हो शुभ ग्रहों से युक्त वा दृष्टि हो तो सरे उप्ग्रावों, शारीरिक कष्टों की दूर करते हुए सुख, लाभ और धन की प्राप्ति होती है। किसी कार्य की सिद्धि के प्रश्नों में लग्नेश और कार्येष दोनों शुभ ग्रह एक साथ बैठे हो तो शुभ फल मिलता है। यदि दोनों पाप ग्रह हो एक साथ स्थित हो तो कार्य की अल्प सिद्धि होती है।

विवाह और सन्तान विचार (Marriage & Progeny)

लग्नांगपति गृहगे जीवे विवाहं वदेच्चन्द्राधिष्ठित तारका वधिपयोरै क्यांशिके वा तथा | जीवे मित्र नवांश के बलयुते यद्योज भागान्विते | स्वोच्चे द्वित्री कलत्रवान बहुवधूनाथः स्वमित्रांशके | कलत्रनाथ स्थितभांश केशयोः सितेक्षपानाथ कयोर्बलीयसः दशागमे द्युन्पयुक्त भानशके त्रिकोणगे देवगुरौ करग्रहः |

लग्नेश सप्तमेश के स्फुटैक्य सही राशि में जब गोचर का गुरु पहुँचता है तब विवाह होता है। या चन्द्र राशि और लग्न के स्फुटैक्य में गुरु के जानेपर विवाह होता है। गुरु अपने मित्र के नवांश में बली हो विषम नवांश में हो तो विवाह होता है। अपने उच्च राशि के गुरु होने से २-३ विवाह या सम्बन्ध करा सकता है। सप्तमेश और राशि स्वामी के बली होने पर सप्तमेश के दशान्त्तर दशा में या उसके नवांश के त्रिकोण में गुरु के जाने पर विवाह होता है।

प्रश्न लग्न से २/ ३/ ६/ ७/ १० और एकादश भावों में चन्द्र को गुरु देखे तो विवाह होगा। यदि चन्द्र के साथ पाप ग्रह हों या पापग्रहों की दृष्टि हो तो विवाह नहीं होगा। यदि लग्न से ३/ ५/ ६/ ७/ और एकादश भावों में चन्द्र को सूर्य, बुध, गुरु इनमें से कोई ग्रह देखे अथवा व्ययेश, सप्तम भाव में और सप्तमेश लग्न में हो अथवा २/ ३/ और सप्तम भावों में से किसी एक भाव में चन्द्र या शुक्र हो तो अवश्य विवाह होगा।

प्रश्न कुंडली में शनि सम भाव में स्थित हो तो वर लड़के को कन्या मिलती है अन्यथा नहीं, चन्द्रमा और शुक्र विषम राशि या विषम नवांश में स्थित लग्न को देखें हो कन्या को वर मिलता है। यदि वे युग्म राशि में या युग्म नवांश में हो तो वर को कन्या मिलती है। कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा लग्न से सम भावों में स्थित हो तथा और पाप ग्रह से दृष्टि हो तो विवाह नहीं होता है। विवाह के प्रश्न में चन्द्रमा २/ ३/ ६/ ७/ १० और एकादश ११ भावों में हो, उस पर गुरु की दृष्टि हो तो वर को स्त्री की प्राप्ति होती है। यदि चन्द्रमा १/ ४/ ५/ ८/ ९/ और द्वादश भावों में हो, पाप ग्रह से युक्त वा दृष्टि हो तो विलम्ब से विवाह होता है। चन्द्रमा ३/ ६/ ७/ १० और एकादश भावों में बुध हो, सूर्य, गुरु से दृष्टि हो शुभ राशि में हो तो वर का विवाह होता है, द्वादशेश, लग्नेश अथवा लग्नेश सप्तमेश एक दुसरे के भाव में हो अथवा शुक्र, चन्द्रमा स्वक्षेत्री हो या उच्च के हो तो विवाह होता है। प्रश्न लग्न से २/ ४/ ७/ और अष्टम राशि हो उसमें चन्द्र हो और उसे शुभ ग्रह देखता हो हो वर को कन्या प्राप्त होता है। शेष राशि में स्त्री ग्रह स्थीत हो स्त्री राशि के नवांश को देखे और लग्न में हो तो कन्या को वर का लाभ होता है।

विवाह प्रश्न में पूर्व रीती से पिण्डांग तैयार कर उसमे ८ का भाग दें १ शेष में विना यत्न से, २ शेष में अधिक यत्न से, ३ शेष नहों, ४ और ५ शेष में कन्या का मरण, ६ शेष में राजभय, ७ शेष में वर कन्या दोनों का मरण या श्वसुर का मृत्यु और ८ शेष हो तो विवाह से संतान का मरण कहना चाहिए।

जन्म पत्री पुरुष या स्त्री की है :- लग्न का अंक सूर्य, मंगल और राहू के राशि अंकों का पीछे का योग करें उसमे १ घटाकर ३ से भाग दें शेष ०/१ में पुरुष और दो शेष हो तो स्त्री की जन्मपत्री होती है। लग्न से सम में शनि हो तो कन्या, विषम में हो तो पुरुष की जन्मपत्री होती है। लग्न गुरु चन्द्र एवं सूर्य विषम राशि में या विषम नवांश में हो तो पुरुष सम राशि, सम राशि के नवांश में हो तो कन्या की जन्मपत्री होती है।

संतान विचार (Progeny Astrology)

हरिवृषवृश्चिककन्याः पञ्चमगाश्चंद्रतो विलग्नाद्वा |
पृच्छाकाले वाच्यं स्वल्पापत्या भवेर्द्योषित्…… ||
तिथिवारं च नक्षत्रं गर्भिणी गर्भिणीनाम संयुतम् |
सप्ताभिश्च हरेद्भागं शेषं च फल मादिशेत ||
तत्प्रश्न लग्ने रवि जीव भौमे तृतीय सप्तेनव पञ्चमे च |
गर्भः पुमान्वै ऋषिभिः प्रणीतश्चान्य गृहेस्त्री विवुधैः प्रणीतः ||

प्रश्न कुण्डली में लग्न से या चन्द्र से पञ्चमभाव में सिंह, वृष, वृश्चिक या कन्या राशि हो तो प्रश्न कर्त्ता की पत्नी अल्प संतति वाली होती है। यदि सूर्य और शनि स्वराशि में स्थित होकर अष्टम भाव में हो तो पश्न कर्त्ता की स्त्री वन्ध्या होती है। चन्द्र और बुध हो तो दोष युक्त या काक वन्ध्या कन्या प्रधान वाली होती है, गुरु और शुक्र हो तो विकलांग या मृत वाली होती है। मंगल हो तो गर्भश्राव युक्त होती है। बलवान अष्टमेश अष्टम भाव में हो तो स्त्री को संतति दायक रजोधर्म नहीं होता है। शुक्र और सूर्य अष्टम भाव में हो और २/८/१२ भाव में पाप ग्रह हों तो प्रथम संतान मरती है और आगे अल्पायु संतान होती है।

यदि प्रश्न लग्न का तिथि, वार, नक्षत्र गर्भिणी सस्त्री के नामाक्षर के योग करें उसमे ७ का भाग दें। शेष विषम अंक मिले तो पुत्र और सम अंक मिले तो कन्या कहना चाहिए। यदि सूर्य, गुरु, मंगल प्रथम भाव/ ३/ ७/ और पञ्चम भाव में हो तो गर्भ में लड़का होता है और दुसरे भावों में इनके होने से गर्भ में लडकी होती है।

प्रश्न लग्न से पञ्चम भाव में बुध या शुक्र हो तो जातक को कन्या होगी। लाभ भाव में चन्द्र हो तो कन्या होती है। लग्नेश की पञ्चम भाव में स्थिति और पंचमेश तथा गुरु का बलवान् होना भी संतति कारक योग बनाता है। शुभ ग्रह दृष्टि लग्नेश और पंचमेश का केन्द्रस्थ होना संतान प्रद योग बनाता है।

यदि पञ्चम भाव में सूर्य, मंगल, केतु और राहू तीनों हो तो सन्तान देर से होती है। यदि प्रश्न कुण्डली में चतुर्थ भाव में पाप ग्रह और पञ्चम भाव में गुरु हो तो सन्तान के अभाव का योग होता है। यदि तृतीय अष्टम भाव में शनि नीच न हो तो संतान नहीं होती। यदि द्वितीय पञ्चम या दशम भाव में मंगल हो तो पुत्रहीन योग बनता है। यदि पञ्चम भाव में शनि और राहू के साथ सूर्य हो तो सन्तान उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाते है।

संख्या- पुत्र या पुत्री ➖

पञ्चमेशोऽथ लग्नेशो विषमर्क्षगतौ यदा | पुत्रजन्मप्रदौ ज्ञेयौ कन्यानां समराशिगौ ||
सुताधिपे नृराशिस्थे पुंराशिस्थोऽपि लग्नपः | वीक्षते पुत्रदः प्रोक्तो युग्मराशौ च दारिका ||
ओजस्थैः पुरुषांशकेषु बलिभिर्लाग्नार्कगुर्विन्दुभिः | पुंजन्म प्रवदेत्समांशक गतैर्युग्मेषु तै योर्षितः ||
गुर्वर्कौ विषमे नरं शशिसितौ वक्रश्च युग्मे स्त्रियं | द्वयंगस्था बुध वीक्षणाच्च यमलो कुर्वन्ति पक्षे स्वके ||
विहाय लगना विषमर्क्षसंस्थः सौरोऽपि पुञ्जन्मकरो विलग्नात | प्रोक्त ग्रहाणामवलोक्य वीर्य वाच्यः प्रसुतो पुरुषोगना वा ||
विषम स्थितेऽर्क पुत्रे सुतस्य जन्मान्यथांगनायाश्च | लभ्यावरस्यनारी समास्थितऽतोऽन्यथा वामम् ||

अर्थात् पंचमेश ओए लग्नेश यदि विषम राशि में हो और पुरुष ग्रह सूर्य, मंगल या गुरु से दृष्टि हो तो पुत्र तथा स्त्री राशि में हो और स्त्री ग्रह से दृष्ट हो तो कन्या होती है। लग्न को छोड़ कर विषम भाव में शनि हो तो पुत्र तथा सम भाव में हो तो कन्या होती है। पंचमेश लग्न में और लग्नेश पञ्चम भाव में हो तो पुत्र होता है। द्विस्वभाव राशि के लग्न में शुभ ग्रह बैठे हों तो गर्भ में यमल कहना चाहिए।

प्रश्न लग्न, सूर्य, गुरु, चन्द्र विषम राशि में हो और पुरुष राशि मेष आदि के नवांश में हो बलयुक्त हो तो पुत्र जन्म होगा। यदि लग्न, चन्द्र, सूर्य, गुरु सम राशि वृष आदि में हो स्त्री राशि के नवांश में बलयुक्त हो तो अवश्य कन्या का जन्म कहना चाहिए। यदि सूर्य, गुरु, विषम राशि में हो तो पुत्र जन्म कहना चाहिए। यदि शुक्र, चन्द्र, मंगल समराशि में हो या समनवांश में हो तो कन्या जन्म कहना चाहिए।

यदि पूर्वोक्त ग्रह द्विस्वभाव राशि में हो और बुध पूर्ण दृष्टि से देखे तो यमल (जुड़वां) जोड़े होते है। स्त्री पुरुष ग्रहों के यथानुसार पुत्र पुत्री का योग बनता है। विषम नवांश हो पुरुष ग्रहों से दृष्टि या संयोग बनने से पुत्र ही होगा। यदि द्विस्वभाव राशी के नवांश से सूर्य, गुरु, चन्द्र, शुक्र मंगल मिश्रित हो और बुध की पूर्ण दृष्टि हो तो यमलों में एक पुत्री दूसरी पुत्री होती है। इसी प्रकार ज्येष्ठ और कनिष्ठ गुरु द्वारा समझनी चाहिए। यदि लग्न को छोड़कर विषम राशि में शनि हो तो वह केवल पुत्र ही देता है। (षट् पञ्चाशिका इसका विपरीत फल कहते है)

एक त्रिपञ्चपुत्राः पञ्चस्थे सूर्ये कुजे गुरौ |
द्विः चतुः षट्सप्त पुत्रिदा चन्द्रमा ज्ञसितौशनिः||

आपके कुंडली में जब पञ्चम भाव में सूर्य या दो पुरुष ग्रह स्थित-दृष्टि हो तो एक या दो पुत्र, मंगल हो तो तीन पुत्र, गुरु हो तो पञ्चम पुत्र, चन्द्रमा न हो तो दो कन्याए, बुध हो तो चार कन्याए, शुक्र और शनि हो तो अनेक कन्याए होती है:

स्वभाव संस्थाः पुरुषग्रहाश्चेन्निरिक्षितास्ते बुधभार्गवाभ्याम् |
पुत्रस्य लाभोयुवती ग्रहश्चेतकन्या सुरुपाचानस्य जन्म ||
पुन्संज्ञकैः खेचरकैश्च पुत्रे युतेक्षिते स्यात्तनयोऽथकन्या |
स्त्री खेचरैदृष्ट युतोऽथ षण्ढः खेट्स्य दृष्टे तनयोऽथ षण्ढः ||
पुन्स्त्री ग्रहाः पुत्रः गृहं विलग्नात्पश्यन्ति यावन्त इह प्रकुर्यात् |
तत्संख्यकाः स्युः तनयाश्च कन्या शुभेश योगात्सुत भंगतुल्यः ||

अर्थात् कुंडली के पञ्चम भाव पर जितने ग्रहों की दृष्टि या युति होगी उतनी संख्या सन्तान की होगी। समानताय पञ्चम भाव, भावेश और करक गुरु को जितने ग्रह देखते है एवं उनसे युति करते है, उतनी संख्या सन्तान की होती है। इनमें जितने पुरुष ग्रह होगें उतने पुत्र, जितने स्त्री ग्रह होगें उतनी कन्या और नपुंसक ग्रह होगें।

प्रश्न लग्न की तिथि की संख्या को चार से गुणाकर उसमे एक जोड़ दें। पुनः दिन और योग की संख्या जोड़कर दो का भाग दें लब्धि को तीन से गुणा करें उसमे चार का भाग दें। १ शेष में विलम्ब से पुत्र होगा (चिरंजी के लिए पार्थिव पूजन करना चाहिए), २ शेष हों तो पूर्व जन्म के पाप से संतान सुख नही (पितृ दोष गया यात्रा करें, हरिवंश पुराण का नवाह श्रवण करना, संतान गोपाल का लक्ष मंत्र का जप करना या करवाना संतान प्राप्ति के लिए शुभ होगा), ३ शेष में पुत्र लाभ होगा (किसी गरीब कन्या को विवाह में सहायता दें या गुप्तदान दें ऐसा करने से उत्पन्न पुत्र से सुख प्राप्त होगा), ४ एक और ७ शेष से शीघ्र संतान का लाभ होगा।

रोगी और रोग विचार (Health & Disease)

रोगादयमुत्स्थास्यति नवेती लग्नं भिषग् द्युनम |
व्याधिर्दशमं रोगी हिबुकं मेषजमित्याहूराचार्याः ||
क्रूरार्दिते विलग्ने वैद्यन्ना गुणस्तदौषधाद्रोगः |
वृद्धिमुपयाति दशमे क्रूरैर्निजबुद्धितोऽप्य गुणाः ……||

रोगी निरोग होगा या नहीं ऐसे प्रश्न में लग्न को वैद्य मानते, सप्तम भाव को रोग, दशम भाव को रोगी तथा चतुर्थ भाव को औषध जानना चाहिए। यदि लग्न में क्रूर ग्रह हों तो चिकित्सक से फायदा ण होकर उन की दवाई से रोग की वृद्धि होती है। दशम भाव में क्रूर ग्रह हों तो कुपथ्य आदि से रोग वृद्धि होती है। सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो तो एक रोग में दूसरा रोग होता है तथा चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो औषध से अन्य रोग उत्पन्न हो जाता है। यदि इन भावों में शुभ ग्रह हों तो रोगी निरोग होगा, ऐसा जानना चाहिए।

स्थिर राशि के लग्न गुरु हों या केंद्र, त्रिकोण में शुभ ग्रह हो तो जातक को स्वस्थ्य कहना चाहिए, यदि पाप ग्रह से युत या दृष्टि स्थिर राशि ला लग्न हो तो रोगी कहना चाहिए। केंद्र, अष्टम भाव तथा त्रिकोण में शुभ ग्रह हों एवं चन्द्र उपचय ३,६,१० या ११ भाव में हो और लग्न को शुभ ग्रह देखते हों तो रोगी स्वस्थ्य होता है। लग्नेश शुभ ग्रह हों और बलवान होते हुऐ केंद्र में हो या उच्च राशि का हो वा त्रिकोण में हो तो रोगी स्वस्थ्य होता और जीवित रहता है। एक भी बलवान शुभ ग्रह लग्न में हो तो रोगी जातक का रक्षक बनता है। और ३, ६, ९ या ११ भाव में शुभ ग्रह बैठे हों तो रोग का नाश होता है।

मुकदमे (Litigation), शत्रु बाधा, नौकर और शिकार

नौकर और मालिक का सम्बन्ध :- प्रश्न लग्न से २/ ७/ और अष्टम भावों में शुभ ग्रह हो ३/ ६ भावों में पाप ग्रह हो तो दोनों में अच्छा सम्बन्ध होता है। यदि इसके विपरीत ग्रह बैठे हो तो स्वामी और नौकर के बिच हमेशा कलह होती है।

भागा हुआ नौकर आयेगा या नहीं :- प्रश्न लग्नेश सप्तम भाव में स्थित होकर लग्न को देखें तो भागा हुआ नौकर मिल जाता है। यदि सप्तमेश लग्न में हो तो वह स्वयं आ जाता है। यदि सप्तम भाव में सूर्य हो और उसपर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो, स्थिर राशि में शुभ ग्रह हो तो वह नहीं मिलता है।

केश में जय पराजय (Court Case) :- प्रश्न लग्न के तृतीय भाव से अष्टम भाव तक शुभ गृह अधिक बलवान् हो तो प्रति वादी मुद्दालाह जीतेगा। यदि नवम भाव से द्वितीय भाव शुभ गृह अधिक बलवान् हो तो मुदई (वादी) जीतेगा। पाप गृह लग्न में स्थिति हो प्रश्न कर्त्ता जीतेगा, परन्तु वहां पाप गृह नीच राशि में हो या अस्त हो अथवा शत्रु राशि में हो तो हार जाएगा।

यदि लग्न और सप्तम स्थान में पाप ग्रह तुल्य बली हो या लग्नेश और सप्तमेश परस्पर मित्र हो तो संधि हो जायेगी। पाप ग्रह न्यूनाधिक बली हो तो अधिक बली हो जाएगा अर्थात् लग्न स्थित पाप ग्रह बली हो तो प्रश्न कर्त्ता की विजय होगी और सप्तमस्थ पाप ग्रह बलवान् हो तो शत्रु की विजय होगी। यदि लग्न सप्तमातिरिक्त भाव में दोनों पाप ग्रहों की परस्पर पूर्ण दृष्टि हो तो वादी प्रतिवादी दोनों शस्त्रों से घायल होते है। प्रश्न काल में लग्नेश, सप्तमेश परस्पर मित्र हो तो युद्ध छिड़ेगा

पति और पत्नी में पहले किसकी मृत्यु होगी :-
दम्पत्य वर्णा द्विगुणी कण्ताश्च मात्रा चतुर्गुणमग्नि हृताश्च | एकैके शून्यं पुरुषं निहन्ति समेषु भार्या मुनयो वदन्ति ||
अर्थात् प्रश्न लग्न में पति पत्नी के नाम के वर्ण व्यंजन अक्षरों को २ से गुणा करे, मात्रा स्वर को ४ से गुणा करें और दोनों को जोड़े उसमें ३ का भाग दें यदि १ या 0 शेष हो तो पुरुष की मृत्यु पहले होती है, २ शेष में पत्नी की मृत्यु पहले होती है

किसी वस्तु या शिकार सम्बन्धित प्रश्न :- प्रश्न लग्न में मंगल और बुध के बली होने पर शिकार खेलने (खेल/प्रतिस्पर्धा) में सफलता मिलती है। इन दोनों के निर्बल होने पर शिकार खेलने में सिद्धि नहीं मिलती। जल राशि में बलवान् ग्रह हो तो मछली आदि जलीय जानवरों का शिकार करते है। जब वनचर राशियाँ बलवान् ग्रह हो तो जंगल से शिकार खेलना शुभ होता है। यदि लग्नेश और सप्तमेश निर्बल हो केंद्र में स्थित हो तो शिकार खेलने में कष्ट होता है। बलवान् हो तो शुभ फल होता है। चन्द्र और लग्न के बिच जितने क्रूर ग्रह हो उतने की प्राणियों का बढ़ होगा। यदि अपने नवांश आदि में हो तो दूना कहना। शिकारी के नाम राशि और उस दिन के चन्द्र राशि के बीच पाप ग्रह हो तो हिरन आदि का शिकार होता है। नाम राशि और चन्द्र राशि के बीच पाप ग्रह हो तो हिंसक पशु का बढ़ होता है। यदु मिश्र ग्रह हो तो मिश्र पशुओं का शिकार होता है। यदि दोनों के बीच कोई ग्रह न हो तो कोई शिकार नही होता है।

सारांश (Conclusion)

जिस समय किसी भी कार्य के शुभाशुभ, लाभालाभ जानने की इच्छा हो उस समय का इष्ट कुंडली का ग्रह स्पष्ट, भावस्पष्ट, नवमांश और चलित कुंडली बनाकर विचार करना चाहिए। प्रश्न लग्न में चर राशि, बलवान् लग्नेश, कार्येश, शुभाग्रहों से युत या दृष्ट हों तथा वे प्राथन भाव / ४ / ५ / ७ / ९ और दशम भावों में हों तो प्रश्न कर्ता जिस कार्य के सम्बन्ध में पूछ रहा है वह जल्दी पूरा होगा।

यदि स्थिर लग्न हो लग्नेश और कार्येश बलवान् हों तो विलम्ब से कार्य होता है। द्विस्वभाव राशि लग्न में हों तथा प्रथम भाव / ४/ ५/ ७/ ९ या दशम भाव में बल वान पाप ग्रह हों लग्नेश, कार्येश हीनबल, नीच,अस्तंगत या शत्रू क्षेत्री हों तो कार्य सफल नहीं होता।

धन प्राप्ति के प्रश्न में द्वितीय भाव, एकादश भाव और दशम भाव और चन्द्र से; यश प्राप्ति के लिए तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, दशम भाव और इसके स्वामी तथा चन्द्र से; सुख, शान्ति, गृह, भूमि आदि की प्राप्ति के लिए चतुर्थ, नवम और दशम भाव इनके स्वामी और चन्द्र से भी; परीक्षा में यश प्राप्ति के लिए लग्न, पञ्चम, दशम भाव इनके स्वामी और चन्द्र से भी; विवाह के लिए द्वितीय से वैवाहिक जीवन, चतुर्थ से वैवाहिक सुख और सप्तम से विवाह और चन्द्र से भी; नौकरी, व्यवसाय, बड़े व्यापार और समस्याओं से निकलने का भी सप्तम, दशम और एकादश भाव और चन्द्र से भी; लाभ के लिए चतुर्थ, पञ्चम, दशम और एकादश भाव और चन्द्र से भी; और संतान प्राप्ति के लिए द्वितीय, पञ्चम और सप्तम भाव का विचार करें और गुरु से भी विचार करनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. प्रश्न कुण्डली क्या है और यह जन्म कुण्डली से कैसे अलग है?

जन्म कुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति पर आधारित होती है, जबकि प्रश्न कुण्डली उस सटीक क्षण (इष्ट काल) के ग्रहों की स्थिति पर बनती है जब जातक ज्योतिषी से कोई विशिष्ट प्रश्न पूछता है। यह तात्कालिक समस्याओं के समाधान में अत्यंत सटीक है।

Q2. चोरी गई वस्तु मिलेगी या नहीं, यह प्रश्न कुण्डली से कैसे जाने?

यदि सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो या लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो अथवा क्षीण चन्द्र सप्तम भाव में हो तो चोरी गयी या भूली हुई वस्तु नहीं मिलती। इसके विपरीत यदि प्रश्न लग्न से २/ ३/ ४ भावों में शुभ ग्रह हों तो नष्ट धन वापस आ जाता है।

Q3. प्रश्न कुण्डली में विवाह का विचार किन भावों से किया जाता है?

विवाह के लिए द्वितीय भाव से वैवाहिक जीवन, चतुर्थ भाव से वैवाहिक सुख, और मुख्य रूप से सप्तम भाव से विवाह और चन्द्र से भी विचार किया जाता है।

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