शरीर के 10 प्राण: स्थान, कार्य और रहस्य (The 10 Pranas)
By Astrologer Dr. Sunil Nath Jha (Vedic & Medical Astrologer)
उत्तर तथा पश्चिम दिशा के मध्य कोण को वायव्य (North-West) कहते है। इस दिशा का स्वामी या देवता 'वायुदेव' है। वायु पञ्च होते है:- प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान। हर एक मनुष्य के जीवन के लिए पाँचों में एक प्राण परम आवश्यकता होता है।
पांचो का शरीर में रहने का स्थान अलग-अलग जगह पर होता है। हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है, उसका नाम ‘प्राण’ (Vital Life Force) है। शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियां, नेत्र-श्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा अन्य सब अवयव-अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों को करते है।
Quick Guide: 5 मुख्य प्राणों के स्थान (Summary Table)
| प्राण का नाम (Name) | स्थान (Location) | मुख्य कार्य (Function) |
|---|---|---|
| 1. प्राण (Prana) | नासिका से हृदय तक (Chest area) | श्वास, भोजन निगलना, इन्द्रियों का संचालन। |
| 2. अपान (Apana) | नाभि से पाँव तक (Lower body) | मल-मूत्र विसर्जन, प्रसव (Childbirth)। |
| 3. समान (Samana) | हृदय से नाभि तक (Navel/Stomach) | भोजन पचाना, रस और धातु निर्माण। |
| 4. उदान (Udana) | कण्ठ से मस्तिष्क तक (Throat/Head) | वाणी (Speech), स्मृति, और जीवात्मा का उत्क्रमण। |
| 5. व्यान (Vyana) | सम्पूर्ण शरीर (Whole Body) | रक्त संचार (Blood Circulation), नाड़ी तंत्र। |
शरीर में प्राण का महत्व और ज्योतिष
प्राण से ही भोजन का पाचन, रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य, रज, ओज आदि सभी धातुओं का निर्माण होता है। प्राण के बलवान होने पर समस्त शरीर के अवयवों में बल, पराक्रम आते है।
यही कारण है कि कुण्डली में राजयोग (Raajyog) तभी फलित होता है जब जातक का प्राण और शरीर बलवान हो। निर्बल प्राण वाला व्यक्ति राजयोग होते हुए भी उसका सुख नहीं भोग पाता।
जैसे ही जीवात्मा किसी शरीर में प्रवेश करता है प्राण भी उसके साथ शरीर में प्रवेश करता है। अध्यात्म में इसे शिव और शक्ति का रूप माना गया है, ठीक वैसे ही जैसे शिवलिंग (Shivling) में प्राण प्रतिष्ठा द्वारा ऊर्जा का संचार किया जाता है।
मुख्य प्राण - The 5 Major Pranas
१. प्राण (Prana Vayu)
इसका स्थान नासिका से हृदय (Heart) तक है। नेत्र, श्रोत्र, मुख आदि अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते है। यह सभी प्राणों का राजा है।
२. अपान (Apana Vayu)
इसका स्थान नाभि से पाँव तक है। यह गुदा इंद्रिय द्वारा मल व वायु तथा मूत्रेन्द्रिय द्वारा मूत्र व वीर्य को तथा योनि द्वारा रज व गर्भ को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करता है।
३. समान (Samana Vayu)
इसका स्थान हृदय से नाभि तक है। यह खाए हुए अन्न को पचाने (Digestion) तथा पचे हुए अन्न से रस, रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता है।
४. उदान (Udana Vayu)
यह कण्ठ से शिर (मस्तिष्क) तक के अवयवों में रहता है। शब्दों का उच्चारण, वमन आदि के अतिरिक्त यह अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को उत्तम योनि में ले जाता है।
५. व्यान (Vyana Vayu) - नाड़ियों का रहस्य
यह सम्पूर्ण शरीर में रहता है। हृदय से मुख्य 101 नाड़ियाँ निकलती हैं। इन नाड़ियों और नाड़ी तंत्र (Nervous System) के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा विशेष लेख पढ़ें।
प्रत्येक नाड़ी की 100-100 शाखाएँ है तथा प्रत्येक शाखा की भी 72,000 उपशाखाएँ है। समस्त शरीर में रक्त संचार का कार्य यही करता है।
5 उपप्राण (The 5 Upa-Pranas) और धनंजय प्राण
मुख्य प्राणों के अलावा 5 उपप्राण भी होते हैं: नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।
- १. नाग (Naga): यह कण्ठ से मुख तक रहता है। डकार, हिचकी आदि कर्म इसी के द्वारा होते है।
- २. कूर्म (Kurma): इसका स्थान नेत्र गोलक है। यह पलकों को खोलने-बंद करने की क्रिया करता है।
- ३. कृकल (Krikala): यह मुख से हृदय तक रहता है। भूख, प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है।
- ४. देवदत्त (Devadatta): यह नासिका से कण्ठ तक रहता है। इसका कार्य छींक, आलस्य, तन्द्रा, निद्रा आदि को लाने का है।
५. धनंजय प्राण (Dhananjay Pran)
यह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक है। इसका कार्य शरीर के अवयवों को खींचे रखना, माँसपेशियों (Muscles) को सुंदर बनाना आदि है।
विशेष रहस्य: शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर भी यह तुरंत नहीं निकलता, यह अंत तक रहता है। इसके अभाव में मृत शरीर फूलने लगता है।
प्राणों की रक्षा और उपाय
इसलिए हमें प्राणों की रक्षा करनी चाहिए। शुद्ध आहार, प्रगाढ़ निद्रा, ब्रह्मचर्य, और विशेष रूप से तंत्र साधना और ध्यान (Tantra Sadhna & Meditation) के माध्यम से शरीर को प्राणवान बनाना चाहिए।
क्या आप स्वास्थ्य समस्याओं या मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं?
यदि आपके शरीर में प्राण या उप-प्राण असंतुलित हैं, तो यह गंभीर रोगों का कारण बन सकता है। अपनी कुंडली और नाड़ी विश्लेषण के लिए आज ही संपर्क करें।
Direct Contact: Visit Contact Page
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें