क्या महादशा आपके जीवन को बर्बाद कर रही है? जानें 120 वर्ष का सटीक फलादेश!
लेखक एवं मार्गदर्शक: ज्योतिषाचार्य डॉ. सुनील नाथ झा (Dr. Sunil Nath Jha)
महादशा शुभाशुभ विचार
दशाहताः खेट्दशाभिरत्र खेटैरवाप्तं तु भवन्ति मासाः |
शेषं खरामैरनिर्हतंं हराप्तं दिनाः सभाद्यान्यरजा दशैवम् ||
सूर्येन्दुक्ष्माजमतसो वाक्पतिर्मन्द चन्द्रजौ |
केतुशुक्रौ क्रमादेते विज्ञेयाश्च दशाधिपाः ||
रसाशामुनिधृत्यब्दा भूपतिर्धृतिवत्सराः |
सप्तेंदवो नगा व्योमबाहबो भास्करादिताः ||
दहनात्स्वर्क्षपर्यन्तं गणयेन्नवभिर्हरेत् |
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार महादशा कई है विंशोत्तरी, अष्टोत्तरी, योगिनी सहित ३२ प्रकार की दशाएं होती है | महादशाओं में प्रत्येक ग्रह की अन्तर्दशा के आनयन के लिए जिस जन्म नक्षत्र ग्रह की महादशा में जिस ग्रह की अन्तर्दशा का ज्ञान हो, उन दोनों ग्रहों की महादशा के वर्षों का गुणा करें ९ से भाग देने पर लब्धि मास होता है, यदि शेष रहे तो शेष को ३० से गुणा करे ९ से भाग देने पर लब्धि दिन हो जाएगा, इसी प्रकार शेष को ६० से गुणा कर ९ से भाग देनें से लब्धि घटी आदि होते है |
दशा ज्ञान के लिए कृतिका से लेकर जन्म नक्षत्र पर्यन्त की संख्या में ९ से भाग देने से शेष अंक तुल्य सूर्य आदि क्रम से दशा होती है | दशा के द्वारा प्रत्येक ग्रह की फल प्राप्ति (सटीक फलादेश) का समय जाना जाता है | सभी ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यान्त्तार्र्दशा, सूक्ष्म दशा और उतरोत्तर सबसे ज्यादा प्राणपद में दशा शुभाशुभ फल देते है | जो ग्रह उच्च राशि, मित्रराशि, मूल त्रिकोण, शुभ नवांश या अपनी राशि में रहता है, यह अपनी दशा जिन भाव से शुभ सम्बन्ध बनाता हो तो शुभ फल और जो नीच राशि, शत्रु राशि और अस्तंगत हो वे अपनी दशा में अशुभ फल धन- हानी, रोग, अवनति आदि फलों को प्राप्त करते है |
यथा- लग्न से शुभ सम्बन्ध द्शापति बनाता हो तो शुभ फल देता है, द्वितीयेश से युक्त हो बली हो तो कुटुम्बं सुख, धन लाभ, सम्मान और ख्याति प्राप्त करते है | शुभ द्शापति तृतीयेश से युक्त हो तो पराक्रम का विकास, साहसिक कार्य से लाभ और सहोदरों से सुख मिलता है, चतुर्थेश से युक्त हो तो मकान का निर्माण, वाहन सुख, जमीन की उपलब्धि होती है | पञ्चमेश से युक्त हो या उत्तम सम्बन्ध बनाता हो तो पुत्र का लाभ, सम्मान, विद्यालाभ होता है | षष्ठेश से उत्तम सम्बन्ध बनाता हो तो ऋण से मुक्ति, शत्रु का पराजय, रोग का नाश होता है |
सप्तम भाव से सम्बन्ध बनावें तो विवाह, पत्नी सुख, व्यवसाय से आर्थिक लाभ और यात्रायें होती है | अष्टमेश से सम्बन्ध बनावें तो अनुसन्धान, गाड़ी, सम्पति का लाभ आदि होता है | भाग्येश से शुभ सम्बन्ध बनावें तो धार्मिक कार्य, तीर्थ यात्रा, भाग्योदय होता है | दशमेश से शुभ सम्बन्ध बनावे तो पद, प्रतिष्ठा, उन्नति, कार्य की सिद्धि, मनोरथ की पूर्ति और सफलता मिलती है | एकादश भाव से अच्छा सम्बन्ध बनावें तो लाभ और द्वादश भाव से सम्बन्ध बनावें तो यात्राये, मठ मन्दिर का निर्माण अस्पताल का निर्माण आदि उपकार के कार्य करेगें |
दशापति नीच राशि में हों, अस्त हो, पाप ग्रह के साथ हो, पाप ग्रह के मध्य में हो, पाप ग्रह से दृष्ट हो, शत्रु क्षेत्री हो, राहू और केतु से युक्त हो, निर्बल हो, शुभ ग्रह होने पर भी लग्न से ६ / ८ / द्वादश भावों में हो, पाप ग्रह होने पर भी ८ / १२ भावों में हो, द्शापति से ६ / ८ / द्वादश भावों में मारकेश हो, दशापति के शत्रु हो तो अनिष्ट फल देता है |
जिस भाव का स्वामी होगा या जिस भाव का कारक हो उससे सम्बन्धित शुभ फलों का नाश करेगा | जब शुभ ग्रह, सुख भाव में होंगे तो सुख मिलेगा । पाप ग्रह दुःख भाव में होंगे तो दुःख की प्राप्ति होगी। शुभ ग्रह पाप भाव में होंगे तो उस ग्रह से संबंधित कष्ट होंगे। इस परिस्थिति में इलाज ग्रहों का नहीं भावों का करना चाहिए ।
भावों की दशा जीवन इस प्रकार से चलती है :---
- 1. सूर्य, मंगल, शनि और राहु यह दुख देने वाले ग्रह हैं।
- 2. शुक्र, गुरु और केतु यह सुख देने वाले ग्रह हैं।
- 3. चंद्र और बुध दोनों सुख व दुःख। लेकिन दु:ख अधिक है।
इस तरह कुंडली में भावों से वयोवर्ष का विचार कर फलित करना चाहिये I
षड्वर्ग का फलादेश :-
सर्व प्रथम किस वर्ग से क्या -क्या विचार करनी चाहिए यह जान लेना चाहिए | लग्न से समस्त जीवन का शुभ और अशुभ फलों का विचार करना चाहिए | होरा से जातक की संपत्ति का, द्रेष्काण से भाई का, चतुर्थांश से भाग्य का, सप्तमांश से पुत्र पौत्रादिक, नवांश से स्त्री का, दशमांश से राज्यादि विशिष्ट फल का, द्वादशांश से माता- पिता का, षोडशांश से वाहनों का, सुख -दुःख का, विंशांश से अरिष्ट का, खवेदांश से शुभ अशुभ, अक्षवेादंश और षष्ट्यंश से सब वस्तुओं का विचार करना चाहिए | जिस भाव में क्रूर षष्ट्यंशेश हो उस भाव का नाश होगा | जिस भाव में शुभ षोडशांशेश होगा उस भाव की पुष्टि होगी |
लग्न और सूर्य से ९ / १० ओर ११ भावों से पिता का विचार चाहिए | लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, नवम और एकादश भावों से जो विचार करना चाहिए वही चन्द्र से भी २ / ४ / ९ और ११ भावों से करना चाहिए | तृतीय भाव से जो विचार करना चाहिए वही मंगल से तृतीय भाव से भी विचार करना चाहिए | षष्ठ भाव से जो विचारणीय है वही बुध से भी षष्ठ भाव से विचार करना चाहिए | पञ्चम भाव से जो विचारणीय है वही गुरु से पञ्चम भाव से विचारणीय है |
शुक्र से पत्नी का विचार और शनि से आयु का विचार किया जाता है तो क्रमशः शुक्र से सप्तम से विवाह और शनि के अष्टम भाव से भी आयु का विचार किया जाना चाहिए और जिन भावों की महादशा चले उससे सम्बन्धित शुभाशुभ फल प्राप्त जातक करते है | (गोचर में प्रभाव जानने हेतु त्रिपताकी चक्र पढ़ें) | आपके कुंडली में सारे महादशा जन्म नक्षत्र से चलता है परन्तु नैसर्गिक दशा में होती है I उसका भोग काल इस प्रकार है :-
- ✨ जन्म दिन से १ वर्ष तक चन्द्रमा में ( सर्दी-जुकाम) की दशा चलती है I
- ✨ १ वर्ष से ३ वर्ष तक मंगल में ( चोट लगने) की दशा चलती है I
- ✨ ३ वर्ष से १२ वर्ष तक बुध में (ज्ञान ) की दशा चलती है I
- ✨ १२ वर्ष से ३२ वर्ष तक शुक्र में ( नौकरी , भोग-विलास ) की दशा चलती है I
- ✨ ३२ वर्ष से ५० वर्ष तक गुरु में (कर्म का ) दशा चलती है I
- ✨ ५० वर्ष से ७० वर्ष तक सूर्य में (यश का ) दशा चलती है I
- ✨ ७० वर्ष से उत्तरार्ध १२० वर्ष तक (मोहभंग का) दशा चलती है I
कुछ आचार्यों का कुछ भिन्न मत है जो निम्न :- जन्म कुंडली में यदि गुरु या अन्य ग्रह बलवान् या शुभ फल देने वाला हों अर्थात् किसी अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो जातक को इन अवस्थाओं में उत्तमोत्तम फल मिलेगा :--
- गुरु से १६ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- सूर्य से २२ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- चन्द्र से २४ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- शुक्र से २५ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- मंगल से २८ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- बुध से ३२ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- शनि से ३६ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- राहु से ४२ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
- केतु से ४८ वर्ष से उत्तम फल मिलेगा I
सप्तम भाव में प्रत्येक ग्रह का फल -
१. सूर्य- सप्तम भाव में सूर्य हो तो नारी दुष्ट स्वभाव, पटी प्रेम से वंचित और कर्कश होती है |
२. चन्द्र- सप्तम भाव में चन्द्र हो तो कोमल स्वभाव की, लज्जाशील तथा उच्च का चन्द्र हो तो वस्त्र, आभूषण वाली, धनिक और सुंदरी होती है |
३. मंगल- सप्तम में मंगल हो तो नारी सौभाग्य हीन, कुकर्मरत व कर्क या सिंह राशि में शनि के साथ मंगल हो तो व्यभिचारिणी, व्र्श्या, धनि व बुरे स्वभाव की होती है |
४. बुध- सप्तम भाव में बुध हो तो नारी आभूषण वाली, विदुषी, सौभाग्यशालिनी और पति की प्यारी होती है | उच्च राशि का बुध हो तो लेखिका, सुन्दर पतिवाली, धनी और नाना प्रकार के ऐश्वर्य को भोग्न्र्वाली होती है |
५. गुरु- सप्तम भाव में गुरु हो तो नारी पतिव्रता, धनी, गुणवती और सुखी होती है | चन्द्र कर्क राशि में और गुरु सप्तम में हो तो नारी साक्षात् रतिस्वरुपा होती है | उसके समान सुंदरी कम ही नारियां लोक में मिलती है |
६. शुक्र- सप्तम भाव में शुक्र हो तो नारी का पति श्रेष्ठ, गुणवान, धनी, वीर, कामकला प्रेमी होता है तथा वह नारी स्वयं रसिका ओए सुन्दर वस्त्राभूषणों वाली होती है |
७. शनि- सप्तम भाव में शनि हो तो पति रोगी, दरिद्र,व्यसनी, निर्बल होता है | यदि उच्च का शनि हो तो पति धनिक, गुणवान, शीलवान और कामकला का यश मिलता है | शनि पर राहु या मंगल की दृष्टि हो तो स्त्री विधवा होती है |
८. राहु- सप्तम भाव में राहु हो तो अपनी कुल को दिश लगानेवाली, दुखी, पति सुख से वंचित तथा राहु उच्च का हो तो सुन्दर और स्वस्थ पति मिलता है |
ग्रहों की महादशा फल ➖
सूर्य महादशा -
ज्ञानाथार्गमकीर्तिपौरुषसुखप्राप्तीश्वरानुग्रहान् |
भानोः पापदशा करोति विफलोद्योगार्थहान्यामयान्
राजक्षोभमहीशकोपजनकारिष्टाग्निबाधोदयात् ||
यदि सूर्य शुभ उच्च, स्वगृह, केंद्र, त्रिकोण एकादश भाव में, नवमेश दशमेश से युत हो तो अपनी दशा में होकर अच्छे सम्बन्ध में लग्न से ३ / ६ / १० / एकादश भावों में हो तो उच्च पद की प्राप्ति, ज्ञान की वृद्धि, यश की प्राप्ति, पुरुषार्थ की वृद्धि, ईश्वर की कृपा, पुत्र की प्राप्ति और आध्यात्म की वृद्धि आदि शुभ फलों की प्राप्ति होती है | मेष राशि में नेत्ररोग, राजदण्ड, वृष में हो तो पुत्र और पत्नी के सुख से हिन्, हृदय और आँख का रोग होता है | मिथुन राशि में आर्थिक सम्पन्नता, शास्त्र का ज्ञान, कर्क में राज सम्मान, धनलाभ, माता-पिता और भाई से पृथकता, वाट रोगों से पीड़ा होती है |
सिंह में हो तो राजा से सम्मान, उच्च पद की प्राप्ति, कन्या में हो तो कन्या रत्न की प्राप्ति, धर्म में अभिरुचि, तुला में हो तो स्त्री, पुत्री की चिंता, प्रदेश गमन, वृश्चिक में हो तो प्रतापी, विष और अग्नि से पीड़ा, धनु में हो तो राजा से सम्मान, विद्या की प्राप्ति, मकर में हो तो पत्नी, पुत्र, धन की चिंता, त्रिदोष रोगी, परन्तु कार्यो की सिद्धि में सफलता, कुम्भ में हो तो चुगलखोर, हृदय रोगी, कुटुम्बियों से वितोध और मीन में हो तो वहां लाभ, प्रतिष्ठा में वृद्धि, धन सम्मान की वृद्धि होगी पर विषम ज्वर से पीड़ा होगी |
इस प्रकार पाप फल होने पर यदि शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो मध्य में शुभ फल भी होता है | जब सूर्य ६ / ८ / १२ भाव में नीच हो, निर्बल हो, पाप प्रभाव में हो, शत्रु गृही हो, पाप कर्त्तरी में हो तो अनिष्ट होता है | आप मानसिक तनाव, शरीर में कष्ट, असफलता, राजदण्ड, पिता को कष्ट या पिता से कष्ट, अग्नि पीड़ा, पद से हटना, ईश्वर की भक्ति में कमी आदि अनेक अनिष्ट फलों को भोगना पड़ता है | प्रिय जनों का वियोग, कलह, नेत्ररोग, धनहानि |
चन्द्र फल -
क्षेत्रारामगृहसनद्विजवरश्रीशोभानान्दोलिका |
इन्दोः पापदशान्नहीनकृपणानंतार्थनाशामय
प्रज्ञाहीनजुगुष्समातृमरणक्षोभातिशीतज्वरान् ||
यदि चन्द्रमाँ अपनी उच्च राशि में, स्वराशि, केंद्र, त्रिकोण, व एकादश भाव में, शुभ ग्रह से युत, पूर्ण बलवान्, नवमेश या दशमेश से हो तो अपनी दशा में सम्मान, मंत्री, विद्याधन की प्राप्ति, मातृ सुख, समाज निर्माण आदि शुभ कृत्य, भूमि, आसन, लक्ष्मी, सुन्दर, विनय, ख्याति, परोकर की वृत्ति, यश प्रवास में अधिक प्रेम आदि शुभ फल देता है | नीच राशि, शत्रु राशि, पाप पीड़ित हो तो अनिष्ट फलदायक होता है | चन्द्र यदि अशुभ फल नीच, ६ / ८ / या १२ भाव में, क्षीण, पाप ग्रह से युत व दृष्टि निर्बल हो तो धनहीन, कृपणता, रोग वृद्धि, बुद्धि की हीनता, निद्य कर्म मानसिक चिंता, शीत ज्वर, स्वजनों से कलह आदि अशुभ फल देता है | मेष राशि का अपनी दशा में स्त्री सुख, विरोध यात्रा, कलह और सिर में रोग उत्पन्न करता है | वृष राशि में हो तो धन वाहन की उपलब्धि करवाता है | पत्नी से इच्छा सम्बन्ध, माता-पिता को कष्टप्रद होता है |
मिथुन राशि चन्द्र देशांतर गमन, संपत्ति का लाभ करवाया है | कर्क राशि का चन्द्र गुत्रोग, धन धान्य की वृद्धि और कलाप्रेमी बनाता है | सिंह राशि में बुद्धि विकास, धनलाभ और कन्या राशि का चन्द्र विदेश यात्रा, स्त्री प्राप्ति, काव्य प्रेम, अर्थ लाभ, तुला राशि का चन्द्र विरोध, चिंता, अपमान, व्यापार से धन लाभ, वृश्चिक का चन्द्रचिन्ता रोग, धर्म हानि, धनु का चन्द्र वाहन प्राप्ति धन नाश, मकर में पुत्र एवं पत्नी का सुख, धन लाभ, कुम्भ में व्यसन, पेडू में पीड़ा, दन्त और नेत्ररोग और मीन में हो तो अर्थ लाभ, पुत्र लाभ, शत्रु नाश होता है |
इस प्रकार पाप फल होते है हुए यदि शुभ ग्रह से सम्बन्ध हो तो मध्य में शुभ फल भी देता है | नीच राशि का चन्द्र अष्टम भाव में हो तथा पाप ग्रह से युत हो तो अपनी दशा में मृत्यु अथवा जाती से अपमान करता है |
मंगल फल -
प्रज्ञास्वच्छमनः पराक्रमदहच्छु त्रुजनान्वानुजान् ||
पापो भौमरुजार्तिदं च कलहं चौराग्निबंधव्रणम्
अक्षिक्षीणमहीशपीडनरुजः क्षोक्षतिं दास्यति ||
यदि मंगल बली शुभ फल उच्च, स्वराशि, केंद्र, त्रिकोण, एकादश भाव में व शुभ ग्रह युत व दृष्ट द्वितीय भाव में, बलवान अथवा शुभ ग्रह के नवांश में हो तो अपनी दशा में भूमि का लाभ, धन लाभ, बुद्धि, स्वच्छ मन, पराक्रम से शत्रुओं का नाश, भाई का सुख, शास्त्र, राजा और औषध आदि से धन लाभ इत्यादि शुभ फल देता है | मंगल मेषादि राशियों में जाने पर अपनी दशा में उक्त फलों को प्रदान करता है |
यथा मेष में धन लाभ, अग्नि से पीड़ा, वृष में रोग, अन्य से धन लाभ, परोपकार, मिथुन राशि में विदेश यात्रा, कुटिल वृति, व्यय, पित्त वायु से कष्ट, कर्ण में रोग, कर्क में धन लाभ, क्लेश पत्नी पुत्र से अलग निवास, सिंह में राजसता से लाभ, शस्त्राग्नि पीड़ा, व्यय, कन्या में पुत्र, भूमि, धनादि का लाभ, तुला में स्त्री और धन का अभाव, झंझट, रोग, खर्च अधिक चिन्ता | वृश्चिक में अन्न -धन का लाभ, अग्नि भय और शस्त्र से पीड़ा, धनु में राजसम्मान, जय लाभ, धनागम, मकर में अधिकार की प्राप्ति, स्वर्णादि लाभ, कार्य सिद्धि, कुम्भ में व्यवहार में कमी, दरिद्रता, रोग, खर्च अधिक चिन्ता और मीन राशि में हो तो ऋण, चिन्ता, चर्म रोग आदि प्राप्त होता है |
मंगल अशुभ फल नीच राशि, ६ / ८ / या १२ भाव में, निर्बल अथवा पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो तो शारीरिक व्याधि रुधिर, ज्वर, पक्षा घात और मूर्च्छा रोग होते है | स्त्री से कलह, चोर, किसी से झगडा, अग्नि तथा बंधन आदि से भय, व्रण, नेत्र की क्षीणता, राजा से कष्ट, क्षोभ मन को कलेश, धन नाशआदि रोगों का उपद्रव इत्यादि होता है | पाप फल होने पर यदि शुभ सम्बन्ध हो तो कुछ शुभ फल भी देता है |
राहु फल-
धर्मार्थागमपुण्यतीर्थचलनज्ञानप्रभावोच्छ्रयान् |
राहोः पापदशाऽहिभीतिविषभीः सर्वाङ्गरोगात्तिकृत्
शस्त्राघातविरोधवृक्षपतनं चारातिपीडोदयान् ||
राहु की दशा यदि कर्क, कन्या, वृश्चिक या धनु राशि में, केंद्र, त्रिकोण या ३, ६, १० या ११ भावों में शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो तो अनेक प्रकार से कल्याण, राज्य लाभ, धर्म, धनागम, पुण्य तीर्थों की यात्रा, ज्ञान, चुनाव लड़ने पर जीत और मंत्री पद की प्राप्ति होती है | प्रभाव उन्नति आदि शुभ फल करता है | मेष राशि में राहु हो तो अर्थ लाभ, साधारण सफलता, घरेलू झगड़ा, भाई से विरोध, वृष राशि से राज्य लाभ, अधिकार प्राप्ति, कष्ट, सहिष्णुता सफलता, मिथुन में हो तो दशा के प्रारम्भ में कष्ट, मध्य में सुख, कर्क में हो तो अर्थ लाभ, पुत्र लाभ, नवीं कार्य करना, धन संचित करना |
सिंह में हो तो प्रेम, ईर्ष्या, रोग, सम्मान, कार्यों में सफलता, कन्या में हो तो मध्यवर्ग के लोगों से लाभ, व्यापार से लाभ, व्यसनों से हानि, नीच कार्यों से प्रेम, संतोष, तुला राशि का हो तो झंझट, अचानक कष्ट, बन्धु-बांधवों से क्लेश, धन लाभ, यश और प्रतोश्था की वृद्धि, वृश्चिक राशि का राहु हो तो आर्थिक कष्ट,. शत्रुओं से हानि, नीच कार्यरत, धनु का हो तो यश लाभ, प्रतिष्ठा, उच्च पद - प्राप्ति, मकर का राहु हो तो सिर में रोग, वात रोग, आर्थिक संकट, कुम्भ का हो तो धन लाभ, व्यापार से साधारण लाभ, विजय और मीन का हो तो विरोध, झगड़ा, अल्प लाभ, रोग आदि बातें होती है
| राहु यदि अशुभ फल नीच राशि अष्टम व द्वादश भाव में, पाप ग्रह से युत व दृष्ट हो तो सर्पभय, विषभय, रोग, दुखः, शस्त्रघात, विरोध, वृक्ष से गिरता, शत्रु पीड़ा आदि विविध प्रकार के भयंकर उपद्रव करता है |
गुरु फल -
श्रीसौभाग्यगुणाकराश्रितजनाद्यांदोलिकावैभवान् |
जैव्या पापदशा महीश्वरभयाद्व्याधिं च धैर्यच्युतिं
धान्यानर्थमहीसुतार्तिजनकक्षोभाशनार्तिक्षयान् ||
गुरु यदि शुभ, उच्च, मूल त्रिकोण, स्वराशि, स्वहोड़ा, स्वनवांश केंद्र में हो तो अपनी दशा में शुभ फल देता है और आदर्श व्यक्ति या उच्च पद मिलता है, पुत्र, सौभाग्य, सद्गुण, आश्रित जन अर्थात् कुटुम्ब वर्ग, धन-वैभव आदि है | इसमें ज्ञान का लाभ, वस्त्र वाहन आदि की उपलब्धि होती है, अगर गुरु मेषादि राशियाँ में हो तो क्रमशः निम्न फल होता है, मेष में उच्च पद प्राप्ति, विद्या, पत्नी, धन, पुत्रों का लाभ |
यदि गुरु अशुभ से राज्य भय, व्याधि, अधीरता, धान्य का नशा, अनर्थ, पृथ्वी और पुत्र से कष्ट, पितृ कष्ट, मनोव्यथा,खाने पीने का आभाव, कंठ में दाह आदि अशुभ फल करता है | वृष में गुरु से पुत्र, धन, सम्मान मिलता है परन्तु अशुभ होने से रोग, विदेश यात्रा और व्यर्थ चिंता | मिथुन में गुरु से विरोध और धन नाश | कर्क गुरु से लाभ, ऐश्वर्य और ख्याति | सिंह में गुरु से राज्य सम्मान, पुत्र, पत्नी, बन्धु मिन्त्रों से अच्छा सम्बन्ध | कन्या में गुरु से किसी उच्च वर्ग की स्त्री से लाभ, प्रशासनिक कार्य, विवाद, कलह |
तुला में फोड़ा फुंसी, विवेक अभाव | वृश्चिक में पुत्रलाभ, निरोगता और ध लाभ | धनु में गुरु से सेनापति या प्रोमोशन, मंत्री, सदस्य, उच्च पद की प्राप्ति | मकर में आर्थिक कष्ट, गुह्य स्थानों में रोग | कुम्भ में राजा से सम्मान, विद्या धन आदि का लाभ | मीन में विद्या की उपलब्धी, पुत्र पत्नी का सुख प्राप्त होता है | यदि गुरु नीच राशि, अस्त, शत्रुघर का पाप पीड़ित और वक्री हो तो जातक के कंठ में रोग, दाह, परीक्षा में असफलता का सामना करना पड़ता है |
शनि फल -
क्षेत्रग्रामपूरादिनायाकबहुव्यापारदक्षोत्सुकान् |
मन्दः पापफलो विषार्तीधनहृददेहार्तिव्यर्थोद्यान्
राजक्रोधविरुद्धकार्यविचलोद्योगांगपीडोद्यान् ||
शनि यदि बलवान् स्वोच्च राशि, मूल त्रिकोण, स्वगृही, स्वनवांश होकर शुभ सम्बन्ध में शुभ दृष्टि युक्त होकर केंद्र त्रिकोण में हो तो अपनी दशा में वैभव, बुद्धि, यज्ञ. भूमि, गाँव, नगर आदि का नायक या अधिकारी, व्यापारी, चतुर, उत्साही आदि शुभ फल करता है | शनि मेष राशि में हो तो स्वंतत्रता, प्रवास, मर्म स्थान में रोग, चर्म रोग, बन्धु बान्धव से वियोग,| वृष में वायु पीड़ा, उद्योग रहित, कलह प्रिय | मिथुन में ऋण , कष्ट, चिन्ता | कर्क में आँख कान में रोग, विपत्ति, बन्धु नाश |
सिंह में रोग कलह, आर्थिक कष्ट | कन्या में मकान का निर्माण, भूमि लाभ | तुला में धन धान्य लाभ, विजय | वृश्चिक में भ्रमण, कृपणता, नीच संगती, आर्थिक कष्ट | धनु में राज सम्मान, ख्याति, प्रसन्नता | मकर में आर्थिक संकट, विश्वाघात, बुरी संगती | कुम्भ में धन, पुत्र आदि का लाभ और मीन में अधिकार प्राप्ति, सुख, सम्मान आदि शुभ फलों की प्राप्ति होती है | काल नरस्य दुःखम् न्याय का मालिक शनि यदि अशुभ हो तो जातक अगर अपनी सीमा से ज्यादा गलत कार्य करेगे तो दुःख योग है | विष भय, धन नाश, शारीरिक पीड़ा, चर्म रोग, त्रिदोष, राजकोष, विरोधी कृत्य करने वाला, चल मन, निष्फल उद्योग, वायु विकार आदि अशुभ फल करता है |
बुध फल -
च्छ्रेयःसौख्य गृहस्वबन्धुविजयप्राप्तीष्टवस्त्वागमन् |
बौध्याः पापदशाविदेशगमनं क्षोभः स्वबन्धुक्षयः
प्रज्ञाहीनमतिर्धनार्त्तिकलहक्षेत्रार्थनाशापदः ||
बुध यदि शुभ स्वोच्च, स्वराशि, स्वनवांश, बली ग्रहों से दृष्टि हो, केंद्र या त्रिकोण में हो तो अपनी दशा में उन्नति, वस्त्राधिक्य, धान्य, उन्नति, कल्याण, सुख, घर, भाई, विजय प्राप्ति,अभिलाषित वस्तु का आगमन आदि शुभ फल करता है (बुध वाणी का कारक है, स्वर शास्त्र से भी इसका विचार होता है) | मेष में बुध धन हानि, छल कपट से युक्त, कार्य में तरक्की, वृष में धन लाभ, यश लाभ, पारिवारिक तनाव, विषैले पदार्थ से कष्ट होता है | मिथुन में अल्प लाभ, सामान्य कष्ट, माता को सुख | कर्क में धनार्जन, काव्य सृजन, प्रतिभा की जागृति, विदेश गमन | सिंह में ज्ञान, यश, धन नाश, |
कन्या में ग्रंथों का निर्माण, प्रतिभा का विकास, धन ऐश्वर्य, तुला में व्यवसाय से धनलाभ | वृश्चिक में काम पीड़ा, अनाचार, खर्च | धनु में ऐश्वर्य लाभ, उच्च पद की प्राप्ति, शासन की उपलब्धि | मकर में नीचों से मैत्री, धन हानि, सामान्य लाभ | कुम्भ में बन्धुओं को कष्ट, दरिद्रता, रोग, दुर्बलता | मीन में खांसी, विष, अग्नि, शस्त्र से पीड़ा, अल्प हानि आदि | बुध यदि अशुभ फल हो तो परदेश गमन, मनोव्यथा,बन्धुनाश, मतिहीनता, धननाश, कलह, भुमिनाश, कफ- पित - वात से रोग आदि अशुभ फल करता है |
केतु दशा -
म्लेच्छक्ष्मापतिलब्धभाग्यकवनप्रारम्भशत्रुक्षयान् |
केतोः पापदशातिकष्टविफलानर्थक्रियायोगह्रत् -
शूलास्थितज्वर कंपनद्विजजनद्वेपातिमूर्ख क्रियान् ||
केतु फल - केतु यदि शुभ हो तो अपनी दशा में विजय, क्रूरकर्म से धन लाभ, म्लेच्छ राजा से भाग्योदय, यज्ञ, शत्रु नाश आदि शुभ फल करता है | यदि मेष में यश और धन लाभ प्राप्ति | वृष में कष्ट, हानि, पीड़ा, चिन्ता आदि होती है | मिथुन में कीर्ति लाभ, रोग | कर्क में कर्क में सुख, कल्याण, मित्रता, पुत्रलाभ, स्त्री सुख | सिंह में अल्प सुख, धन लाभ| कन्या में हो तो निरोग, प्रसिद्ध, नवीन कार्य करने की रूचि | तुला में हो तो व्यसनों में रूचि, धन हानि | वृश्चिक में धन, सम्मान, पुत्र की प्राप्ति, कफ- वात जनित रोग |
धनु में सिर में रोग, नेत्रपीड़ा, भी, झगड़े | मकर में हानि, व्यापार से लाभ, नवीन कार्य कार्यों में सफलता | कुम्भ में आर्थिक संकट, पीड़ा, चिन्ता, वियोग और मीन राशि में हो तो लाभ, यश, ख्याति, विद्या लाभ आदि होते है | केतु यदि अशुभ फल हो तो अत्यंतकष्ट, निष्फल समय, और अनर्थ करने वाली क्रिया का आरम्भ, शारीरिक कष्ट ह्रदय में शूल दर्द, अस्त ज्वर, देह कंप, ब्राह्यणादि वर्गों से वैर, अति मूर्खतापूर्ण कर्म आदि अशुभ फल करता है |
शुक्र महादशा -
ष्टैश्वर्यैर्युतधर्मबुद्धिकनकारामाश्वगीतोंत्सवान् |
शौक्री पापदशा कलत्रभयकृन्नीचार्थहानिप्रदा
तिर्यग्जन्तुसमुत्थदोषविपुलास्त्रीवर्गरोगोद्भवान् ||
शुक्र यदि स्वोच्च, स्वत्रिकोण, स्वराशि, स्वन्वांश, मित्र आदि शुभ राशि में शुभ ग्रहों से दृष्टि और युक्त हो क्रन्द्र त्रिकोण में स्थित हो तो अपनी दशा में सुख, सौभाग्य,संतान, पत्नी, उन्नति, अष्ट प्रकार के ऐश्वर्य, धार्मिक बुद्धि, संपन्न संगीत कलादि सम्पन्न रहता है | मेषादि राशिगत होने पर यथा मेष राशि में मन में चंचलता, उद्वेग, विदेश भ्रमण, धन हानि, वृष में विद्या लाभ, धन, पत्नी सुख, मिथुन में काव्य प्रेम, प्रसन्नता, धन लाभ, विदेश, व्यवसाय में उन्नति, कर्क में उद्यम से लाभ, स्त्री से लाभ |
सिंह में आर्थिक परेशानी, पुत्र हानि, पशुओं से लाभी, कन्या में आर्थिक कष्ट, दुःख, प्रदेश गमन, पत्नी पुत्र से विरोध, तुला में ख्याति, भ्रमण, व्यापार से लाभ, वृश्चिक में प्रताप, लाभ, चिंता, धनु में काव्य प्रेमी, प्रतिभा का विकास, राज्य से सम्मान | मकर में चिन्ता कष्ट, वात- कफ प्रधान जातक रहता है |कुम्भ में व्यसन रोग, धन हानि और मीन में हो तो व्यापार से लाभ, नेतागिरि से लाभ होगा | शुक्र यदि अशुभ नीच, अस्त, शत्रु राशि, वक्री, पाप पीड़ित और निर्बल हो तो स्त्री से भय, नीच लोगों की संगती से धन नाश, जानवर से भय अधिक स्त्री संसर्ग से रोगोत्पत्ति आदि अशुभ फल करता है |
द्वादश भावेशों के अनुसार दशा का फल -
- १. लग्नेश की दशा में शारीरिक सुख और धनागम होता है परन्तु स्त्री कष्ट भी देखा जाता है |
- २. धनेश की दशा में धन लाभ, पर शारीरिक कष्ट भी होता है | यदि धनेश पाप ग्रह से युत हो तो मृत्यु भी हो जाती है |
- ३. तृतीयेश की दशा कष्ट कारक, चिंताजनक और साधारण आमदनी करने वाली होती है |
- ४. चतुर्थेश की दशा में गर, वाहन, भूमि आदि के लाभ के साथ माता मित्रादि और स्वयं अपने को शारीरिक सुख होता है | चतुर्थेश बलवान शुभ ग्रहों से दृष्टि हो तो इसकी दशा में जातक घर बनवाता है | लग्नेश या चतुर्थेश दोनों दशम या चतुर्थ में हो तो इस ग्रह की दशा में बड़े अस्तर पर कार्य करते है |
- लेकिन इस दशा काल में पिता को कष्ट रहता है | विद्या लाभ शिक्षा सम्बन्धित सम्मान, जातक को यह दशा अपने विद्यार्थी काल में नहीं मिले तो अन्य समय में इसके काल में विद्या विषयक उन्नति व दिशा यशा की प्राप्ति होती है |
- ५. पञ्चमेश की दशा में विद्या प्रति, धन लाभ. सम्मान वृद्धि, सुबुद्धि, माता की मृत्यु या कष्ट पीड़ा होता है | यदि पञ्चमेश पुरुष ग्रह हो तो पुत्र, स्त्री ग्रह हो तो कन्या संतान की प्राप्ति का भी योग रहता है, किन्तु सन्तान योग पर इस विचार में दृष्टि रखता आवश्यक है |
- ६. षष्ठेश की दशा में रिग वृद्धि, शत्रु भय और संतान को कष्ट होता है |
- ७. सप्तमेश की दशा में शोक, शारीरिक कष्ट, आर्थिक कष्ट और अवनति होती है | सप्तमेश पाप ग्रह हो तो इसकी दशा में स्त्री को अधिक कष्ट और शुभ ग्रह हो तो साधारण कष्ट होता है |
- ८. अष्टमेश की दशा में मृत्यु भय, स्त्री मृत्यु एवं विवाह आदि कार्य होते है |अष्टमेश पाप ग्रह हो और द्वितीय में बैठा हो तो निश्चय ही मृत्यु होती है |
- ९. नवमेश की दशा में तीर्थयात्रा, भाग्योदय, दान, पुण्य, विद्या द्वारा उन्नति, भाग्य वृद्धि, सम्मान, राज्य से लाभ और किसी महान् कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त करनेवाला होता है |
- १०. दशमेश की दशा में राजाश्रय की प्राप्ति, धन लाभ, सम्मान वृद्धि और सुखोदय होता है | माता के लिए दशा कष्ट कारक है |
- ११. एकादशेश की दशा में देहं लाभ, ख्याति, व्यापार से प्रचुर लाभ एवं पिता की मृत्यु होती है | यह दशा साधारणतः शुभ फल दायक होती है | यदि एकादशेश पर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो तो यह रोगोत्पादक भी होती है |
- १२. द्वादशेश की दशा में धन हानि, शारीरिक कष्ट, चिंताए, व्याधियां और कुटुम्बियों को कष्ट होता है |
ग्रहों की दशा का फल सम्पूर्ण दशाकाल में अलग-अलग रहता है | किन्तु प्रथम द्रेष्काण में ग्रह हो तो दशा के प्रारम्भ में, द्वितीय द्रेष्काण में हो तो दशा मध्य में और तृतीय द्रेष्काण में ग्रह हो तो दशा के अन्त में फल की प्राप्ति होती है | वक्री ग्रह हो तो विपरीत उतरोत्तर फल मिलता है | वक्री ग्रह की दशा में स्थान, धन, और सुख का नाश होता है, प्रदेश गमन तथा सम्मान की हानि होती है | मार्गी ग्रह दशा की दशा में सम्मान, सुख, धन, यश की वृद्धि, लाभ, नेतागिरी और उद्योग की प्राप्ति होती है | यदि मार्गी ग्रह ६/ ८/ या द्वादश भाव में हो तो अभीष्ट सिद्धि में बाधा आती है |
नीच शत्रु क्षेत्री ग्रह की दशा में प्रदेश में निवास, वियोग, शत्रुओं से हानि, व्यापार से हानि, दुराग्रह, रोग, विवाद और नाना प्रकार की विपत्तियाँ आती है | यदि ये ग्रह सौम्य ग्रहों से युत या दृष्टि हों तो बुरा फल कुछ कम से कम रूप में मिलता है |मेंपाप ग्रह की महादशा में पाप ग्रह की अन्तर्दशा धन हानि, शत्रुभय और कष्ट देनेवाली होती है | जिस ग्रह की महादशा हो उससे षष्ठ या अष्टम भाव में स्थित ग्रहों की अन्तर्दशा पद या स्थानच्युत , भयानक रोग, मृत्यु तुल्य कष्ट या मृत्यु देने वाली होती है |
पाप ग्रह की महादशा में शुभ ग्रह की अन्त र्दशा हो तो उस अन्तर्दशा का पहला आधा भाग कष्टदायक और उत्तर्राध सुखमय रहता है | शुभ ग्रह की महादशा में शुभ ग्रह की अन्तर्दशा धनागम, सम्मान वृद्धि, सुखोदय और शारीरिक सुख प्तादन करती है | शुभ ग्रह की महादशा में पाप ग्रह की अन्तर्दशा हो तो अन्तर्दशा का पूर्वार्द्ध सुख दायक और उत्तरार्द्ध कष्टदायक होता है | पाप ग्रह की महादशा में अपने शत्रु ग्रह से युक्त पाप ग्रह की अन्तर्दशा हो तो विपत्ति आती है |
शनि क्षेत्र में चन्द्र हो तो उसकी महादशा में सप्तमेश की महादशा परम कष्टदायक होती है | शनि में चन्द्र या चन्द्र में शनि का दशा काल आर्थिक रुप से कष्ट देता है | गुरु में शनि और शनि में गुरु की दशा खराब होती है | मंगल में शनि और शनि में मंगल की दशा रोग कारक होती है | शनि में सूर्य और सूर्य में शनि की दशा गुरु जनों के लिए कष्ट दायक तथा अपने लिए चिन्ता करक होती है | राहु और केतु की दशा प्रायः अशुभ होती है, किन्तु जब राहु ३/ ६/ एकादश भाव में हो तो उसकी दशा फल देती है
रोग और दोष के कारण एवं शास्त्रीय अचूक उपाय
हमारे तंत्र और वैदिक ग्रंथों में रोग या शोक के कारणों का विशद् विवेचन किया गया है I जब सभी परिणाम कार्य और कारण के सम्बन्ध से होते है तो फिर ये रोग और दोष बिना किसी कारण के नहीं हो सकते है I अतः इसका ही निरुपण ज्योतिष शास्त्र के द्वारा किया जाता है I हमारे शास्त्रों में रोगों को तीन भागों में बाँटा गया है I १. आदि दैविक २.आधि भौतिक ३.आध्यात्मिक |
इन तीनों रोगों के निवारणार्थ तीन प्रकार के उपचार भी दिए गए है I यथा:-
१. मणि (रत्न ), २. मंत्र द्वारा और ३. औषधीय उपचार I
नव ग्रहों का कारक एवं क्षेत्र संक्षेप में ऊपर दिया गया है | जब कुंडली में अथवा गोचर से कोई ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि, अशुभ भाव में होता है तो कमजोर होता है या पाप ग्रह से सम्बन्ध कर दूषित होता है तो उस ग्रह से सम्बंधित क्षेत्र प्रभावित होता है | फलस्वरूप शारीरिक रोग या भौतिक सुख- सुविधा, ऐश्वर्य आदि में बाधा उत्पन्न हो जाती है | दशा फल का विचार करते समय ग्रह किस भाव का स्वामी है और उसका सम्बन्ध कैसे ग्रहों से है, इसका ध्यान रखना आवश्यक है |
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ I
यादृशी भावना यस्य सिर्द्धिर्भवति तादृशी II
अर्थात् मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषध और गुरु में जैसी भावना होती है वैसी ही सिद्धि मिलती है I
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क्या आपकी महादशा भी कष्टकारी है?
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