ॐ श्री गणेशाय नमः
क्या आपने कभी महसूस किया है कि जीवन की अंतहीन दौड़ और मानसिक तनाव के बीच हमारी आत्मा का वास्तविक स्वरूप कहीं खो गया है? शांति की खोज बाहर नहीं, बल्कि भीतर होती है। इसी गूढ़ रहस्य को उजागर करते हुए, ज्योतिषाचार्य श्री सुनील नाथ झा ने 'सहज (आत्मा से) साधना' के माध्यम से एक ऐसा मार्ग दिखाया है, जो बाहरी आडंबरों से मुक्त है। आइए जानते हैं कि कैसे ज्योतिषशास्त्र और ग्रहीय ऊर्जाओं को समझकर हम अपनी आत्मा की गहराई में उतर सकते हैं।
सहज (आत्मा से) साधना
मानव जीवन के लिए सहज साधना सबसे सरल साधना है क्योंकि इसमें बाहरी आडम्बर से कोई लेना देना नही है | आत्मा से चलना, सरल जीवन और नित्य कर्म ही सहज साधना होता है अर्थात् आत्मा के अनुसार चलना- मन के अनुसार नही | क्योंकिः - मन में राग द्वेष, छल-कपट और ग्रहों से जल्दी प्रभावित होता रहता है | ज्योतिषशास्त्र सहज अवस्था बालक- बालिका का १२ वर्ष से पहले मानता है | उसके बाद से छल -कपट, राग -द्वेष जीवन मार्ग में प्रवेश होने लगता है | क्योंकि जातक जब - मन के अनुसार जीवन मार्ग पर चलने लगते है तब से जातक जीवन भर मानसिक, आर्थिक, भौतिक, शारीरिक और सांसारिक कष्टों से युक्त रहने लगता है | कारण १२ वर्ष के बाद से मन(चन्द्र) पर ग्रहों के प्रभाव से आच्छादित हो जाता है | उससे जातक अपने मालिक भगवान्,संस्कृति - संस्कार और माता- पिता का आज्ञा नही माँनकर ग्रहों के वस में हो जाता है जिससे जातक अपने बुद्धि से जीवन मार्ग पर अग्रसर होने लगता है | परन्तु अगर उस अवस्था में संस्कृति संस्कार से युक्त गुरुवर और शुभ ग्रहों की दशा (विंशोत्तरी) प्रवेश हो तो जातक माता पिता या आत्मा के आज्ञा से सहज जीवन प्रारम्भ करते है तो उससे जातक सहज मार्ग में चलने लगता है और जीवन आसान हो जाता है |
हमारे अनुभव से कोई भी जीव या मनुष्य अनाथ नहीं है | सब के सब वस्तू, जीव - मनुष्य सनाथ है | संसार में प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई मालिक होता है एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष होता ही है | फिर मनुष्य का कोई मालिक न हो - यह कैसे हो सकता है | वे भगवान् हमारे मालिक है | ( जो जितने मालिक के नजदीक होते साधना और बौद्धिक के माध्यम से होते है उतरोत्तर - प्रथम जो सबसे ज्यादा आराधना करते वो भगवान् ( ब्रह्मा- विष्णुः -शिव् ) के होते, द्वितीय उससे कम आराधना करने वाले तथा गृहस्थी जीवन में रहने वाले को अपने वंश की - कुलदेवी (श्रीदुर्गा जी के अनेक रुप होते है जरुर करे उससे शान्ति मिलती है ) देवता, साथ ही - इष्टदेवी - देवता - जो अपने पसन्द के होते है | और ग्राम- स्थान देवता- जो सामान्य वर्ग के लिए होता है जिनका आराधना लौकिक होती है वैदिक नही होता है | ) हम उनको अपना मालिक- भगवान् या कुलदेवी देवता माने या न मानें, जाने या न जानें, पर वे हमें अपना जानते ही है | अतः अपने को अनाथ समझाना हमारी भूल है | मनुष्य को अपने में अनाथपन का अनुभव क्यों होता है ? जब वह किसी वास्तु- व्यक्ति को अपना मान लेता है, तब उसका अभाव होने से उसको अपने में अनाथपन का अनुभव होने लगता है | यह नियम है कि जब मनुष्य अपने को किसी वास्तु- व्यक्ति का मालिक मान लेता है, तब वह अपने को मालिक को भूल जाता है | यथा बालक माँ के बिना नहीं रह सकता, परन्तु जब वह बड़ा हों जाता है और स्त्री, पुत्र आदि (विवाह व संतान) को अपना मानने लगता है, तब वह उसी माँ की उपेक्षा करने लगता है | सदा से भगवान् ही अपने है | संसार अपना नही था, नही है और नहीं रहेगा | कारण कि जो सदा हमारे साथ नहीं रह सकता और हम सदा जिसके साथ नही रह सकता और हम सदा जिसके साथ नहीं रह सकते, वह अपना नहीं हो सकता | अपना वही हो सकता है, जो सदा हमारे साथ रहे और हम सदा उसके साथ रहे अर्थात् जो सदा हमारे से कभी न बिछुड़े और हम उससे कभी न बिछुड़े | तात्पर्य है की अगर वस्तुए अपनी दिखती हैं तो वे केवल दूसरों की सेवा में लगाने के लिए, सदुपयोग करने के अपनी है | अगर व्यक्ति अपने दीखते है तो वे केवल निःस्वार्थ भाव से सेवा करने के लिए अपने है | अपने लिए कुछ भी अपना नहीं है | अपने सुख- आराम के लिए वस्तु-व्यक्तियों अपना मानना जन्म मरण का कारण है- कारणं गुण संङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु |
मनुष्यों के भीतर यह बात बैठी है कि हम दोषं को दूर करेगें, निर्दोष बनेगें, तब भगवान् की प्राप्ति होगी | परन्तु सांसारिक वस्तुओं को प्राप्त करने का जो तरीका है, वह तरीका परमात्मा तत्त्व की प्राप्तिका नहीं है | सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति तो अप्राप्त की प्राप्ति है, पर परमात्मा तत्त्व की प्राप्ति नित्य प्राप्ति है | स्वरुप स्वतः स्वाभाविक निर्दोष तथा नित्य प्राप्त है | अतः इस निर्दोषता को स्वीकार करना है, इसको बनाना नहीं है और दोषों से उपरत (उदासीन) होना है, उनको मिटाना नहीं है | तात्पर्य है कि अपने में निर्दोषता तो वास्तव में है और सदोषता मानी हुई है, है नहीं | अतः इस मान्यता का त्याग करना है | अगर दोषों (त्रिपातकी चक्र व ग्रह वेध) को अपने में स्वीकार करके फिर उनको दूर करने का प्रयत्न करेगें तो वे दूर नही होगे, प्रत्युत और दृढ हो जायेगे | कारण कि दोषों को अपने में मानकर उनको सत्ता देगें, तभी तो उनको मिटने का उद्योग करेगे |
प्रकृति और पुरुष दोनों को ही अनादि कहा गया है - प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | सांख्य दर्शन (Samkhya Philosophy) के अनुसार अनादि होते हुए भी दोनों का स्वभाव आलग-अलग हैं | प्रकृति में तो निरंतर क्रिया होती है, किन्तु पुरुष में क्रिया होती ही नहीं | शास्त्रों में वर्णन आता है कि प्रकृति की एक अक्रिय अवस्था होती है और एक सक्रीय अवस्था होती है | परन्तु वास्तव में सक्रीय अवस्था की अपेक्षा से अक्रिय अवस्था कही जाती है | प्रकृति की सूक्ष्म क्रिया अक्रिय अवस्था में भी कभी बंद नहीं होती | यथा- हम कभी जागते हुए काम धंधा (जॉब या बिज़नेस) करते है और कभी सब काम धंधा छोड़कर नींद लेते है | नींद में भी तीन तरह की क्रिया होती है | एक क्रिया नींद के पकने की होती है अर्थात् नींद लेते समय कोई बीच में ही हमें जगा देता है तो कच्ची नींद में जगा दिया | इससे सिद्ध होता है कि नींद भी पकने की क्रिया होती है | दूसरी क्रिया थकावट मिटकर ताजगी आने की होती है और तीसरी एक क्रिया शरीर के नाश की होती है | नाश की यह क्रिया स्वतः स्वाभाविक निरंतर होती रहती है | जब सृष्टि पैदा होती है, तब भी यह क्रिया होती है और जब सृष्टि का लय हो जाता है, तब भी यह क्रिया होती है, सृष्टि का लय होने पर प्रकृति निष्क्रिय कही जाती है | वास्तव में प्रकृति कभी निष्क्रिय नहीं होती | जाग्रत् में, स्वप्न में, सुषुप्ति में, मूर्च्छा में, समाधि में, सर्ग में, प्रलय में, महासर्ग में, हर समय प्रकृति में क्रिया होती रहती है | मन, बुद्धि, इन्द्रियां, शरीर, धन, संपत्ति, वैभव (धन योग) आदि तथा तारे, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, समुद्र आदि जितना दृश्य दीखता है | सबमें प्रतिक्षण क्रिया हो रही है | इस प्राकृत क्रिया में उत्पत्ति और विनाश का एक क्रम प्रवाह चलता है | और यह क्रम ही स्थिति रूप से दीखता है, वास्तव में स्थिति है नहीं | यथा- हम कहते है कि गंगा जी का जल कल की जगह और बह रहा है तो इसमें दो बाते है -प्रथम कलकी जगह और बह रहा है | तात्पर्य है कि कलकी जगह दिखने पर भी जल स्थिर दीखते हुए भी निरन्तर बह रहा है | इसी तरह ये शरीर- संसार स्थिर दीखते हुए निरंतर बह रहे है, नाश की तरफ जा रहे हैं |
प्रकृति की प्रत्येक क्रिया हमारे स्वरुप से निरंतर अलग हो रही है और अलग है | यह सबका व्यक्तिगत अनुभव है कि बालक में जो था, वही मैंआज हूँ | बालक से जवान और जवान से बुढा हो गया - यह प्राकृत क्रिया हुई और मैं वही हूँ -यह अक्रिय स्वरुप हुआ | बालक से जवान और बुढा होने के लिए कोई उद्योग नहीं करना पड़ता, प्रत्युत यह परिवर्त्तन रूप क्रिया शरीर में स्वतः स्वाभाविक हो रही है | स्वंय ने शरीर के साथ अपना सम्बन्ध मान लिया, इसलिए शरीर में होनेवाली क्रिया अपने में दिखने लग गयी, यथा मैं बालक हूँ, मैं जवान हूँ, मैं बूढा हूँ, मैं रोगी हूँ, मैं नीरोग हूँ आदि | शरीर के साथ अपना अनुभव कर लेना ही ज्ञान है - क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मत्तं मम |
जगज्जीवपरात्मनाम् अर्थात् जिज्ञासा विषय वास्तव में जीव और जगत् है परमात्मा नहीं | जिज्ञासा अधूरी जानकारी संदेह में होती है अर्थात् जिस विषय में हम कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते, वहां जिज्ञासा होती है | अतः जिस विषय को किंचिन्मात्र भी नहीं जानते, उसमें जिज्ञासा नहीं होती और जिस विषय को पूरी तरह जानते हैं, उसमें भी जिज्ञासा नहीं होती, क्योंकि उसका अनुभव होता है | परमात्मा के विषय में हम बिलकुल नहीं जानते, अतः परमात्मा जिज्ञासा या विचार का विषय नहीं है, प्रत्युत मान्यता का विषय है | जीव और संसार को हम पूरी तरह नहीं जानते, यथा- मैं हूँ और संसार है -यह तो जानते है, पर मैं क्या हूँ और संसार क्या है - यह तत्त्व से नहीं जानते | अतः जीव और संसार जिज्ञासा के विषय है | तात्पर्य है कि परमात्मा की जिज्ञासा उनमें होती है,जो शास्त्र और संत को मानते है अर्थात् शास्त्र में लिखा है, भक्तों से सूना है, पर अनुभव नहीं है | इसको लेकर जिज्ञासा होती है | जो वेदादिक शास्त्रों को और भक्तों को नहीं मानते, उनमें परमात्मा की जिज्ञासा नहीं होती | परन्तु जीव और जगत् की जिज्ञासा आस्तिक - नास्तिक सभी में हो सकती है |
करण निरपेक्ष तत्त्व है जिससे क्रिया की सिद्धि होती है, जो क्रिया को उत्पन्न करनेवाला है, उसको कारक कहते है कारक ६ प्रकार के होते है -कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण | इन ६ कारकों की आवश्यकता सांसारिक क्रियाओं की सिद्धि में ही है | परमात्म तत्त्व की प्राप्ति में कारकों की आवश्यकता नहीं है अर्थात् वहां कारक नहीं चलते | कारण कि- परमात्म तत्त्व की प्राप्ति क्रिया से नहीं होती | तात्पर्य हैं कि सब कारक प्रकृति में है और प्रकृति के कार्य हैं | प्रकृति से अतीत तत्त्व में कोई कारक नहीं है | कारकों में प्रकृति जन्य पदार्थ और क्रिया का आश्रय लेना पड़ता है, जिससे अभ्यास की सिद्धि होती है | अभ्यास से एक नई अवस्था का निर्माण होता है, तत्त्वका अनुभव नहीं होता, क्योंकि तत्त्व में अवस्था नहीं है | तत्त्व का अनुभव हो विवेक के द्वारा होता है | यह विवेक प्राणिमात्र को स्वतः प्राप्त है | परन्तु मनुष्य के सिवाय अन्य प्राणियों में जो विवेक है, उससे उनका शरीर निर्वाण तो हो जाता है, पर तत्त्व ज्ञान नहीं होता | कारण कि विवेक का उपयोग ने केवल शरीर निर्वाह में ही करते हैं | उससे आगे उनकी जिज्ञासा नहीं होता अर्थात् अन्य प्राणियों में यह विवेक स्थावर की अपेक्षा जंगम में अधिक रहता है जंगम में भी जलचर की अपेक्षा थलचर प्राणियों में थलचर की अपेक्षा नभचर प्राणियों में अधिक विवेक रहता है | परन्तु उनमे यह विवेक शरीर -निर्वाह तक ही सिमित रहता है, जिससे वे खाद्य - अखाद्य, सर्दी- गर्मी, परिश्रम- आराम, संयोग- वियोग आदि की भिन्नता को जान लेते है | परन्तु सत्-असत् , कर्त्तव्य- अकर्त्तव्य का विवेक उनमें जाग्रत् नहीं होता | कारण कि उनमे विवेक के योग्य बुद्धि नहीं है और अधिकार भी नहीं है | यह विवेक मनुष्य में ही जाग्रत् होता है | कारण कि मनुष्य के सिवाय अन्य योनियाँ भोग प्रधान है | मनुष्य अपने विवेक को महत्त्व देकर शरीर से अतीत तत्त्व की प्राप्ति कर सकता है, जन्म मरण के बंधन से छुट सकता है | अतः मनुष्य पर अपना उद्धार करने की विशेष जिम्मेवारी है | अर्थात् मनुष्य अपने विवेक का सदुपयोग करके, विवेक का आदर करके देवताओं से भी ऊचा उठ सकता है, भगवान् को भी अपने वश में कर सकता है | परन्तु भोगेच्छा के कारण अपने विवेक का दुरुपयोग करके, विवेक का अनादर करके पशुओं से भी निचा गिर सकता है | मनुष्य को चाहिए कि वह अपने विवेक का आदर करे, विवेक -विरोधी कोई कार्य न करें |
आज कल मनुष्य ९०% केवल भोग विलासी हो गई है | मनुष्य होकर भी अपने विवेक का आदर न करने से पतन होता है वैसा पतन पशु का भी नहीं होता | आपको नहीं मिला तो बच्चे को मिलता है | झूठ, कपट, बेईमानी, धोखेबाजी, अन्याय, हिंसा आदि पाप मनुष्य ही करता है, पशु नहीं करते | पशु नये पाप नहीं करते, प्रत्युत पूर्वजन्म में किये गये पापों का ही फल भोगकर उन्नति की ओर जाते है, पर मनुष्य सुख, लोलुपता के कारण नये-नये पाप करके पतन की ओर जाता है, अपने विवेक को वह नये-नये पापों की खोज करने में ही लगा देता है | भोग शक्ति के कारण उसका विवेक इन्द्रियों के भोगों तक ही सिमित रहता है -कामोपभोगपरमा एतावदितिनिश्चिताः | इस प्रकार पशु तो अपने कर्मो का फल भोगकर मनुष्य योनि तरफ आते है,पर मनुष्य नये-नये पाप करके पशुयोनि से भी नीचे चले जाते हैं और जा रहे है | इसलिए ऐसे मनुष्य के संग को नर्कवास से भी बुरा कहा गया है - कारण कि नर्क में तो पाप नष्ट होकर शुद्धि आती है | पर दुष्टों के संग से अशुद्धि आती है,पाप बनते है |
साधक को चाहिए कि वह एकांत वास में शुद्ध वृत्ति से इसको धारण करें | केवल शब्दों पर दृष्टि न रखकर अर्थ एवं तत्त्व की तरफ दृष्टि रखते हुए ध्यान धारण या विचार करें और विचार करके बाहर - भीतर से चुप हो जाय तो तत्त्व में स्वतः सिद्ध स्थिरता जाग्रत् हो जायेगीं अर्थात् सहजावस्था का अनुभव हो जाएगा और मनुष्य जीवन सफल हो जाएगा | अर्थात् यहाँ प्रश्नं होता है कि जो वर्णनातीत है, उसका वर्णन कैसे और जिसका वर्णन होता है वर्णनातीत कैसे इसका उत्तर है कि यद्यपि तत्त्व वर्णनातीत है, तथापि उसका लक्ष्य करने के लिए यहाँ उसका वर्णन किया गया है- अचिन्त्यरुपं अनुस्मरेत् अर्थात् अचिन्त्य का चिन्तन करने की बात कहीं है तो जो अचिन्त्य है, उसका चिन्तन कैसे और जिसका चिन्तन होता है,वह अचिन्त्य कैसे | इसका तात्पर्य है कि यद्यपि परमात्मा अचिन्त्य है तथापि चिन्तन करने वाला उसको लक्ष्य बना सकता है | इसी तरह परमात्मा तीन प्रकार से वर्णन -परमात्मा सत् और असत् -सदसच्चाहम् | परमात्मा सत् भी है असत् भी है और सत् से असत् पर भी है - सदसत्तात्परं यत्, परमात्मा न सत् है और न असत् है - न सत्तन्नासदुच्यते | इसका तात्पर्य यही है कि वास्तव में परमात्मा का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह मन, बुद्धि और शब्द से अतीत है | यदि कहने वाला अनुभवी और सुनेवाला सच्चा जिज्ञासु हो तो द्वारा शब्दातीत, इन्द्रियातीत तत्त्व का भी ज्ञान हो जाता है - यह शब्द की विलक्ष्ण, अचिन्त्य शक्ति का प्रभाव है म| परन्तु ऐसा होना तभी सम्भव है, जब केवल शब्दों पर दृष्टि न रखकर तत्त्व की तरफ दृष्टि रखी जाय | अगर तत्त्व की तरफ दृष्टि नहीं रहेगी तो सीखना मात्र होगा अर्थात् कोरा वर्णन होगा, तत्त्व नहीं मिलेगा |
ज्ञान होने पर नयापन किछ नहीं दीखता अर्थात् पहले अज्ञान था, अब ज्ञान हो गया - ऐसा नहीं दीखता | ज्ञान होने पर ऐसा अनुभव होता है कि ज्ञान तो सदा से ही था, केवल उधर मेरी दृष्टि नहीं थीं | यदि पहले अज्ञान था, अब ज्ञान हो गया - ऐसा मानें तो ज्ञान में यदि सादिपना आ जायगा, जब कि ज्ञान सादि नहीं है, अनादि है | जो सादि होता है, वह संत होता है और जो अनादि होता है, वह अनन्त होता है | अतः आप बाहर -भीतर से चुप हो जाना चुप साधन है | भीतर से ऐसा विचार कर लें कि मेरे को कुछ करना है ही नहीं | न स्वार्थ, न परमार्थ, न लौकिक, न पारलौकिक, कुछ भी नहीं करना है | ऐसा विचार करके बैठ जाय | बैठने का बढ़िया समय है - प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में वैसे जब आपकी मन स्थिर हो जाय | ध्यान दोनों भौ मध्य जहाँ चन्दन या बिंदी स्थापित करते है | चिन्तन, जप, ध्यान आदि कुछ भी नहीं करना है | परन्तु चिन्तन आदि नहीं करना है यह संकल्प भी नहीं रखना है,क्योंकि न करने का संकल्प रखना भी करना है | वास्तव में न करना स्वतः सिद्ध है | मन बुद्धि आदि को स्वीकार करने ही करना होता है | अब किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं करना है- ऐसा विचार करके चुप हो जाएँ | यदि मन न माने तो सब जगह एक परमात्मा परिपूर्ण है-ऐसा मानकर चुप हो जाएँ | सगुण की उपासना करते हो तो मै प्रभु के चरणों में पड़ा हूँ ऐसा मानकर चुप हो जाएँ | परन्तु यह दो नम्बर की बात है एक नम्बर की बात तो यह है की कुछ करना ही नहीं स्थिर होना मन, आत्मा और शरीर से है | इस प्रकार चुप होने पर भित्तर में कोई संकल्प विकल्प हो, कोई बात याद आयें तो उसकी उपेक्षा करें, विरोध न करें | करने न करने दोनों का ही आग्रह न रखें | करने का आग्रह भी संकल्प है और न करने का आग्रह रखना भी संकल्प है | करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है | अतः करने और न करने -दोनों से किंचिन्मात्र भी कोई मतलब न रखकर चुप हो जाएँ तो प्रकृति का सम्बन्ध छुट जाता है और स्वतः परम विश्राम प्राप्त हो जाता है, क्योंकि क्रिया रूप से प्रकृति ही है | इस प्रकार बाहर भीतर से चुप हो जाएँ तो जिसको तत्त्व ज्ञान कहते है, जीव मुक्ति कहते है, सहज समाधि कहते है, वह स्वतः हो जाएगी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
निष्कर्ष (Conclusion)
अंततः, यह लेख हमें यह सिखाता है कि 'सहज साधना' केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। जब हम सांसारिक दौड़ से हटकर, मन के भटकाव को रोककर और स्वयं में स्थिर होते हैं, तभी वास्तविक आनंद और परमात्मा के सान्निध्य की अनुभूति होती है। अपनी प्रकृति को समझें, और आत्मा के प्रकाश में अपना मार्ग प्रशस्त करें।
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