सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कुंडली से जानें कौन सा बिजनेस करें | नौकरी या व्यापार में सफलता कैसे मिले? (Career Astrology)

लेखक: डॉ. एस.एन. झा (Dr. S.N. Jha) | अनुभव: 30+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष परामर्श

इस लेख में पराशर होरा शास्त्र और भृगु संहिता के आधार पर career prediction by kundli का सबसे सटीक और प्रामाणिक विश्लेषण किया गया है।

कुण्डली से व्यवसाय चुनने की पद्धति

कार्यालय में व्यापारिक रणनीति पर चर्चा करते हुए पेशेवर
कर्मेशस्थनवांशराशिदवशात् वृत्ति जगुस्तज्ज्ञाः

अर्थात् विद्वानों ने जातक का वृत्ति काम-धन्धे अर्थात् व्यवसाय का विचार दशम भाव का स्वामी जिस नवांश में स्थित हो उस नवांश के स्वामी के अनुरुप या आस-पास कहना चाहिए | जातक के ऊपर किन कुण्डली किन ग्रहों का प्रभाव उसके जीवन स्वभाव, रंग, रुप, कद, व्यावहार, अध्य यन अध्यापन आदि पर रहा है अर्थात् सब से अधिक प्रभावी ग्रह के स्वरुप के आधार पर व्यवसाय का निर्धारित होता है यद्यपि दशम भाव कर्म भाव है यद्यपि यह रुपया कमाने के कर्मों का द्योत्तक नही है | अच्छे बुरे, यज्ञीय - अयज्ञीय कर्मों का द्योत्तक है | किस स्थान से दशम भाव लिया जाय और फिर वहां पर स्थित ग्रह का बलाबल देखा जाय ➖

विलग्नं शरीरं मनः शीतरश्मिर्विवस्वानथात्मा त्रयाणमर्थेक्ये ;-

अर्थात् लग्न से जातक का शरीर, चन्द्र से मन और सूर्य से आत्मा का प्रतिपादन होता है | लग्न स्थान को मूर्ति स्थान भी कहा अर्थात् लग्न स्थान से दशम भाव जातक के शारीरिक परिश्रम द्वारा संपन्न कार्य का बोध कराता है | चन्द्र से दशम भाव जातक की मानसिक प्रवृति के अनुसार संपन्न कार्य का बोध कराता है | और सूर्य से दशम भाव आत्मा की प्रबलता द्वारा कार्यो त्पत्ति का बोध होता है | इन्हीं सब कारणों से महर्षि पराशर, गर्ग, वराह मिहिरादि आचार्यों ने भी कहा लग्न और चन्द्र में जो बली हो उससे दशम भाव द्वारा जातक के जीवन कर्म और उसकी मनोवृत्ति का विचार निर्धारित होता है |

यस्यार्थस्तस्य मित्राणि यस्यार्थस्तस्य बान्धवाः |
यस्यार्थः सा पुमांल्लोके यस्यार्थः स च जीविति |

अर्थात जिस जातक के पास धन रहता है उसी के मित्र होते है | जिसके पास अर्थ रहता है उसी के बन्धु होते है | जिस जातक के पास धन रहता है वह पुरुष गिना जाता है और जिसके अर्थ है वही जीता रहता है |

जातक का व्यवसाय क्या है एक बहुत जटिल प्रश्न है | ज्योतिष शास्त्र ने बहुधा इस प्रश्न पर विचार करने के लिए दशम भाव कि ओर संकेत किया है | महिर्षि, ऋषियों और आचार्यों के अनुसार जो कुंडली जातक के लिए इष्ट हो उस कुंडली के दशम भाव में जो ग्रह केंद्र त्रिकोण में बलवान् हो वह जातक कि आजीविका को बतलाता है | वैसे यह दशम भाव जातक की आजीविका को बतलाता है | यह दशम भाव सभी लग्नों से दशम भाव हो सकता है | अर्थात लग्न से दशम में स्थित ग्रहों से, सूर्य और चन्द्र लग्न से दशम भाव में स्थित ग्रहों के स्वभाव गुण आदि से जातक की आजीविका कहनी चाहिए |

धन की प्राप्ति कब होती है जब ग्रह शुभ फल देते है | ग्रह दो प्रकार से शुभ फल देते है | एक तो जब शुभ धनदायक भावों लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पञ्चम, सप्तम, नवम, दशम, एकादश के स्वामी होकर बलवान् होते है | दुसरे जब अशुभ भावों अर्थात् तृतीय, षष्ठ, अष्टम, द्वादश के स्वामी होकर अति निर्बल होते है | ऐसे दोनों प्रकार प्रकार के ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा में धन देते है | ग्रहों का विशेष फल उनकी अन्तर्दशा, ग्रह के बल तथा कुंडली के लग्नों आदि के बल पर निर्भर करती है | परन्तु स्मरण रहे कि महादशा का स्वामी यदि अशुभ भी हो परन्तु अन्तर्दशा का स्वामी जब शुभ अथवा योग कारक हो तो उस समय अवश्य धन की, पद की, यश की प्राप्ति होती है | अतः अन्तर्दशा के समय का विशेष महत्त्व है | धनयोग कारक ग्रह अपनी अन्तर्दशा में धन के सम्बन्ध में उत्तम फल देता है यदि वह बलवान् हो | यदि बलवान् न हो तो अधिक शुभ फल नहीं देता परन्तु धनयोग कारक ग्रह निर्बल होकर भी अशुभ फल नहीं देता शुभ फल बहुत थोड़ा देता है | कभी-कभी ऐसा होता है कि दो नैसर्गिक शुभ ग्रह एक नैसर्गिक पापी ग्रह के साथ बैठे होते है और उनमे से एक नैसर्गिक शुभ ग्रह कि तो महादशा हो और दुसरे नैसर्गिक शुभ ग्रह की अन्तर्दशा हो तो घटनाएँ न एक शुभ ग्रह के सम्बन्ध में न दुसरे शुभ ग्रह के सम्बन्ध में घटेगी बल्कि घटनाएँ नैसर्गिक पापी ग्रह के सम्बन्ध में घटेगी जिस पर कि दोनों शुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा है | यथा किसी जातक कि तुला लग्न है और गुरु, बुध तथा शनि तीनों तृतीय भाव में धनु राशि में स्थित है | दशा बुध की है तथा अन्तर्दशा गुरु की है इस दशा और अन्तर्दशा का लाभ शनि को होगा जोकि तुला लग्न के लिए योग कारक है और बहुत धन की प्राप्ति होगी यद्यपि गुरु की भुक्ति का यदि आप स्वतंत्र विचार करेगे हो आप भ्रम से सोच सकते है कि तुला लग्न के लिए तो गुरु अशुभ है अतः अशुभ फल करेगा |

व्यवसाय में सफलता एवं असफलता के लिए हमे कुंडली में भाग्येश, लग्नेश, दशमेश के साथ साथ शनि एवं गुरु का विचार करना चाहिए |

यस्मिन् राशौ वर्तते खेचरस्ताद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत् सः खेटः क्षोणीपालंं कीर्तिमन्तं विवध्न्यात् सुस्थानश्चेत् किं पुनः पार्थिवेंद्रः |

ग्रह जिस राशि में स्थित हो यदि उसी राशि के स्वामी से दृष्ट हो तो जातक को यशस्वी बनाता है और यदि उस राशि का स्थान जिसमें कई ग्रह स्थित है यदि सुन्दर हो अर्थात् केंद्र त्रिकोण हो तो फिर क्या कहना | अर्थात् स्वामी दृष्ट भाव की सर्वदा वृद्धि होती है | लग्न का स्वामी अपनी दशा अन्तर्दशा में सर्वदा धन के सम्बन्ध में शुभ फल देता है चाहे वह स्वामी नैसर्गिक पापी ग्रह मंगल या शनि ही क्यों न हों |

भाग्यं विचिन्त्यं सफलं विहाय जन्तोर्विशेषेण बुधैः प्रयत्नात् |
आयुश्च वंशो जन्मो जनित्री भवन्ति धन्या विधिना युतेन ||
तनुगृहांद्वा तुहिनांशु राशेर्निकेतनं यन्नावमं तदेव |
विधेर्गृहं वा बलान्वांस्तयोर्यस्तस्मान्नियत्या भवनं विचिन्त्यम् ||
पराक्रमस्थः प्रतिभालयस्थः पौरोपगः प्राणयुतः खपान्थः |
येषांजनौपुण्यगृहं प्रपश्येच्छ्रेष्ठा नरास्ते कथिताः कविन्द्रेः ||

कुण्डली के समस्त भावों को छोड़कर सर्व प्रथम भाग्य भाव पर विचार करना चाहिये क्योंकि भाग्यवान पुरुष से आयु कुल पिता एवं माता धनी होते है | जन्म लग्न या चन्द्र लग्न इन दोनों में जो भाव बली हो उससे नवम भाव को भाग्य भाव माने जाते है | जिस जातक के जन्म समय में तृतीय भाव या पञ्चम भाव या लग्न में बलवान कोई ग्रह उपस्थित हो तथा वह भाग्य भाव को देख रहा हो तो उस जातक को भाग्यवान हो सकता है | पञ्चम एवं लग्न से भाग्य भाव को गुरु ही देखता है | अतः गुरु उच्च या स्वराशि होने से जातक श्रेष्ठ होता है | जिस जातक के जन्म लग्नेश या नवमेश या तृतीय भाव में कोई भी उच्च राशि या स्वराशि का ग्रह हो तो भाग्य वान कहा जा सकता है | लग्न में धनेश तथा धन में लग्नेश हो तो बिना यत्न के धन लाभ होता है | धन भाव का स्वामी यदि लग्नेश से युक्त व द्रष्ट हो तो अपने बाहुबल द्वारा धन पाता है | कुम्भ में शनि मेष में चन्द्र धनु में सूर्य तथा मकर में शुक्र हो तो ऐसा जातक अपने पिता का धन उपभोग नहीं करता है तथा अपने आप धन कमाता है |

उत्तर भारतीय शैली में ग्रहों की स्थिति दर्शाती जन्म कुण्डली
स्वे कोविद जन्मनिकोविदः स शास्त्रश्रुतीनां तनुभूसमृद्धिः |
संकल्पसिद्ध्या सहितोऽर्थशाली गुणान्वितः सद्गुणवान्नरः||
वाणिज्येऽतिरुचिर्विशालनयनः सम्पूर्णगात्रो |
धन धान्याढयो विदितो जनेषु सकलैर्भोगैर्विलासैर्युतः ||
सौख्यं स्याद्तुलं धनस्य विधिनां युक्तश्चिरायुभवेद्यस्य |
प्राणभृतो जनौ परिजने राज्येन संवीक्षिते ||

यदि कुंडली के धन भाव में बुध उपस्थिति जातक वेद शास्त्रों से युक्त विद्यापूर्ण होता तथा संकल्प सिद्धि से युक्त धनि होता है | कम आयु में विद्या संपन्न और लाभ पाता है ;- पंचदश वर्षे बहु विद्यावान् धनवान् लाभप्रदः | धनभाव यदि बुध से दृष्ट हो तो व्यापार में अति रुचि रखने वाला होता है | वह जातक धन धान्य युक्त, प्रसिद्धि, सम्पूर्ण भोग विलास से युक्त होता है | धन का बहुत सुख मिलता है तथा भाग्यशाली होता है | द्वितीय भाव में बुध के होने पर व्यक्ति अपनी बुद्धि एवं चतुरता से धन कमाता है | धन भाव का बुध सभी विद्वानों ने अच्छा कहा है | धन भाव में बुध होने पर यदि जातक का सारा धन नष्ट भी हो जाए तो पुनः धन वापस आ जाता है | लग्न तथा एकादश भाव का आपस में सम्बन्ध होने पर स्वंय अपने बाहुबल द्वारा धन पाता है | यदि लग्नेश के नवांश का स्वामी धनेश से युतिकर केंद्र त्रिकोण में हो तो निज धन पाता है | लग्नेश धनेश तथा लाभेश में सम्बन्ध बनने से जातक अपने हो दम से धन कमाता है | द्वितीय भाव के स्वामी तथा पञ्चम भाव के स्वामी का आपस में किसी प्रकार का भी सम्बन्ध हो तो पुत्र प्राप्ति या पुत्र द्वारा धन लाभ कहना चाहिए | पंचमेश या नवमेश का सम्बन्ध होने पर भी पुत्र द्वारा धन एवं भाग्य बनता है | पंचमेश का लाभ भाव ,में होना लाभेश से राशि परिवर्तन होने पर भी पुत्र द्वारा धन लाभ होता है | गुरु का सम्बन्ध धन भाव पञ्चम या नवम भाव से होने पर भी पुत्रद्वारा लाभ मिलता है | वृश्चिक लग्न वालों कि कुंडली में गुरु इन भावों में हो तो पुत्र द्वारा धन लाभ अवश्य पाता है |तृतीयेश, एकादशेश, धनेश का सम्बन्ध होने पर भाई द्वारा धन लाभ होता है | लग्नेश, द्वितीयेश एवं तृतीयेश के साथ होने पर भाई द्वारा धन लाभ होता है | तृतीयेश और भ्रातृकारक ग्रह धन भाव में हो तथा लग्नेश से दृष्ट हो या भाग्योन्नती होती है | तृतीय भाव से छोटे भाई तथा एकादश भाव से बड़े भाई का विचार करना चाहिए |

व्यापार के विचार के लिए सप्तम भाव बुध, तृतीय एवं एकादश भाव से करना चाहिए | इन भावों एवं भावेशों के बलाबलानुसार फल कहना चाहिए | दशम भाव का स्वामी केंद्र त्रिकोण या एकादश भाव में गया हो तथा उसे शुभ ग्रह देखते हो तो जातक व्यापारी होता है | साथ ही तृतीय सप्तम भाव या भावेशों का एकादश या धन भाव से सम्बन्ध होना चाहिए | दशम भाव में स्थित राशि या ग्रह जातक की वृत्ति पर विशेष प्रभाव होता है | यह फल जातक के लग्न, राशि एवं धन भाव में स्थित राशि द्वारा भी कहा जा सकता है | क्योंकि धन भाव में स्थित राशि एवं ग्रहों के अनुसार ही जातकों को धन प्राप्ति होती है | व्यवसाय में सफलता और असफलता के लिए हमे कुंडली में भाग्येश, लग्नेश, दशमेश के साथ साथ शनि एवं गुरु का विचार करना चाहिए | शनि वृत्ति का कारक ग्रह है इसके जन्म कुंडली में या नवांश कुंडली में बली होने पर व्यक्ति सफलता पूर्वक आजीविका पाता है | इसी प्रकार गुरु बली होने पर व्यक्ति कुशल प्रशासक बनता है | गुरु धन कारक ग्रह भी है | अतः जब लग्न, लग्नेश आदि प्रभाव डालता है तो व्यापार का भी कारक बनता है | इस प्रकार कुंडली में यह दोनों ग्रह तथा उपरोक्त भावेशों के बली होने पर सफलता के साथ साथ धनी भी होता है | व्यापारियों की कुंडली में यदि यह दोनों भावेश बली हो तो वह धनी व्यापारी बनते है | इस लिए सफलता के लिए इन ग्रहों व भावेशों का कुंडली में उच्च राशि या स्वराशी का होना तथा केंद्र त्रिकोण या लाभ व धनभाव में होना आवश्यक है | यदि यह ग्रह या भावेश कुंडली में षष्ठ अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हों तो जातक अपने व्यवसाय में असफल होता है | यदि यह जातक नौकरी करते है तो नौकरी छोड़नी पडती है या सदा परेशान ही रहते है, यदि व्यापार में हों तो घाटा या हानि सहनी पड़ती है | इस स्थिति के साथ यदि यह ग्रह व भावेश नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित हों तो असफलता ही मिलती है | व्यापारियों को हानि कुंडली में धन भाव या लाभ भाव में पाप ग्रहों की दृष्टि या स्थिति होने पर की सम्भावना बनती है | यह हानि इन ग्रहों या भावेशों की द्शान्तार्द्शा तथा गोचर गत ग्रहों की इन पर दृष्टि या स्थिति द्वारा पता लगाई जा सकती है | बुध यदि सप्तम भाव में हो तथा दशमेश धन भाव में हो | द्वितीयेश बुध के साथ सप्तम भाव में हो | सप्तमेश एवं धनेश का योग भाग्य भाव या एकादश भाव में हो | बुध एवं शुक्र इन दोनों का योग द्वितीय या सप्तम में हो तथा शुभ ग्रह इनकों देख रहे हों | उच्च राशि का बुध सप्तम भाव में हों तथा धन भाव में धनेश कि दृष्टि हों | गुरु पूर्ण दृष्टि से धनेश को देखता हो, द्वितीयेश शुभ ग्रह कि राशि में हो तथा बुध या सप्तमेश द्वारा दृष्टि हो तो उक्त योगों में भी व्यापारी बनता है |

स्वे खलैः संयुते द्रष्टेे तत्पतावल्रे अंगपे |
साद्ये त्रिक नो सुखेन जीवनं दुरितेऽर्थे ||
सवोच्चेऽधेक्षित संयुक्तेऽबले अंगेशे सपामरे |
सहायो जीवनोंपायेऽनान्योऽर्थान्येरिपेसके||
किमु साहो कुवृत्तिः स्याद्धसतिर्नुः परालाये ||

द्वितीय भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हों तथा वे पाप द्रष्ट हों एवं धनेश निर्बल हो एवं त्रिक स्थान में पाप युक्त लग्नेश हो तो उक्त योगों में आजीविका सुखमय नहीं होती है | द्वितीयेश पाप ग्रह हो और वह सर्वोच्च राशि में हो तथा पाप ग्रहों से युक्त और द्रष्ट हो | लग्नेश निर्बल हो तथा पाप युक्त हो तो उक्त योगों में पुरुष के जीवनोपाय में अन्य सहायक नहीं होते है | व्यय भाव में षष्ठेश हो और वह सूर्य अथवा राहु से युक्त हो तो ऐसा व्यक्ति निन्दित वृत्ति वाला होता है |

धन भाव में मंगल हो तो जातक खेती करने वाला होता है | क्रय विक्रय करने वाला, लाल रंग के द्रव्य से युक्त, धातु जुआ आदि से धन कमाने वाला होता है | धन भाव में मंगल की स्थिति या दृष्टि धन नाश भी करती है | धन भाव में मंगल का प्रभाव अच्छा नहीं माना जाता है | हमारे अनुभव में धन भाव में यदि अकेला मंगल हो तो यह जातक आलसी प्रकृति का तथा काम से जी चुराने वाला होता है :-

वचसि विमुखो निर्विद्यार्थः कुजे कुजनाश्रितः |
द्वितीय भाव स्थितः सूर्यसुतः प्रसूते धनैविहीनं बहुशत्रु भाजम |

राजयोग

कोणस्थः कवितो गुरुर्धिषणतः सोमः सुते सोमत |
आदित्यो यदि कण्ट कालयगतो वातारव्योगः क्रये ||
दक्षो विक्रयकेऽपि पीनजठरो वातोद्वयः शासत्रचित् |
सम्पन्नः पृथुहन्नराधिपसमां वाग्मी क्षमानायकः ||

जातक के कुंडली में शुक्र से त्रिकोण में गुरु, उससे पञ्चम में चन्द्र और उससे केंद्र में सूर्य हो तो मरुद योग होता है | इस योग में उत्पन्न जातक क्रय- विक्रय में चतुर होता है | ऐसे जातक ट्रेडर (Trader) होते है | यह योग व्यूरिक्रेट कुंडली में भी देखा जा सकता है | प्रायः इस योग में उत्पन्न जातक किसी न किसी आयोग के सदस्य भी बनते है | कुंडली में चन्द्र से षष्ठ या अष्टम में स्थित गुरु यदि केंद्र में न हो तो दरिद्र सकट योग बन जाता है | परिश्रम करने पर भी धन कि प्राप्ति नहीं होती | लग्न में गुरु उसमे केंद्र में चन्द्र उस से तृतीय में सूर्य तथा मंगल और द्वितीय में राहू हो तो बुध योग कहा गया है | इस योग में उत्पन्न जातक श्रीयुक्त होता है | इसे राज्य लाभ भी हो सकता है :-

गोरोऽंंगे हिमगुश्चतुष्टयगतां गारा द्विधार्बाहुगौ |
राजन्यौ वसुगोऽसुरों निगदितो योगो बुधाख्यो बुधैः |
विख्यातो बुधजोनरोऽतुलबलो दुर्ह्रद्वियुक्छास्त्रचित् |
प्रज्ञावान् नरनाथ वैभवयुतां दक्षः क्रये विक्रये ||

लग्न एवं सप्तम में समस्त ग्रह हों तो शकट योग कहा जाता है | इस योग में उत्पन्न जातक ट्रांसपोर्ट का कार्य करते है | कई ड्राइवरों कि कुंडली में भी यह योग मिल सकता है :-

मार्त्तण्डमुख्याः खचरा नितान्तं कलेवरानङ्गनिकेतन्स्थाः |
प्रोक्तो बुधैन्द्रेः शकटाख्ययोगोऽनोवृत्तिरत्र प्रभवस्य ||
लग्नाब्ज्योर्बलवशात्पदसद्य कर्म्म यत्तत्स्वभाव जनितं तद्धीश वृद्ध्या |
वृद्धिर्भविदितरथाऽपचितिर्नरुक्ता कर्म्म स्वनाथशुभखेचर युक्तदृष्टया ||

चन्द्रमा तथा लग्न इन दोनों में जो बलवान् हो वह कर्म भाव कहलाता है |इस कर्म भाव के स्ववभाव के सामान ही जातक कर्म करता है | कर्म भाव के स्वामी कि वृद्धि से कर्म कि वृद्धि होती है तथा कर्म भाव के स्वामी कि हांनी से कर्म की हानि होती है | यदि यह स्थान अपने स्वामी या शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक कि जीविका सुखमय होती है | जिस जातक के कुंडली में कर्मेश या कोई भी ग्रह मित्रराशि में हो तो इस योग में उत्पन्न जातक किसी अन्य से जीवीका पाने वाला होता है | त्रिकोण या धन भाव में शनि, दशम में लग्नेश और अष्टम में पाप ग्रह हो तो उक्त योग में उत्पन्न जातक नीच कर्म करने से जीविका अर्जित करता ही | व्यवसायों को जानने के लिए हमें किन्द्ली में सर्वाधिक बलवान ग्रह जो लग्न या लग्नेश अथवा दशम व दशमेश पर प्रभाव दल रहा हो उस के बल स्वरूप के अनुसत व्यसाय या जीविका का पता चलता है | प्रत्येक ग्रह का अपना स्वरूप होता है | उसी अनुसार जातक जीविका अर्जित करता है | पञ्चम, द्वितीय लाभ तथा नवम ये धन प्रद उत्तम स्थान माने जाते है | सप्तम, चतुर्थ, लग्न तथा दशम ये धन प्रद मध्यम स्थान माने जाते है | इनकों क्रम से उतरोत्तर प्रबल धन प्रद मानना चाहिए |

व्यापारी खे मृगधरजनौवाथ राज्ये शुभानां |
दृष्टयाधिक्यऽथ दिवितनुपेऽथोद्याभ्रेंशयोगे ||
किं कृत्येशे मतिगुरुफले कण्टेक चारुदृष्टे ||
तद्वत्खेशे नभसि सशुभे मानशीलस्तथा स्यात् ||

आपके कुण्डली या दशम भाव बुध प्रधान हो तो जातक व्यापारी होते है | पञ्चम, नवम, लाभ या केन्द्र में दशमेश हो और वह शुभ ग्रहों से दृष्टि हो तो व्यापार योग बनता है | तृतीय भाव में षष्ठेश हो तो पाषाण प्रभृति का काष्ठों का विक्रेता होता है | सप्तम भाव के स्वामी का सम्बन्ध यदि धनेश से हो तो साझेदारी में लाभ होता है | सप्तमेश यदि धन भाव में हो तो भी साझेदारी से धन मिलता है यह साझा पत्नी के संग हो तो अच्छा धन मिलता है प्रायः ऐसे में ससुराल पक्ष से लाभ होता है | सप्तम भाव तथा लाभ में सम्बन्ध होने पर भी व्यापार में साझेदारी से लाभ मिलता है |सप्तम भाव का सम्बन्ध तृतीय भाव में होने पर भाई के साथ साझेदारी होती है | यहाँ पर हम यह भी अवश्य कहना चाहेगें कि सप्तमेश तृतीय भाव में होने पर सार्वजनिक कम्पनी की साझेदारी भी होती है | हमने कई बड़े उद्योग घरानों के चेयनमैन व प्रबन्ध निदेशकों की बिरला जी, बिल गेट्स कुंडली में यह योग देखा है |

स्वर्क्षत्रिकोण तुंगस्था यदि केन्द्रेषु संस्थिता |
अन्योन्दकारकस्ते स्युः केन्द्रेष्वेव हरेर्मतम् ||

जब ग्रह अपनी राशि, मूल त्रिकोण राशि अथवा उच्च राशि में हो कर दुसरे ग्रह अथवा ग्रहों से केन्द्र में होते है तो कारक कहलाते है | जब कोई स्वक्षेत्री अथवा उच्च ग्रह परस्पर केंद्र में स्थित होते है तो कारकाख्य और भी बलवान् होता है जब की उक्त उच्च आदि ग्रहों की स्थिति लग्न से भी केंद्र में हो | कोई भी ग्रह जब निज राशि को देखता है और वह राशि अथवा वह ग्रह अथवा उस ग्रह की अन्य राशि भी शुभ युक्त अथवा शुभ दृष्टि हो तो उस ग्रह को भी बली समझा जायेगा और उस ग्रह ग्रह को दोनों राशियों के बिच में सम्बन्ध स्थापित हुआ समझा जाएगा | यथा मेष लग्न हों और मंगल कन्या राशि में हो या मेष लग्न, मंगल अथवा वृश्चिक राशि इन तीनों में से एक पर भी किसी शुभ ग्रह का युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभाव हों तो मंगल बलवान् समझा जाएगा तथा लग्न एवं अष्टम भाव में सम्बन्ध स्थापित हुआ समझा जाएगा जिसके फल स्वरूप हम कह सकेगे कि इस जातक को अष्टम भाव सम्बंधित व्यक्तियों, वस्तुओं से लाभ रहेगा | कोई भी स्थान जिस स्थान से द्वादश भाव पड़ता है वह उसका “नाश” स्थान है | यथा लग्न शरीर होता है तो लग्न से द्वादश भाव शरीर के नाश का स्थान है | लग्न से धन भी देखा जाता है इसीलिए द्वादशा भाव धन के नाश तथा व्यय का स्थान है | नवम स्थान भाग्य है, अष्टम उससे द्वादश है अतः अष्टम दरिद्रता गरीबी का स्थान है | इसीलिए अष्टमेश धन के लिए अशुभ होता है | जातक का सकल और जीवन चक्र जिस लग्न या सूर्यलग्न या चन्द्र लग्न से मिलता हो उससे धन का विचार होनी चाहिए |

  • मेष लग्न में सूर्य और शुक्र धनदायक होता है |
  • वृष लग्न में बुध और शनि धनदायक होता है |
  • मिथुन लग्न में बुध, शुक्र तथा शनि से धनागम होता है |
  • कर्क लग्न में सूर्य, चन्द्र और मंगल धन देता है |
  • सिंह लग्न में सूर्य, मंगल और बुध धन देता है |
  • कन्या लग्न में बुध और शुक्र धन कारक ग्रह है |
  • तुला लग्न में शुक्र बुध और शनि धन देता है |
  • वृश्चिक लग्न में सूर्य चन्द्र और मंगल धनदायक होता है |
  • धनु लग्न में गुरु चन्द्र और मंगल ध कारक होता है |
  • मकर लग्न में बुध, शुक्र और शनि धन देने वाला होता है |
  • कुम्भ लग्न में शनि शुक्र और गुरु धन कारक योग बना देता है |
  • मीन लग्न में गुरु, चन्द्र और मंगल धन योग बना देता है |
विहंगमो यः सकलाभ्रचारिणां मध्येऽधिकांशः सइहात्मकारकः |
तस्मात्खगो न्यूनलवः प्रकीर्नत्त्यतेऽमात्यस्ततः सोदारकारक स्ततः ||

आत्म कारक ग्रहों का जातक कि वृत्ति में विशेष प्रभाव होता है | कुंडली में आत्म्कारक ग्रह यदि शुभ राशि के नवांश में होगा तो जातक सुखी एवं उच्च पदाधिकारी होता है | जन्म कुंडली में सभी ग्रहों में से जिस ग्रह के अंश एवं कला सर्वाधिक हो वही ग्रह आत्माकारक ग्रह कहलाता है | इस ग्रह से कम अंश वाला ग्रह अमात्यकारक, भ्रातृृ कारक, मातृकारक, पुत्रकारक, जातिकारक, स्त्रीकारक होते है | इसके लिए आप सबसे पहले आत्म कारक ग्रह को पहचाने | तदुपरांत नवांश कुंडली में इस आत्म कारक ग्रह को देखे कि यह किस नवांश में स्थित है | यहीं नवांश राशि कारकांश कुंडली की लग्न राशि कहलाएगी तथा आत्म कारक ग्रह लग्न में स्थित हो जाएगा | कारकांश लग्न से केंद्र त्रिकोण में शुभ ग्रह रहने से व्यथित सुखी एवं धनी होता है | इस व्यक्ति के पास स्थिर धन रहता है तथा सम्मान से जीवन व्यतीत करता है | पाप ग्रह होने पर व्यापार में धन हानि होती है | बुध एवं शुक्र का योग दशम भाव में होने पर सफल व्यापारी बनता है | इस योग में उत्पन्न व्यक्ति बड़े-बड़े उद्योग लगाता है तथा उसका नाम बड़े-बड़े उद्योगपतियों में गिना जाता है | दशम भाव में सूर्य एवं चन्द्रमा का योग होने पर उच्च सरकारी पदवी पाता है | कई वरिष्ठ अधिकारीयों के कुंडली में योग देखा | कारकंश कुंडली में पञ्चम या दशम भाव में शुक्र होने पर काव्य, साहित्य की ओर झुकाव रहता है | ऐसे व्यक्ति कला के क्षेत्र में भी रहते है | चन्द्र शुक्र के योग होने पर लेखन की ओर प्रेरित करता है गुरु के यहाँ पर रहने पर शिक्षा क्षेत्र जुड़ा होता है | शुक्र एव शनि का योग होने पर व्यक्ति बोलने में हिचकिचाहट शर्माता है | शनि के यहाँ पर रहने पर व्यक्ति उद्योग आदि लगाता है | यदि दशम भाव में सूर्य चन्द्र का योग हो तथा इनके साथ गुरु का भी योग हो जाए तो ऐसा व्यक्ति सम्मान के पात्र बनते है |

व्यवसाय तीन बातों का विचार करने के पश्चात् अब यह अनुमान लगाया जाता है कि जातक को किस व्यवसाय में सफलता मिलने कि आशा है | जातक कि लग्न या राशि के आधार पर अनुमान दो प्रकार से लगाया जाता है | राशि के स्वभाव के आधार पर और दुसरे राशि के तत्त्व के आधार पर राशि स्वभाव के अनुसार व्यवसाय विचार | ;- राशियाँ चर या स्थिर तथा द्विस्वभाव होती है | मेष, कर्क, तुला और मकर चर राशि है, वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ स्थिर राशि तथा मिथुन, कन्या, धनु और मीन द्वि स्व भाव राशियाँ है |

यदि चर राशिगत ग्रहों कि संख्या विशेष हो तो, जातक किसी भी स्वभाव व्यवसाय को करने वाला होता है | ऐसा व्यवसाय कि जिसमें चतुराई युक्ति, निपुणता, मेलजोल करने का ढंग, व्यवहार कुशलता का प्रयोग किया जाय | ऐसा जातक जिस किसी भी व्यवसाय में होगा उसको शिखर तक पहुचने का यत्न करेगा | ऐसा जातक नेता, अन्वेषक और अग्रणी बनता है |

यदि जातक की स्थिर राशि गत ग्रहों कि संख्या विशेष हो तो उन्नति ऐसे वयवसाय में होगी जिसमें धैर्य, शान्ति, सहनशीलता तथा दृढ़ता कि आवश्यकता होती है | ऐसा जातक सरकारी नौकरी में भी सफल रहता है | डॉ आदि द्वारा भी धन उपार्जन करता है, पुराने देर से चले आ रहे सुव्यवस्थित व्यवसायों में सफल रहता है |

यदि द्विस्वभाव राशियों में स्थित ग्रहों कि संख्या विशेष हो तो ऐसे जातक को अध्यापनकि, प्रोफेसरी, आढ़त, गुमाश्तागिरी, कमीशन पर एजेन्सी का काम आदि कार्यों में सफलता मिलती है | ऐसे व्यक्ति को वाणिज्य कि अपेक्षा नौकरी अधिक फल देती है |

यदि चर स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में से दो प्रकार की राशियों में बराबर- बराबर ग्रह हों और तीसरी प्रकार की राशियों में कम हों तो उन दोनों के बलबल को देखना होगा | ऐसे जातक की दो तरह के व्यवसायों में सफलता भी संभव है |

ज्योतिष में राशियाँ चार तत्त्व की कल्पना की गई है - अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल | मेष, सिंह, और धनु अग्नि तत्त्व है.वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्त्व है, मिथुन, तुला एवं कुम्भ वायु तत्त्व तथा कर्क,वृश्चिक और मीन जल तत्त्व है | ग्रहों में से सूर्य और मंगल अग्नि तत्त्व, चन्द्र और शुक्र जल तत्त्व, बुध पृथ्वी तत्त्व, गुरु आकाश तत्त्व और शनि तत्त्व है | इसके अनुसार पहले यह देखना होगा कि कुंडली में प्रबलतम ग्रह किस तत्त्व का है और वह किस तत्त्व की राशि में बैठा है | लग्न का तथा लग्न से दशम राशि का क्या तत्त्व है | अर्थात् बली ग्रह बली ग्रह की राशि का क्या तत्त्व है | इन चरों की स्थिति के अनुसार कौन सा तत्त्व विशेष है | यदि अग्नि तत्त्व की विशेषता है तो जातक की विशेष उन्नति उस व्यवसाय में होगी जिसमें बुद्धि और मानसिक क्रियाओं का चमत्कार दिखलाना अभीष्ट हो | यदि पृथ्वी तत्त्व की विशेषता होगी तो शारीरिक श्रम से साध्य व्यवसाय से धन धन प्राप्ति होगी | यदि जल तत्त्व प्रधान होगा तो जातक जमकर कार्य नही करता, वह अपना व्यवसाय बदलता रहता है | यदि अग्नि तत्त्व प्रधान व्यक्ति प्रतिभाशाली,कर्मठ, यांत्रिक और साहसिक होता है | वायु तत्त्व प्रधान व्यक्ति साहित्यिक, एजेंट, परामर्शदाता, कलाविद्, संवाददाता और प्रकाशक होता है | जल तत्त्व प्रधान व्यक्ति द्रव, जल,और विदेश से सम्बन्धित क्षेत्र में सफल होता है | पृथ्वी तत्त्व प्रधान व्यक्ति, भूमि, कृषि, भवन निर्माण राजनीती आदि में सफल रहता है |

शनि यदि तुला, मकर, कुम्भ, वृष और कन्या राशि या दशान्तार्दशा गोचर में का हो तो ऐसे जातक नौकरी करते है तथा उच्च पद प्राप्त करते है | यदि व्यवसाय में हो तो बड़ी कर्मों या मिलों के मालिक या अधिकारी होते है | शनि के कारकत्व परिज्ञान में आचार्यों ने शनि को वृत्ति का कारक माना है | कई नाड़ी ग्रंथों में भी शनि पर पड़ रहे अन्य ग्रहों के प्रभाव से वृत्ति का ज्ञान बताया गया है | अपने अनुभव से जातक के जीवन में कभी न कभी शनि पर पड़ रहे प्रभाव वाले ग्रहों के अनुसार वृत्ति अवश्य होती है | सफल जातकों के पीछे शनि जन्म या नवांश कुण्डलीं में बली पाया जाता है | यदि चन्द्रमा से केंद्र में बुध, गुरु तथा शुक्र हो या इनमे से दो ग्रह भी हो तो जातक स्वतन्त्र व्यवसाय करता है | चन्द्र से द्वितीय एकादश गुरु हो, या चन्द्र से तृतीय एकादश गुरु या शुक्र के होने पर भी स्वतन्त्र व्यवसाय करने वाला होता है |

आपके कुंडली में शुभ भावों के स्वामी बली होते है तो धन मिलता है | परन्तु देखने को मिला है कि प्रचुर धन कि प्राप्ति अनिष्ट भावों के स्वामियों की निर्बलता से भी होती है | बल्कि धन कि इस सिद्धांत के फलस्वरूप प्राप्ति शुभ बली ग्रहों कि प्राप्ति से कहीं अधिक होती है | अतः सूक्ष्म फलादेश जानने के लिए राशि से अधिक नक्षत्र द्वारा फलादेश सटीक होता है | जिस प्रकार प्रत्येक राशि का कोई न कोई स्वामी ग्रह होता है | उसी प्रकार प्रत्येक नक्षत्र का भी स्वामी ग्रह होता है | जातक के जन्म समय में जो नक्षत्र होता है | उसका भी जातक कि आजीविका का वर्णन कर रहे है | दशम भाव में स्थित ग्रह जिस नक्षत्र में वह स्थित है | उसके स्वामी ग्रह का विशेष प्रभाव पड़ता है | अतः इस ग्रह से सम्बन्धित व्यवसाय करता है |

वाच्या धनप्राप्ति विबुधैरुपान्याधिनादिग्भाग उतायराशैः |
दिग्भागतो वाऽखिलखेट मध्येबली ग्रहोयस्तु तदीय दिक्तः ||
द्रव्याप्तिरायेश्वर आयाकारको लाभेक्षको लाभकरोऽर्थपाऽर्थगः |
योऽर्थेकश्चेेष्वधिवीर्य्यवाञ्छुभासम्बन्ध वानस्य दशासुभुक्तिषु ||

जन्म कुंडली में लाभेश, लाभकारक, लाभदर्शी, लाभप्रद, धनेश तथा धनदर्शी इन में से जो सबसे अधिक बली हो तथा जिस का शुभ ग्रहों के साथ सम्बन्ध हो उस ग्रह कि दशा तथा अन्तर्दशा में धन लाभ कहना चाहिए | जन्म लग्न एवं चन्द्र से धन प्रद भावों के स्वामी गोचर से जब धन प्रद भावों में आए न्य धन प्रद भावों में स्थित ग्रह जब स्वराशि में प्राप्त हो तथा अन्योन्य राशि में हो तथा धन प्रद भाव के स्वामियों का इन भावों से योग हो एवं उन भावों में गोचर गत गुरु के आने पर धन लाभ होता है | जब योगकारक ग्रह कि दशा अन्तर्दशा चल रही हो तथा गोचर गत गुरु या धनेश आदि ग्रह धन प्राप्ति होता है | धन भाव में स्थित ग्रह, धन भाव को देखने वाला ग्रह, धनेश इन तीनों कि दशा अन्तर्दशा में धन प्राप्ति होती है | द्वितीय भाव और लाभ विधि भाव में से यदि धन भाव अर्थात् द्वितीय भाव अच्छा है और एकादश भाव दुर्बल है तो धन प्राप्त करने में अनेक कष्ट होगें परन्तु धन संचय होगा शि | यदि एकादश भाव उत्तम हो और द्वितीय भाव निर्बल हो तो धनोपार्जन सुगमता से होगा परन्तु धन संग्रह का सौभाग्य नहीं मिल सकेगा | दोनों भाव उत्तम हों तो लाभ भी सुगमता से होगा और संग्रह भी होता जाएगा |

लाभ की मात्रा इसका अनुमान ग्रहों के स्थिति उच्च, स्व गृही, मूल त्रिकोण आदि के अनुसार प्राप्त मिलता है | एक ही योग में भिन्न -भिन्न व्यक्तियों कि आयों में अंतर ग्रहों कि सबलता निर्बलता पर निर्भर करता है | जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के स्वामी के शुभाशुभ फल कि सफलता पहले प्रभावशाली होती है | उसके पश्चात् भाव के स्थित ग्रह का फल और क्रम सबसे प्रभावी भावदर्शी ग्रह का फल होता है | यदि धन देने वाले मंगल, नुध और शनि क्रमशः द्वितीय, चतुर्थ और सप्तम भाव में हो तो प्रायः निष्फल हो जाते है | यदि द्वितीय एकादश के स्वामी एक दुसरे के भाव होने से भी धनवान् होते है | गुरु और द्वितीय में अच्छा शुभ सम्बन्ध होने से भी गुणवान् धनवान् योग बना देता है |

बुध वाणिज्य कारक ग्रह है तथा सप्तम भाव से भी वाणिज्य का विचार किया जाता है | अतः सप्तम भाव और बुध दोनों का बल विचार कर और द्वितीयेश का शुभत्त्व आदि देखकर वाणिज्य कुशलता आदि फल कहना चाहिए | धन भाव से विक्रय - वाणिज्य का और सप्तम भाव से क्रय वाणिज्य का विचार होता है | यहाँ सप्तम भाव में स्थित विभिन्न ग्रहों के प्रभाव भी द्रष्टव्य हैं सप्तम भाव में सूर्य हों तो वाणिज्य प्रायः स्थिर रहता है रहेगी | चन्द्र हो तो वाणिज्य का स्वरूप बदलता रहेगा | आय सर्वथा अस्थिर रहेगी | वाणिज्य का स्थान तक भी बदलता रहेगा | मंगल हो तो व्यापारी आवेशशील रहेगा, नीलाम में बोली खूब चढ़ाकर बोलेगा और अंतमे घटा उठाएगा, ऐसा व्यापारी विवेक से नहीं चलता और अंत में व्यापार ठप्प हो जाता है | बुध हो तो शीघ्र क्रय-विक्रय, लाभ अधिक होता है | गुरु हो तो वाणिज्य ईमानदारी का तथा उन्नति शील रहता है | शुक्र हो तो सौभाग्य तथा लोकप्रियता प्रदान करता है | शनि का होना वाणिज्य के लिए अमंगल सूचक रहता है | राहू केतु भी प्रतिकूल पड़ते है |

अनुभव से पता चलता है कि जो कुण्डली और जो ग्रह सबसे ज्यादा जातक के जीवन में प्रतिनिधित्त्व करते है उसी के अनुसार जातक का भोग काल होता है | लग्न, सूर्य लग्न या चन्द्र लग्नादि जिस कुण्डली से सकल, जीवन और कर्म मिले उसी के ग्रहों के `अनुसार जातक का जीवन मार्ग चलता है | लग्न, चन्द्र लग्न और सूर्य लग्न इनमे से सबसे अधिक बली से दशम भाव स्थित राशि या ग्रहों के फल ;-सूर्य या सिंह राशि दशमस्थ हो तो जातक पैतृक सम्पत्ति या पिता के द्वारा सहयोग बना रहता है तथा वह अपने पराक्रम से धन अर्जित करता है | सूर्य दशमस्थ उसी का होता है जिसका जन्म दोपहर के समय होता है | इसीलिए कहा जाता है कि यदि दिवार्ध के समय बालक का जन्म हो तो वह प्रायः राजा अथवा धनी होता है | चन्द्र दशमस्थ हो तो माता द्वारा धन प्राप्त होताहै | मंगल दश मस्थ हो तो शत्रु द्वारा अर्थात् शत्रु पर विजय प्राप्त करके धन मिलता है | बुध यदि दशमस्थ हो तो मित्र या भाई द्वारा धन मिलता है | गुरु यदि दशमस्थ हो तो किसी से या भाई द्वारा धन लाभ होता है | शुक्र यदि दशमस्थ हो तो किसी स्त्री द्वारा धन आगमन होता है | शनि यदि दशामस्थ्हो तोसेवक आदि द्वारा धन प्राप्त होता है | यदि दशम भाव में कोई ग्रह न हो तो दशमेश के नवांशेश से विचार होता है | |

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हस्त सामुद्रिक रहस्यम्: सम्पूर्ण हस्त रेखा ज्ञान (ब्रह्म विद्या)

हस्त सामुद्रिक रहस्यम्: सम्पूर्ण हस्त रेखा ज्ञान (ब्रह्म विद्या)   हस्त- सामुद्रिक रहस्यम् ब्रह्म विद्या (रेखा) आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च |  पञ्चैतान्यापि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः || अर्थात्  आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पञ्च गर्भ में ही जातको को विधाता दे देते है |                     हस्त रेखा विज्ञान का वास्ताविक नाम सामुद्रिक शास्त्र है | इसके दो भेद माने जाते है, उनमे से प्रथम भाग हाथ , अंगुली और हथेली आदि की बनावट है और दूसरा मणिबंध और मस्तक रेखा आदि पर पड़ीं रेखाओं का ज्ञान है | सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार चार प्रकार के पुरुष होते है-  अथ शशकादितुर्यपुरुषाणां जीवन चरित्राणि :-  1. शशक पुरुष सुन्दर सुविचार से युक्त ६ फिट से उपर के होते थे, 2. मृग सुडौल सुन्दर सद्विचार से युक्त ६ फिट के होते है, ३ . तुरंग पुरुष माध्यम विचार और सुन्दर ५ /३० के होते है और ४ . बृषभ पुरुष (अधम पुरुष) जो बहुसख्यक सामान्य सकल, अधम विचार वाले ५ - ५ 1/2  फिट ...

Tripataki Chakra Vedh: त्रिपताकी चक्र वेध से ग्रहों का शुभाशुभ विचार | Dr. Sunil Nath Jha

भारतीय ज्योतिष शास्त्र (Indian Astrology) में जन्म कुंडली के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए कई चक्रों का उपयोग किया जाता है, जिनमें से Tripataki Chakra (त्रिपताकी चक्र) सबसे महत्वपूर्ण है। अक्सर लोग इसे बोलचाल की भाषा में Tipayi Cycle या Tipai Cycle के नाम से भी खोजते हैं, लेकिन इसका शुद्ध ज्योतिषीय नाम 'त्रिपताकी चक्र' है। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य Dr. Sunil Nath Jha द्वारा प्रस्तुत यह लेख आपको Tripataki Chakra Vedh की गणना, वेध दोष और ग्रहों के शुभाशुभ प्रभाव को समझने में मदद करेगा। यदि आप ज्योतिष के मूल आधार को समझना चाहते हैं, तो पहले ज्योतिष शास्त्र का परिचय (Jyotish Shastra) अवश्य पढ़ें। 1. त्रिपताकी चक्र क्या है? (Tripataki Chakra in Hindi) Tripataki Chakra Meaning: यह एक विशेष ज्योतिषीय चार्ट है जिसका उपयोग मुख्य रूप से 'बालारिष्ट' (बच्चों के स्वास्थ्य संकट) और जीवन में आने वाले अचानक संकटों (Vedh) को देखने के लिए किया जाता है। इसमें ग्रहों की एक विशेष ज्यामितीय स्थिति (Geometry) बनाई जाती है जिससे यह पता चलता है कि कौन सा पाप ग्रह ...

10 प्राण और उपप्राण (The 10 Pranas): शरीर में स्थान, कार्य और रहस्य | Dhananjay Pran & Vayu

शरीर के 10 प्राण: स्थान, कार्य और रहस्य (The 10 Pranas) By Astrologer Dr. Sunil Nath Jha (Vedic & Medical Astrologer) उत्तर तथा पश्चिम दिशा के मध्य कोण को वायव्य (North-West) कहते है। इस दिशा का स्वामी या देवता 'वायुदेव' है। वायु पञ्च होते है:- प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान। हर एक मनुष्य के जीवन के लिए पाँचों में एक प्राण परम आवश्यकता होता है। पांचो का शरीर में रहने का स्थान अलग-अलग जगह पर होता है। हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है, उसका नाम ‘प्राण’ (Vital Life Force) है। शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियां, नेत्र-श्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा अन्य सब अवयव-अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों को करते है। Quick Guide: 5 मुख्य प्राणों के स्थान (Summary Table) प्राण का नाम (Name) स्थान (Location) मुख्य कार्य (Function) 1. प्राण (Prana) नासिका से हृदय तक (Chest area) ...