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राशि क्या है? भारतीय ज्योतिष में राशि का वैज्ञानिक, दार्शनिक और फलित विवेचन

वैदिक ज्ञान और विज्ञान का मिलन: भारतीय ऋषियों द्वारा नक्षत्रों और राशि चक्र का अवलोकन।
चित्र १: राशि चक्र – जहाँ वैदिक ज्ञान और खगोलीय विज्ञान का संगम होता है।

१. प्रस्तावना (Introduction)

भारतीय ज्योतिष शास्त्र, जिसे वेदांग ज्योतिष के नाम से भी जाना जाता है, वेदों का नेत्र माना गया है। इस शास्त्र का मुख्य उद्देश्य काल (समय) और दिक (स्थान) के अंतर्संबंधों का अध्ययन कर मानव जीवन पर पड़ने वाले ब्रह्मांडीय प्रभावों का विश्लेषण करना है। इस विश्लेषण की आधारशिला 'राशि' (Rashi) है। संस्कृत भाषा में 'राशि' शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ 'समूह', 'ढेर' या 'पुंज' होता है। खगोलीय दृष्टिकोण से, यह भचक्र (Zodiac) का एक निर्दिष्ट खंड है, जबकि फलित ज्योतिष के दृष्टिकोण से, यह प्रारब्ध और संचित कर्मों का एक 'कोश' (Repository) है।

जब एक जिज्ञासु प्रश्न करता है कि "राशि क्या है?", तो इसका उत्तर मात्र 'मेष' या 'वृष' जैसे नामों तक सीमित नहीं रह जाता। यह प्रश्न हमें ब्रह्मांड की ज्यामिति, नक्षत्रों की ऊर्जा, और कालपुरुष (Cosmic Being) के शरीर विज्ञान की ओर ले जाता है। भारतीय ऋषियों ने आकाश मंडल के ३६० डिग्री के विस्तार को १२ बराबर भागों में विभाजित कर प्रत्येक भाग को एक 'राशि' की संज्ञा दी। यह विभाजन यादृच्छिक (Random) नहीं था, बल्कि इसके पीछे गणितीय समरूपता, पंचतत्वों का संतुलन और नक्षत्रों का सूक्ष्म संयोजन निहित था।

प्रस्तुत शोध रिपोर्ट में हम राशि की अवधारणा का व्यापक विश्लेषण करेंगे। हम इसके वैज्ञानिक और खगोलीय आधारों की चर्चा करेंगे, विशेष रूप से निरयन (Sidereal) और सायन (Tropical) पद्धतियों के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करेंगे। इसके अतिरिक्त, वृहत् पाराशर होरा शास्त्र (Brihat Parashara Hora Shastra - BPHS), सारावली और फलदीपिका जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के संस्कृत श्लोकों के माध्यम से प्रत्येक राशि के स्वरूप, गुणधर्म और महत्व का गहन विवेचन किया जाएगा।

राशि का वैज्ञानिक आधार: क्रांतिवृत्त (Ecliptic) और ३० डिग्री विभाजन का आरेख।
चित्र २: राशि का वैज्ञानिक आधार – Ecliptic, ३०° विभाजन और आकाशीय गणित।

२. राशि का वैज्ञानिक और खगोलीय आधार (Scientific and Astronomical Basis)

राशि को पूर्णतया समझने के लिए सर्वप्रथम हमें आकाश मंडल की संरचना और पृथ्वी के सापेक्ष ग्रहों की गति के विज्ञान को समझना अनिवार्य है।

२.१ भचक्र और क्रांतिवृत्त (The Zodiac and the Ecliptic)

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, परन्तु पृथ्वी पर स्थित प्रेक्षक को ऐसा प्रतीत होता है कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। सूर्य के इस आभासी पथ को क्रांतिवृत्त (Ecliptic) कहा जाता है। यह क्रांतिवृत्त एक ३६० डिग्री का वृत्ताकार मार्ग है। इस मार्ग के दोनों ओर लगभग ८-९ डिग्री चौड़ी एक पट्टी होती है, जिसे भचक्र (Zodiac Belt) कहा जाता है। इसी पट्टी के भीतर सभी ग्रह (चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) भ्रमण करते हैं।

भारतीय ज्योतिष में काल गणना की सुविधा और ऊर्जा के वर्गीकरण के लिए इस ३६० डिग्री के भचक्र को १२ बराबर भागों में विभाजित किया गया है:

एक राशि का कोणीय मान =
360°12
= 30°

अर्थात्, प्रत्येक राशि आकाश में ३० डिग्री का क्षेत्र घेरती है। जब हम कहते हैं कि सूर्य मेष राशि में है, तो इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि सूर्य भचक्र के ० डिग्री से ३० डिग्री के खंड (Sector) से गुजर रहा है।

२.२ निरयन बनाम सायन प्रणाली (Nirayana vs. Sayana System)

राशि की परिभाषा में भारतीय (वैदिक) और पाश्चात्य (Western) ज्योतिष के बीच एक मौलिक वैज्ञानिक मतभेद है, जिसे समझना अत्यंत आवश्यक है। यह भेद 'अयन' (Precession of Equinoxes) पर आधारित है।

२.२.१ सायन (Tropical Zodiac) - पाश्चात्य दृष्टिकोण
पाश्चात्य ज्योतिष 'सायन' (स+अयन = अयन सहित) प्रणाली का उपयोग करता है। इसमें राशि चक्र का आरंभ उस बिंदु से माना जाता है जहाँ सूर्य विषुवत रेखा (Equator) को पार करता है, जिसे वसंत विषुव (Vernal Equinox) कहते हैं। यह घटना प्रतिवर्ष लगभग २१ मार्च को होती है। सायन प्रणाली में २१ मार्च को सदैव मेष राशि का प्रथम दिन माना जाता है, चाहे आकाश में तारों की स्थिति कुछ भी हो। यह प्रणाली ऋतुओं (Seasons) पर आधारित है, नक्षत्रों पर नहीं।

२.२.२ निरयन (Sidereal Zodiac) - भारतीय दृष्टिकोण
भारतीय ज्योतिष 'निरयन' (निर+अयन = अयन रहित) प्रणाली पर आधारित है। इसे Sidereal Zodiac कहा जाता है। भारतीय ऋषियों का मत था कि पृथ्वी की धुरी (Axis) स्थिर नहीं है; यह एक लट्टू की भांति घूमती है (Wobbling of Earth), जिसके कारण विषुव बिंदु (Equinox Point) प्रतिवर्ष लगभग ५०.२६ सेकंड पीछे खिसक जाता है। इसे 'अयनांश' कहते हैं।

निरयन प्रणाली में राशियों का निर्धारण आकाश में स्थित स्थिर तारों (Fixed Stars) के संदर्भ में किया जाता है। इसमें मेष राशि का प्रारंभ किसी गणितीय बिंदु से न होकर, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम तारे (Zeta Piscium) के ठीक १८० डिग्री विपरीत 'चित्रा' नक्षत्र (Spica) के आधार पर तय किया जाता है। इसका परिणाम यह है कि निरयन प्रणाली में राशियाँ वास्तविक तारामंडलों (Constellations) के साथ संरेखित (Aligned) रहती हैं।

विशेषता निरयन (भारतीय/वैदिक) सायन (पाश्चात्य)
आधार स्थिर तारे (Fixed Stars) विषुव बिंदु (Equinoxes)
प्रारंभ बिंदु चित्रा नक्षत्र के सापेक्ष (अश्विनी का आरंभ) वसंत विषुव (21 मार्च)
अयनांश अयनांश का प्रयोग होता है (घटाया जाता है) अयनांश का प्रयोग नहीं होता
वास्तविकता आकाश में दिखाई देने वाली वास्तविक स्थिति ऋतुओं पर आधारित सांकेतिक स्थिति

वैज्ञानिक निष्कर्ष: चूंकि भारतीय ज्योतिष कर्म और आध्यात्मिक प्रारब्ध पर केंद्रित है, इसलिए यह तारों की वास्तविक स्थिति (Stellar Position) को महत्व देता है। यही कारण है कि यदि पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार कोई व्यक्ति 'स्कॉर्पियो' (Scorpio) है (क्योंकि उसका जन्म नवंबर में हुआ), तो वैदिक ज्योतिष में उसका सूर्य 'तुला' (Libra) राशि में पाया जा सकता है, क्योंकि वास्तव में सूर्य उस समय तुला तारामंडल के सामने होता है।

२.३ अयनांश (Ayanamsa) का गणितीय महत्व

सायन और निरयन राशि चक्रों के बीच के कोणीय अंतर को अयनांश कहा जाता है। किसी भी ग्रह की स्पष्ट निरयन स्थिति (True Sidereal Longitude) प्राप्त करने के लिए सायन स्थिति में से अयनांश को घटाया जाता है।

निरयन स्पष्ट ग्रह = सायन स्पष्ट ग्रह - अयनांश

भारतीय ज्योतिष में अयनांश के सटीक मान को लेकर विभिन्न मत हैं, जिनमें लाहिड़ी अयनांश (Lahiri Ayanamsa), जिसे 'चित्रपक्ष अयनांश' भी कहते हैं, सर्वाधिक मान्य है और भारत सरकार की 'Calendar Reform Committee' द्वारा स्वीकृत है। इसके अतिरिक्त रमन अयनांश और कृष्णमूर्ति अयनांश भी प्रचलित हैं। वर्तमान में यह मान लगभग २४ डिग्री के आसपास है, जिसका अर्थ है कि सायन और निरयन राशियों में लगभग २४ दिनों का अंतर आ चुका है।

३. राशि और नक्षत्र का अंतर्संबंध (Interrelation of Rashi and Nakshatra)

वैदिक ज्योतिष की विशिष्टता यह है कि यह केवल १२ राशियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि २७ नक्षत्रों (Lunar Mansions) की सूक्ष्म व्यवस्था का भी उपयोग करता है। राशि और नक्षत्र का संबंध गणितीय रूप से अत्यंत सटीक है।

३.१ विभाजन का गणित

  • कुल भचक्र: ३६० डिग्री
  • नक्षत्रों की संख्या: २७
  • एक नक्षत्र का मान: 360° / 27 = 13° 20' (१३ डिग्री २० मिनट)
  • एक राशि का मान: 30°

अतः, एक राशि में नक्षत्रों की संख्या:

30°13° 20'
= 2.25 नक्षत्र

अर्थात्, सवा दो नक्षत्र मिलकर एक राशि का निर्माण करते हैं। यह गणना बताती है कि राशि एक 'स्थूल शरीर' है, जबकि नक्षत्र उसकी 'सूक्ष्म आत्मा' है। किसी भी ग्रह का प्रभाव केवल उसकी राशि से नहीं, बल्कि वह किस नक्षत्र में स्थित है, उससे निर्धारित होता है।

३.२ चरण और नवांश (Padas and Navamsa)

सूक्ष्मता के लिए प्रत्येक नक्षत्र को ४ बराबर भागों में विभाजित किया गया है, जिन्हें 'चरण' या 'पद' (Pada) कहा जाता है।

एक चरण का मान =
13° 20'4
= 3° 20'

चूँकि एक राशि ३० डिग्री की होती है और एक चरण ३ डिग्री २० मिनट का, तो:

एक राशि में कुल चरण =
30°3° 20'
= 9 चरण

यह '९' का अंक वैदिक ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नवग्रहों और नवांश कुंडली (D-9 Chart) का आधार है। नवांश कुंडली, जो विवाह और ग्रह बल के लिए देखी जाती है, वास्तव में राशि के इसी ९-भागीय विभाजन का विस्तार है।

राशि (Rashi) नक्षत्र (Nakshatra) चरण (Pada) कोणीय विस्तार (Degrees)
मेष (Aries) अश्विनी १, २, ३, ४ 0° - 13°20'
भरणी १, २, ३, ४ 13°20' - 26°40'
कृत्तिका 26°40' - 30°00'
वृष (Taurus) कृत्तिका २, ३, ४ 0° - 10°00'
रोहिणी १, २, ३, ४ 10°00' - 23°20'
मृगशिरा १, २ 23°20' - 30°00'

इस प्रकार, राशियाँ और नक्षत्र एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। उदाहरण के लिए, मेष राशि का अंतिम भाग (कृत्तिका नक्षत्र) अग्नि तत्व का होने के कारण सूर्य के प्रभाव में अधिक होता है, जबकि प्रारंभिक भाग (अश्विनी) केतु के प्रभाव में होता है।

कालपुरुष संकल्पना: मानव शरीर और ब्रह्मांड का संबंध
चित्र ३: कालपुरुष सिद्धांत – १२ राशियाँ शरीर के अंगों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

४. कालपुरुष संकल्पना और राशि (Concept of Kalapurusha and Rashi)

वैदिक दर्शन "यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" (As in the microcosm, so in the macrocosm) के सिद्धांत पर कार्य करता है। इसी सिद्धांत के अंतर्गत, १२ राशियों को ब्रह्मांडीय पुरुष या कालपुरुष (Cosmic Man) के शरीर के अंगों के रूप में कल्पित किया गया है। यह संकल्पना चिकित्सा ज्योतिष (Medical Astrology) का मेरुदंड है। यदि आप मानव शरीर के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) और प्राण वायु के सूक्ष्म संबंधों को समझना चाहते हैं, तो यह विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अध्याय ४, श्लोक ४ में इसका स्पष्ट वर्णन है:

शीर्षानने तथा बाहू हृत्क्रोडकटिबस्तयः।
गुह्योरुयुगले जानुयुग्मे वै जङ्घके तथा॥४॥
चरणौ द्वौ तथा मेषात् ज्ञेयाः शीर्षादयः क्रमात्।

विश्लेषण:
श्लोक के अनुसार, मेष आदि राशियाँ कालपुरुष के सिर से लेकर पैर तक के अंगों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

  • १. मेष (Aries): सिर (Head) - मस्तिष्क, कपाल।
  • २. वृष (Taurus): मुख (Face) - चेहरा, गला, गर्दन।
  • ३. मिथुन (Gemini): बाहू (Arms) - कंधे, बाहें, श्वास नली।
  • ४. कर्क (Cancer): हृत् (Heart) - छाती, फेफड़े, हृदय।
  • ५. सिंह (Leo): क्रोड (Stomach/Belly) - ऊपरी पेट, पाचन अग्नि।
  • ६. कन्या (Virgo): कटि (Waist) - कमर, आंतें।
  • ७. तुला (Libra): बस्ति (Bladder/Lower Abdomen) - नाभि के नीचे का भाग, गुर्दे।
  • ८. वृश्चिक (Scorpio): गुह्य (Privities) - जननांग, उत्सर्जन तंत्र।
  • ९. धनु (Sagittarius): ऊरु (Thighs) - जांघें।
  • १०. मकर (Capricorn): जानु (Knees) - घुटने।
  • ११. कुंभ (Aquarius): जङ्घा (Shanks/Calves) - पिंडलियां, टखने।
  • १२. मीन (Pisces): चरण (Feet) - पैर, तलवे।

इस विभाजन का व्यावहारिक उपयोग यह है कि यदि किसी जातक की कुंडली में कोई विशेष राशि पाप ग्रहों (Malefic Planets) से पीड़ित है, तो कालपुरुष के उसी अंग में व्याधि होने की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, यदि मेष राशि में शनि और राहु की युति हो, तो जातक को सिर में चोट या माइग्रेन की समस्या हो सकती है।

५. द्वादश राशियों का विस्तृत स्वरूप (Detailed Nature of the 12 Rashis)

महर्षि पाराशर ने 'वृहत् पाराशर होरा शास्त्र' (BPHS) के राशिस्वरूपध्याय (अध्याय ४) में प्रत्येक राशि के गुण, धर्म, स्वरूप और तत्व का विस्तृत वर्णन किया है। ये श्लोक मात्र काव्य नहीं हैं, बल्कि इनमें राशि के मनोवैज्ञानिक और भौतिक गुणों के सूत्र छिपे हैं। हम यहाँ प्रामाणिक संस्कृत श्लोकों और उनके विस्तृत विश्लेषण के माध्यम से प्रत्येक राशि को समझेंगे।

५.१ मेष राशि (Aries) - सृजन का आदि स्पंदन

रक्तवर्णो बृहद्गात्रः चतुष्पाद् रात्रिबली।
पूर्ववासी नृपज्ञेयो शैलेचरी रजो गुणी॥
पृष्ठोदयी पावकी च मेष राशिरिहाधिपः। 4

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • रक्तवर्णो (Blood Red Color): मेष राशि का वर्ण रक्त जैसा लाल है। यह रंग ऊर्जा, जीवन शक्ति, उत्साह और कभी-कभी क्रोध का प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टि से, यह मंगल (Mars) ग्रह की ऊर्जा को दर्शाता है जो रक्त में हीमोग्लोबिन और मांसपेशियों की शक्ति का कारक है।
  • बृहद्गात्रः (Large Limbs): इसका शरीर विशाल या गठीला होता है। मेष राशि के जातक शारीरिक रूप से मजबूत और सुदृढ़ होते हैं।
  • चतुष्पाद् (Quadruped): यह चार पैरों वाली राशि है (मेढ़ा/Ram)। चतुष्पद राशियाँ शक्ति की परिचायक होती हैं, लेकिन उनमें बौद्धिकता की अपेक्षा शारीरिक बल की प्रधानता हो सकती है।
  • रात्रिबली (Strong at Night): यह राशि रात्रि में बलवान होती है। इसका अर्थ है कि मेष राशि के जातक शांत वातावरण या रात्रि के समय अपनी ऊर्जा का बेहतर उपयोग कर सकते हैं, या इनका अचेतन मन (Subconscious) प्रबल होता है।
  • पूर्ववासी (Residing in East): यह पूर्व दिशा की स्वामी है।
  • नृपज्ञेयो (Related to Kings): इसमें क्षत्रिय गुण होते हैं - शासन, नेतृत्व और रक्षा करने की क्षमता। लग्न में मेष राशि होने पर यह गुण विशेष रूप से दिखते हैं।
  • शैलेचरी (Wanders in Hills): यह पर्वतों पर विचरण करती है। यह गुण जातकों में ऊंचाइयों को छूने की महत्वाकांक्षा, जोखिम उठाने की क्षमता और साहसिक स्वभाव को इंगित करता है।
  • रजो गुणी (Rajo Guna): यह रजोगुण प्रधान है, अर्थात् यह क्रिया (Action), गति और परिवर्तन की राशि है।
  • पृष्ठोदयी (Rising with Back): यह पीछे की तरफ से उदय होती है। फलित ज्योतिष में इसका अर्थ है कि जीवन के उत्तरार्ध में सफलता मिलती है या संघर्ष के बाद परिणाम प्राप्त होते हैं।
  • पावकी (Fiery): इसका तत्व अग्नि है। यह प्रेरणा, तेज और पाचन अग्नि (Jatharagni) का प्रतीक है।

५.२ वृष राशि (Taurus) - उत्पादन और स्थिरता

श्वेतः महाशब्दकारी च चतुष्पाद् रात्रिबली।
दक्षिणस्थो ग्रामचारी वणिग्भूमिरजो गुणी॥
पृष्ठोदयी च वृषभो शुक्रः तस्याधिपः स्मृतः। 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • श्वेतः (White): वृष राशि का वर्ण श्वेत है। यह पवित्रता, शांति और शुक्र (Venus) की सौम्यता का प्रतीक है।
  • महाशब्दकारी (Loud Sounding): यह जोर से शब्द करने वाली राशि है (बैल की तरह रंभाना)। यह गायन, वादन या प्रभावशाली वाणी का द्योतक हो सकता है।
  • चतुष्पाद् (Quadruped): यह भी चार पैरों वाली राशि है, जो भारी काम करने की क्षमता दर्शाती है।
  • ग्रामचारी (Resides in Villages): मेष के विपरीत जो पहाड़ों पर रहती है, वृष राशि गांवों या कृषि भूमि में निवास करती है। यह सामाजिक जीवन, खेती और संसाधनों के उत्पादन से जुड़ाव दर्शाती है।
  • वणिग् (Merchant/Business): यह वैश्य वर्ण की राशि है। इसका मुख्य उद्देश्य संसाधनों का प्रबंधन, धन संचय और व्यापार है। इसे 'अर्थ त्रिकोण' की पहली राशि माना जाता है, जो लक्ष्मी योग और समृद्धि का कारक भी बनती है।
  • भूमि (Earthy Element): इसका तत्व पृथ्वी है। यह व्यावहारिकता (Practicality), धैर्य और यथार्थवाद का गुण प्रदान करता है।
  • स्थिर संज्ञक (Fixed Sign): यद्यपि श्लोक में स्पष्ट नहीं लिखा, परन्तु वृष राशि स्थिर स्वभाव की मानी जाती है। इसके जातक अपने निर्णयों पर अटल रहते हैं।

५.३ मिथुन राशि (Gemini) - संचार और द्वैत

शीर्षोदयी नृयुग्मं च गदाहस्ते वीणाधरे।
प्रत्यग् वायुराशी च द्विपदो रात्रिबली तथा॥ 4

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • नृयुग्मं (Human Pair): इसका प्रतीक एक स्त्री और एक पुरुष का जोड़ा है। यह राशि मानवीय संबंधों, सहयोग और प्रजनन का प्रतीक है।
  • गदाहस्ते वीणाधरे (Holding Mace and Lute): पुरुष के हाथ में गदा (शक्ति/सुरक्षा) और स्त्री के हाथ में वीणा (कला/संगीत/विद्या) है। यह शक्ति और कला के संतुलन को दर्शाता है।
  • शीर्षोदयी (Rising with Head): यह सिर के बल उदय होती है। शीर्षोदय राशियाँ कार्यों में शीघ्र सफलता और अच्छी शुरुआत की सूचक होती हैं।
  • वायुराशी (Airy Element): इसका तत्व वायु है। वायु विचारों, संचार (Communication) और बुद्धि की गति का प्रतिनिधित्व करती है।
  • द्विपदो (Biped): यह मनुष्य राशि है। मनुष्य राशियाँ बुद्धि प्रधान होती हैं।
  • प्रकृति: यह द्विस्वभाव (Dual Sign) राशि है, जो अनुकूलनशीलता (Adaptability) और बहुमुखी प्रतिभा (Versatility) देती है।

५.४ कर्क राशि (Cancer) - भावना और संवेदना

पाटलो वनचारी च ब्राह्मणो निशिबली।
बहुचरणः स्थूलतनुः सत्वगुणी जलाधारे॥
पृष्ठोदयी कर्कराशीः मृगाङ्कः स्वामी कीर्तितः। 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • पाटलो (Pale Red/Pink): इसका रंग पाटल (गुलाबीपन लिए हुए) है।
  • वनचारी (Wanders in Forests): यह एकांतप्रियता या प्रकृति के निकट रहने की इच्छा को दर्शाता है।
  • ब्राह्मणो (Brahmin Varna): यह ज्ञान, शिक्षा और सात्विकता का प्रतीक है। संस्कारों, जैसे यज्ञोपवीत संस्कार और पठन-पाठन में इस राशि का विशेष महत्व है।
  • बहुचरणः (Many Feet): केकड़े (Crab) के कई पैर होते हैं। यह अस्थिरता या निरंतर गति का सूचक हो सकता है।
  • जलाधारे (Watery): इसका तत्व जल है और यह जल के स्थानों (बावड़ी, कुआं) में रहती है। यह भावनाओं की गहराई, अंतर्ज्ञान (Intuition) और पोषण (Nurturing) का कारक है।
  • सत्वगुणी (Sattra Guna): यह पवित्रता और दयालुता से युक्त है।
  • मृगाङ्कः स्वामी (Moon is Lord): चंद्रमा इसका स्वामी है, जो मन और माता का कारक है।

५.५ सिंह राशि (Leo) - राजसी सत्ता और तेज

पित्तलः पर्वतचारी च चतुष्पाद् दिनबली।
क्रूरो स्थिरो सिंहराशीः पुमान् सूर्योऽधिपः॥ 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • पित्तलः (Yellowish/Pale): इसका रंग पीला या धूम्र वर्ण का है।
  • पर्वतचारी (Wanders in Mountains): मेष की तरह यह भी ऊंचाई पसंद करती है, लेकिन गुफाओं (कंदराओं) में रहना इसका स्वभाव है, जो गोपनीयता और सुरक्षा का प्रतीक है।
  • दिनबली (Strong in Day): सूर्य इसका स्वामी है, अतः यह दिन में बलवान होती है। यह बाह्य जगत में सक्रियता और दृश्यता (Visibility) को दर्शाती है।
  • स्थिरो (Fixed): यह स्थिर राशि है। सिंह राशि के जातक अपनी सत्ता और सिद्धांतों को बनाए रखने में विश्वास रखते हैं।
  • पुमान् (Male): यह एक पुरुष संज्ञक राशि है, जो आक्रामकता और पहल (Initiative) का गुण देती है।
  • क्रूरो (Fierce): इसे क्रूर राशि कहा गया है, जिसका अर्थ है कठोर निर्णय लेने की क्षमता। कुंडली में यह राजयोग (Rajayog) का कारक बनती है।

५.६ कन्या राशि (Virgo) - शुद्धता और विश्लेषण

पिंगला रमणी कन्या सस्यदहना हस्ते।
द्विपदा दक्षिणार्धगा दिनबली च शीर्षोदयी॥ 1

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • रमणी कन्या (A Maiden): इसका प्रतीक एक कुमारी कन्या है। यह पवित्रता और निष्छलता का प्रतीक है।
  • सस्यदहना हस्ते (Holding Grain and Fire): उसके हाथ में अनाज की बाली (सस्य) और अग्नि/दीपक (दहना) है। अनाज 'पोषण' और 'सेवा' का प्रतीक है, जबकि अग्नि 'ज्ञान' और 'विश्लेषण' का। यह राशि संसाधनों के प्रबंधन और समस्याओं के समाधान में निपुण होती है।
  • पिंगला (Variegated Color): इसका रंग पिंगल (भूरा-पीला मिश्रण) है।
  • द्विपदा (Biped): यह मानवीय बुद्धि का प्रयोग करने वाली राशि है।
  • शीर्षोदयी (Rising with Head): यह व्यावहारिक कार्यों में सफलता देती है।

५.७ तुला राशि (Libra) - संतुलन और वाणिज्य

शीर्षोदयी द्युवीर्यढ्यो तौलि कृष्णो रजोगुणी।
नानापणे चरो राशिः वणिक विथी विचरति॥ 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • तौलि (Balance/Scale): इसका प्रतीक तराजू है। यह न्याय, निष्पक्षता और संतुलन (Balance) का द्योतक है।
  • वणिक विथी विचरति (Roams in Market Streets): यह बाज़ारों और व्यापारिक मार्गों में निवास करती है। तुला राशि वाणिज्य, व्यापार और जनसंपर्क (Public Relations) की राशि है।
  • चरो राशिः (Movable Sign): यह चर राशि है, जो विचारों और व्यापार में निरंतर गतिशीलता दर्शाती है।
  • रजोगुणी (Rajo Guna): यह सांसारिक गतिविधियों और इच्छाओं (Desire) से प्रेरित है।
  • शुद्र वर्ण: सेवा और व्यापार इसका धर्म है।
  • द्युवीर्यढ्यो (Strong in Day): यह दिन में बली होती है, क्योंकि व्यापार और सामाजिक कार्य दिन में होते हैं।

५.८ वृश्चिक राशि (Scorpio) - रूपांतरण और रहस्य

बहुगुह्यः कीटरूपी च ब्राह्मणो जलगो बली।
दिनबली पिशंगो च वृश्चिकः कुजदैवतः॥ 4

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • कीटरूपी (Insect/Scorpion Form): इसका प्रतीक बिच्छू है। बिच्छू अपने विष को छिपाकर रखता है और खतरा महसूस होने पर ही डंक मारता है। यह रक्षात्मक आक्रामकता (Defensive Aggression) का प्रतीक है।
  • बहुगुह्यः (Many Hiding Places/Cavities): यह बिलों, दरारों और छिपे हुए स्थानों में रहती है। यह रहस्य, गुप्त विद्या (Occult), शोध (Research) और छिपी हुई वस्तुओं का कारक है। अध्यात्म में यह गहन साधना और शिवलिंग के पूजन जैसे गूढ़ विषयों से भी जुडी है।
  • जलगो (Watery): यह जल तत्व है, लेकिन कर्क के बहते जल के विपरीत, यह 'स्थिर जल' (Stagnant/Deep Water) है। इसमें भावनाएं गहरी और तीव्र होती हैं।
  • पिशंगो (Reddish Brown): इसका रंग पिशंग है।
  • ब्राह्मणो: विचित्र रूप से इसे ब्राह्मण वर्ण माना गया है, संभवतः इसके ज्ञान और गुप्त विद्याओं में रुचि के कारण। यह राशि अक्सर मारक (Marak) प्रभाव या जीवन में बड़े बदलावों का कारण बनती है।

५.९ धनु राशि (Sagittarius) - लक्ष्य और धर्म

पृष्ठोदयी तोयकांतिः धनुर्धरो हयोपमः।
द्विपादौ प्रथमः प्रोक्तो उत्तरार्ध चतुष्पादः॥
सात्विको क्षत्रियो राशिः दिनबली बृहस्पतिः। 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • धनुर्धरो (Archer): इसका प्रतीक धनुष बाण लिए हुए पुरुष है। यह लक्ष्य-उन्मुख (Goal-oriented) स्वभाव को दर्शाता है।
  • हयोपमः (Horse-like): इसका पिछला भाग घोड़े का है और अगला भाग मनुष्य का (Centaur)।
  • द्विपादौ प्रथमः: पूर्वार्ध मनुष्य (बौद्धिक/मानवीय)।
  • उत्तरार्ध चतुष्पादः: उत्तरार्ध पशु (शक्ति/वेग)।
  • तोयकांतिः (Golden/Watery Luster): इसका रंग सोने जैसा चमकदार है।
  • क्षत्रियो: यह क्षत्रिय वर्ण की राशि है, जो धर्म की स्थापना के लिए युद्ध करने की तत्परता (Warriorship for Dharma) को दर्शाती है।
  • सात्विको: अग्नि तत्व होने के बावजूद यह सात्विक है, क्योंकि इसका उद्देश्य शुद्धिकरण और ज्ञान प्रसार है।

५.१० मकर राशि (Capricorn) - कर्म और संरचना

मृगास्यो मकरः प्रोक्तो पङ्कजः जलचरस्तथा।
पृष्ठोदयी दक्षिणस्थो मन्दोऽस्य स्वामी कीर्तितः॥ 4

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • मृगास्यो मकरः (Deer-faced Crocodile): इसका प्रतीक एक ऐसा जीव है जिसका सिर हिरण (मृग) का और धड़ मगरमच्छ (मकर) का है।
  • मृग (Deer): चंचलता और ऊंचाइयों पर चढ़ने की आकांक्षा।
  • मकर (Crocodile): पकड़ की मजबूती और जल (भावनाओं) में रहने की क्षमता।
  • यह प्रतीक 'Ambition' (महत्वाकांक्षा) और 'Persistence' (दृढ़ता) का अद्भुत मिश्रण है।
  • पङ्कजः (Born of Mud): यह कीचड़ युक्त स्थानों में रहती है। इसका दार्शनिक अर्थ है कि मकर राशि का जातक कठिन परिस्थितियों (कीचड़) से निकलकर कमल की तरह खिलता है। संघर्ष ही इसका स्वरूप है।
  • पृथ्वी तत्व: यह व्यावहारिक और संरचनात्मक (Structural) सोच देती है।
  • दक्षिणस्थो: दक्षिण दिशा की स्वामिनी। वास्तु रहस्यम में दिशाओं का ज्ञान आवश्यक है।

५.११ कुंभ राशि (Aquarius) - मानवता और दार्शनिकता

कुम्भः कुम्भधरो नरो बभ्रुवर्णो मध्यतनुः।
द्विपाद् द्युवीर्यो विज्ञेयो मध्यतोयगतो बली॥
शीर्षोदयी च तमोघ्नो शूद्रो पश्चिमवासकः।
सौरिदैवत्यो कथितो राशिरुग्रः स्थिरस्तथा॥ 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • कुम्भधरो नरो (Man holding a Pot): इसका प्रतीक एक पुरुष है जो कंधे पर घड़ा (कुम्भ) लिए हुए है। यह घड़ा केवल पानी का नहीं, बल्कि 'अमृत' या 'ज्ञान' का प्रतीक है जिसे वह विश्व के लिए ले जा रहा है। यह सेवा और मानवतावाद (Humanitarianism) का सूचक है।
  • बभ्रुवर्णो (Deep Brown/Off-white): इसका रंग बभ्रु है।
  • मध्यतोयगतो (Amidst Water): यद्यपि यह वायु तत्व (Airy) राशि है, लेकिन इसका निवास जल के मध्य बताया गया है। इसका अर्थ है कि यह भावनाओं (जल) को समझती है लेकिन उनसे लिप्त नहीं होती (वायु)। यह वैज्ञानिक तटस्थता (Scientific Detachment) है।
  • तमोघ्नो (Destroyer of Darkness): यह अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाली है।
  • स्थिर (Fixed): कुंभ राशि के जातक अपने विचारों और सिद्धांतों (Ideologies) के प्रति अत्यंत दृढ़ होते हैं।
  • उग्र (Fierce): यह उग्र स्वभाव की मानी गई है क्योंकि यह सत्य के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।

५.१२ मीन राशि (Pisces) - मोक्ष और अनंतता

मीनौ पुच्छस्यास्यगौ मत्स्यौ जलचारी च सत्ववान्।
अपादौ मध्यदेही च सौम्यस्थो ह्युभयोदयी॥
निशिबली तोयराशिर्विज्ञेयो ब्राह्मणो गुरुदैवतः। 18

शब्दशः विश्लेषण एवं व्याख्या:

  • पुच्छस्यास्यगौ मत्स्यौ (Fishes facing tail and head): दो मछलियाँ जो एक-दूसरे की पूंछ की ओर मुख किए हुए हैं, एक वृत्त बना रही हैं। यह 'यिन-यैंग' (Yin-Yang) की तरह द्वैत और पूर्णता का प्रतीक है। यह अंत और आरंभ के मिलन को दर्शाता है।
  • जलचारी (Watery): यह पूर्णतः जलीय राशि है। यह ब्रह्मांडीय महासागर (Cosmic Ocean) का प्रतीक है जहाँ सभी सीमाएं मिट जाती हैं।
  • अपादौ (Footless): इसके पैर नहीं हैं। यह भौतिक जगत में चलने की बजाय आध्यात्मिक जगत में तैरने की क्षमता को दर्शाता है।
  • उभयोदयी (Rising both ways): यह एकमात्र राशि है जो 'उभयोदयी' है (सिर और पीठ दोनों से)। यह अत्यंत लचीलापन (Flexibility) और किसी भी परिस्थिति में घुल-मिल जाने का गुण देती है।
  • सत्ववान् (Sattvic): यह मोक्ष, त्याग और निस्वार्थ सेवा की राशि है। तंत्र साधना और ध्यान के लिए यह सर्वोत्तम है।
  • महत्व: यह राशि कालपुरुष के पैर है और 'व्यय भाव' (12th House) की नैसर्गिक राशि है, जो मोक्ष (Liberation) को इंगित करती है।

६. राशियों का वर्गीकरण (Classification of Rashis)

राशियों का केवल नाम जानना पर्याप्त नहीं है। फलित ज्योतिष में ग्रहों के बल और स्वभाव को समझने के लिए राशियों का विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकरण (Classification) किया गया है।

६.१ तत्व भेद (Elemental Classification) - पंचमहाभूत

ब्रह्मांड पंचतत्वों से बना है, और राशियाँ इन तत्वों का वितरण करती हैं:

  • अग्नि (Fire): मेष, सिंह, धनु - ऊर्जा, उत्साह, नेतृत्व, क्रोध, पाचन शक्ति, प्रेरणा।
  • पृथ्वी (Earth): वृष, कन्या, मकर - स्थिरता, धैर्य, व्यावहारिकता, धन संचय, संरचना।
  • वायु (Air): मिथुन, तुला, कुंभ - बुद्धि, विचार, संचार, सामाजिकता, गति।
  • जल (Water): कर्क, वृश्चिक, मीन - भावना, संवेदना, अंतर्ज्ञान, पोषण, गोपनीयता।

आकाश तत्व (Ether) सभी में व्याप्त है, विशेष रूप से गुरु (Jupiter) के प्रभाव में।

६.२ स्वभाव भेद (Modality/Guna)

यह वर्गीकरण बताता है कि ऊर्जा कैसे कार्य करती है:

  • चर (Movable - Chara): मेष (१), कर्क (४), तुला (७), मकर (१०)।
    प्रकृति: ये राशियाँ सदैव चलायमान रहती हैं।
    फलित: चर राशि के जातक परिवर्तन पसंद करते हैं, यात्राएं करते हैं और नई पहल (Initiative) करते हैं। यदि लग्न चर राशि का हो, तो व्यक्ति जीवन में बहुत उन्नति करता है लेकिन स्थिरता की कमी महसूस कर सकता है।
  • स्थिर (Fixed - Sthira): वृष (२), सिंह (५), वृश्चिक (८), कुंभ (११)।
    प्रकृति: ये राशियाँ दृढ़ और अचल हैं।
    फलित: इनके जातक जिद्दी, दृढ़ निश्चयी और विश्वसनीय होते हैं। जो कार्य शुरू करते हैं, उसे पूरा करते हैं। रोग होने पर वह दीर्घकालिक (Chronic) हो सकता है।
  • द्विस्वभाव (Dual - Dwiswabhava): मिथुन (३), कन्या (६), धनु (९), मीन (१२)।
    प्रकृति: इनमें चर और स्थिर दोनों के गुण हैं।
    फलित: ये जातक परिस्थितियों के अनुसार ढल जाते हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा (Versatile) के धनी होते हैं। निर्णय लेने में कभी-कभी दुविधा (Dilemma) का सामना करते हैं।

६.३ पुरुषार्थ और राशियाँ (Purusharthas and Rashis)

भारतीय दर्शन में जीवन के चार लक्ष्य बताए गए हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। राशियाँ इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग हैं:

  • धर्म त्रिकोण (Dharma): मेष, सिंह, धनु (अग्नि तत्व)। ये जीवन के उद्देश्य और कर्तव्य का बोध कराती हैं।
  • अर्थ त्रिकोण (Artha): वृष, कन्या, मकर (पृथ्वी तत्व)। ये भौतिक संसाधनों और धन का प्रतिनिधित्व करती हैं।
  • काम त्रिकोण (Kama): मिथुन, तुला, कुंभ (वायु तत्व)। ये इच्छाओं, संबंधों और सामाजिक अभिलाषाओं से जुड़ी हैं।
  • मोक्ष त्रिकोण (Moksha): कर्क, वृश्चिक, मीन (जल तत्व)। ये मुक्ति, अध्यात्म और विसर्जन का मार्ग हैं।

७. राशि का व्यावहारिक एवं फलित महत्व (Practical and Predictive Significance)

भारतीय ज्योतिष में राशि का अनुप्रयोग अत्यंत व्यापक है।

७.१ चंद्र राशि की प्रधानता (Primacy of Moon Sign)

वैदिक ज्योतिष को 'चंद्र प्रधान' ज्योतिष कहा जाता है, जबकि पाश्चात्य ज्योतिष 'सूर्य प्रधान' है। मन का कारक: "चंद्रमा मनसो जातः" - ऋग्वेद। चूंकि सुख-दुःख की अनुभूति मन को होती है, इसलिए चंद्रमा जिस राशि में स्थित होता है (जन्म राशि), वही जातक का वास्तविक व्यक्तित्व तय करती है। गोचर (Transits): शनि की साढ़े साती, ढैया, या गुरु का गोचर सदैव चंद्र राशि से देखा जाता है, लग्न से नहीं। दशा आरम्भ: विंशोत्तरी दशा का गणन चंद्रमा के नक्षत्र और राशि से ही होता है।

७.२ राशि और विवाह (Guna Milan)

विवाह में अष्टकूट मिलान पूर्णतः राशि और नक्षत्र पर आधारित है। कुंडली से विवाह विचार करते समय भकूट दोष (राशियों का आपसी संबंध जैसे ६-८, २-१२ या ९-५ स्थिति) और नाड़ी दोष अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।

७.३ राशि गंडांत (Rashi Gandanta)

राशियों के संधि स्थल (Junction points) को गंडांत कहते हैं। विशेष रूप से जब एक जल तत्व की राशि समाप्त होती है और अग्नि तत्व की राशि शुरू होती है (जैसे मीन-मेष, कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु की संधि)। इन बिंदुओं पर नक्षत्र और राशि दोनों का अंत होता है। इसे गंड मूल भी कहा जाता है। यहाँ स्थित ग्रह या जन्म अत्यंत कष्टकारी और आध्यात्मिक संघर्ष वाला माना जाता है। यह राशि चक्र की सबसे संवेदनशील ग्रंथियां (Knots) हैं। गंड मूल और गंडांत दोष के उपाय समय रहते कर लेने चाहिए।

७.४ प्रश्न ज्योतिष और मुहूर्त

प्रश्न ज्योतिष में आरूढ़ लग्न और प्रश्न लग्न की राशि से ही सफलता या असफलता तय होती है। शीर्षोदय राशियाँ (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुंभ) प्रश्न के लिए शुभ मानी जाती हैं क्योंकि वे कार्य सिद्धि का संकेत देती हैं, जबकि पृष्ठोदय राशियाँ विलंब दर्शाती हैं। वेध आदि देखने के लिए त्रिपताकी चक्र का प्रयोग भी होता है।

८. निष्कर्ष (Conclusion)

"राशि क्या है?" - इस प्रश्न की मीमांसा करने पर हम पाते हैं कि राशि केवल तारों का समूह नहीं है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक 'फिल्टर' (Filter) है। जब सौर मंडल के ग्रह (ऊर्जा के स्रोत) इन राशियों (फिल्टर) से गुजरते हैं, तो उनकी ऊर्जा का रंग और गुण बदल जाता है। मंगल मेष में सेनापति है, तो मकर में अनुशासित कार्यपालक।

भारतीय ऋषियों ने निरयन पद्धति और अयनांश के विज्ञान द्वारा इसे आकाश की वास्तविकता से जोड़े रखा। कालपुरुष के अंगों के रूप में राशियाँ हमारे शरीर में विद्यमान हैं, और पुरुषार्थों के रूप में हमारे जीवन के लक्ष्यों में। मेष का साहस, वृष की स्थिरता, मिथुन का संवाद, कर्क की संवेदना, सिंह का तेज, कन्या की सेवा, तुला का न्याय, वृश्चिक का रहस्य, धनु का धर्म, मकर का कर्म, कुंभ का विज्ञान और मीन का मोक्ष - ये १२ राशियाँ मिलकर मानव जीवन की पूर्णता का चक्र निर्मित करती हैं।

अतः, राशि ज्योतिष शास्त्र की वह वर्णमाला है, जिसके बिना प्रारब्ध की भाषा को पढ़ना असंभव है।

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जिज्ञासा समाधान (Frequently Asked Questions)

१. राशि और नक्षत्र में क्या मूलभूत अंतर है?
राशि भचक्र का ३० डिग्री का बड़ा विभाजन है जो 'स्थूल शरीर' का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि नक्षत्र १३ डिग्री २० मिनट का सूक्ष्म विभाजन है जो 'आत्मा' और सूक्ष्म प्रभावों को दर्शाता है। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं।
२. भारतीय ज्योतिष में निरयन पद्धति का प्रयोग क्यों किया जाता है?
भारतीय ज्योतिष कर्म और प्रारब्ध पर केंद्रित है और तारों की वास्तविक स्थिति (Fixed Stars) को महत्व देता है। निरयन पद्धति अयनांश को घटाकर ग्रहों की वास्तविक स्थिति बताती है, जिससे फलित कथन अधिक सटीक होते हैं।
३. मेरी चंद्र राशि (Moon Sign) इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
वेदों के अनुसार "चंद्रमा मनसो जातः" - मन का कारक चंद्रमा है। चूंकि सुख-दुःख की अनुभूति मन को होती है, इसलिए चंद्रमा की स्थिति (राशि) ही जातक के व्यक्तित्व, मानसिक गठन और साढ़े साती जैसी घटनाओं को निर्धारित करती है।
४. विवाह मिलान में राशि की क्या भूमिका है?
विवाह के लिए अष्टकूट मिलान पूर्णतः चंद्र राशि और नक्षत्रों पर आधारित है। भकूट दोष और नाड़ी दोष जैसे प्रमुख कारक राशि की स्थिति से ही देखे जाते हैं।

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