परिचय: ज्योतिष और आर्थिक समृद्धि का संबंध
हर व्यक्ति के जीवन में तीन प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण होते हैं—मेरा करियर क्या होगा? मेरे पास धन कितना होगा? और मेरा भाग्योदय कब होगा? ज्योतिष शास्त्र (Vedic Astrology) केवल भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि यह आपके पूर्व जन्मों के कर्मों और वर्तमान की संभावनाओं के बीच एक सेतु का कार्य करता है।
प्राचीन ऋषियों जैसे वराहमिहिर और महर्षि पराशर ने ग्रहों की चाल और नक्षत्रों के माध्यम से आजीविका और धन के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया है। चाहे आप वित्त (Finance) के क्षेत्र में जाना चाहते हों या साहित्य और कला में, आपकी कुंडली का दशम (कर्म) और एकादश (आय) भाव सब कुछ स्पष्ट करता है। नीचे दिए गए लेख में, हम शास्त्रों के प्रमाण और श्लोकों के माध्यम से विश्लेषण करेंगे कि आपकी कुंडली आपके व्यवसाय और धन के बारे में क्या कहती है।
Wealth & Profession Through Astrology
आपका धनागम वा व्यवसाय चुनाव
वृत्ति मूलं अर्थः अर्थ मूलौ धर्मकामौ ||
आयुः कर्म च वित्तं विद्या निधनमेव च |
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ||
धनमाजर्य काकुत्स्थ धन मूल मिदं जगत् |
अन्तर ना भी जानाति निर्धनस्य मृत्स्य च ||
जातक के व्यवसायों के प्रकार का निर्णय ग्रहों की स्वरुप, बल आदि पर निर्भर करता है | जो ग्रह अत्यधिक बलवान् होकर लग्न, लग्नेश आदि आजीविका के द्योत्तक भाव पर प्रभाव डालता है | अतः ग्रहों के स्वरुप का ज्ञान आजीविका के निर्णय करने के लिए अत्यावश्यक है | अतः धन ही कमाना हर कार्य का प्रथम उदेश्य रहता है | जातक का व्यवसाय profession सभी आचार्यों वराह मिहिर, पराशर (Maharishi Parashara) और कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने दशम भाव की ओर संकेत किया है |
हमारा मत है जिस कुण्डली से जातक का सकल चेहरा मिले उस कुण्डली से जातक की जीवन मार्ग चलता है उस कुण्डली के दशम भाव से आजीविका या धनागम मिलता है | और कुछ विचार है एकादश भाव जो आय भाव है | आयेश किस दिशा और किस प्रकार कर्म से धनागम जातक को दे रहा है | ये सबसे महत्त्वपूर्ण पञ्चम विद्या भाव + दशम भाव कर्म + एकादश आय भाव = धनागम है तीनों के संयोग से ही धन का विचार कर सकते है |
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| धन योग (Dhan Yoga): आपकी कुंडली के भाव बताते हैं कि धन और सफलता किस क्षेत्र से आएगी—व्यापार, चिकित्सा या कानून? |
कर्मेशस्थनवांशराशि दवशात् वृतिं जगुस्त ज्ज्ञाः अर्थात् दशम भाव का स्वामी जिस नवांश में स्थित हो उस नवांश के स्वामी के अनुरुप भी धनागम होती है |
जीवन शक्ति और कर्म का गहरा संबंध है, जिसे हम प्राण ऊर्जा (Vitality) के माध्यम से भी समझते हैं। यदि प्राण शक्ति क्षीण है तो कर्म भी प्रभावित होता है।
लग्नाब्ज्योर्बलवशात्पदसद्य कर्म्म यत्तत्स्वभाव जनितं तदधीशवृद्ध्या |
वृधिर्भवेदितरथाऽपचितिर्नरुक्ता कर्म्म स्वनाथशुभखेचर युक्त दृष्टम् ||
अर्थात् लग्न, सूर्य और राशि में जो अधिक बली ग्रह हो तो वह कर्मस्थान कहलाता है | इस कर्म स्थान के स्वभाव के समान ही जातक कर्म करता है | कर्म स्थान के स्वामी की वृद्धि से कर्म की वृद्धि होती है तथा कर्म स्थान के स्वामी की हानि से कर्म की हानि होती है | यदि यह स्थान अपने स्वामी या शुभ ग्रह से दृष्टि हो तो जातक की जीविका सुखमय होती है |
आयुश्च वंशो जनको जनित्री भवन्ति धन्या विधिना युतेन ||
तनु गृहाद्वा तुहिनांशुराशेर्निकेतानं यन्नवमं तदेव |
विधेर्गृहं वा वलन्वांंस्तयोर्यस्त स्मान्नियत्या भवनं विचिन्त्यम् ||
पराक्रमस्थः प्रतिभालयस्थः पौरोपगः प्राणयुतः खपान्थः |
येषांजनौपुण्यगृहं प्रपश्येच्छ्रेष्ठा नरास्ते कथिताः कवीन्द्रैः ||
कुण्डली के समस्त भावों को छोड़कर सर्व प्रथम भाग्य पर विचार करना चाहिए क्योंकि भाग्यवान् पुरुष आयु, कुल, पिता माता और धन्य धान्य युक्त होते है | जन्म या चन्द्र लग्न इन दोनों में जो भाव बली हो उससे नवम भाव को भाग्य स्थान कहते है | जिस जातक के जन्म कुण्डली में तृतीय, पञ्चम, नवम या लग्न भाव में बलवान् कोई ग्रह उप स्थित हो तथा वह भाग्य भाव को देख रहा हो तो उस जातक भाग्यवान् होते है |
यानि गुरु लग्न में या पञ्चम भाव में होने पर व्यक्ति श्रेष्ठ होता है अर्थात् गुरु स्वस्थ और शुभ होने पर ही जीवन शकुन का चलता है | यह जन्म कुण्डली में ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है, लेकिन ज्योतिष के अनुसारे ग्रहों के प्रभाव से कुछ विशेष उम्र में भाग्योदय होता है | यथा गुरु से १६ वर्ष, सूर्य से २२ वर्ष में, चन्द्र से २४ वर्ष में, शुक्र से २५ वर्ष में, शनि से ३६ वर्ष में भाग्योदय हो सकता है |
जिस जातक के जन्म समय में नवम में नवमेश तथा लग्नेश हो या तृतीय भाव में कोई भी उच्च राशि या स्व राशि का ग्रह हो तो भी जातक को भाग्यवान् कहा जाता है | जातक को धन, यश, सुख- दुखादि योग - दशा या गोचर में या ग्रहों के दिशा में धन फल या नौकरी व्यवसाय मिलता है | यदि चन्द्र से बुध, गुरु तथा शुक्र हो या इनमे से दो ग्रह भी हो तो जातक स्वतन्त्र व्यवसाय करता है | चन्द्र से द्वितीय एकादश गुरु व शुक्र हो, चन्द्र से तृतीय एकादश गुरु या शुक्र के होने पर भी स्वतन्त्र व्यवसाय करने वाला होता है |
सः चेत् विलग्नात् केन्द्रवर्ती राजा भवेत् धार्मिकचक्रवर्ती ||
अर्थात् इस तरह के जातक बहुत धनाढ्य होता है क्योंकि चक्रवर्ती राजाओं जैसा कुछ सालों तक भोग करता है | जन्म कुण्डली में जो ग्रह नीच राशि में स्थित हो यदि उसकी नीच राशि का स्वामी लग्न से केन्द्र में स्थित हो अथवा उसकी उच्च राशि का स्वामी यदि लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो जातक धार्मिक चक्रवर्ती राजा होता है | ग्रहों की केन्द्रस्थिति से उनको बल मिलता है जिसके फलस्वरुप ग्रह नीचता का फल न देकर अच्छा फल देते है |
नीचस्तु नीचाधिपतेर्यदि स्यात् केन्द्रस्थितो नैनमुपैती भंगम् | अर्थात् नीच राशि का स्वामी केन्द्र स्थित भी भंग को प्राप्त नहीं होता | यदि वह नीच राशि में पड़ जाए | निष्कर्ष यह है कि नीच राशि के स्वामी का बलवान होना अपेक्षित है | कभी-कभी जीवन में बाधाएं गंड मूल दोष जैसे योगों के कारण भी आती हैं, जिनका निवारण आवश्यक है।
लग्नाधीश्वरभास्करामृतकारा केन्द्रत्रिकोणाश्रिताः स्वोच्च स्वऋक्षः, सुहृद्गृहानु पाता श्री कण्ठयोगो भवेत् | अर्थात् लग्न का स्वामी सूर्य तथा चन्द्र यदि केन्द्र अथवा त्रिकोण में स्थित हो | तात्पर्य ग्रह बलवान् हो तथा अपनी उच्च राशि, स्वराशि, मित्र राशि में अस्तित हो तो धनदायक योग बनता है | तथ्य तो यह है कि लग्न, सूर्य और चन्द्र तीनों लग्न में से जितने ग्रह अधिक से अधिक शुभ एवं बलवान् होने जातक उतना ही धनी, महान्,सत्तारुढ़, यशस्वी,निरोग होता है |
कुण्डली में नवम भाव यदि शुभ ग्रहों तथा अपने स्वामी से दृष्टि ही तो जातक के लिए भाग्य प्रद होता है | यदि सप्तमेश उच्च राशि में स्थित होकर दशम भाव में हो तथा दशम भाव का स्वामी नवमेश से युक्त हो तो इस योग में उत्पन्न जातक राजा या राज सम्मान प्राप्त करता है | यदि जन्म लग्न का स्वामी बलयुक्त होकर मूल त्रिकोण राशि में हो तथा नवमेश केन्द्र या परमोच्च राशि में हो तो लक्ष्मी योग (Lakshmi Yoga) बनता ही है | इस योग में जन्मा जातक भी राजा होता है तथा धनी होता है | धन भी इतना होता है कि उसका नाम विश्व के महाधनियों में जीना जा सकते है |
या यदि द्वादश भाव का स्वामी षष्ठः, अष्टम भाव में हो या अष्टम भाव का स्वामी षष्ठ द्वादश भाव में हो तो या षष्ठ भाव का स्वामी अष्टम या द्वादश में हो तो इस योग के कारण जातक महाधनी बनता है | यह योग प्रायः सभी धनी जातकों में देखा जाता है परन्तु इस योग पर पापी ग्रहों की दृष्टि से अपने ही जीवन काल में अस्त देखा गया है |
स्वोच्चस्थितौ वा स्वभगोऽपि येषांश्रेष्ठा मनुष्याः परिकीर्त्ति तसते ||
जिस जातक के जन्म कुण्डली के नवम में नवमेश या लग्नेश हो या तृतीय भाव में कोई भी उच्च राशि या स्व राशि का ग्रह हो तो जातक को भाग्यवान् हो सकता है | लग्न से उपचय स्थान में सब शुभ ग्रह हो तो अन्य अशुभ योगों के होते हुए भी जातक बहुत धनी होता है | इसी प्रकार चन्द्रमा से भी उपचय स्थानों में भी शुभ ग्रह हो तो धनी होता है | लग्न तथा चन्द्रमा से उपचय स्थान में एक शुभ ग्रह हो तो अल्प धनी दो शुभ ग्रह हो तो मध्यम धन देने वाला होता है | आपके कुण्डली में जो ग्रह या भाव राशि स्वामी बलवान् होगा वैसा जीवन रहेगा |
कोणः कोणेऽर्थेऽङ्गेपे खे क्षयेऽघैः स्यादाजीवी पूरुषो नीचवृत्त्या ||
जिस जातक के जन्म कुण्डली में मित्र राशि में एक ही ग्रह हो तो इस योग में उत्पन्न प्राणी किसी अन्य से जीविका पाने वाला होता है | त्रिकोण या धन भाव में शनि, दशम में लग्नेश और अष्टम में पाप ग्रह हो तो उक्त योग में उत्पन्न जातक नीच कर्म करने से जीविका अर्जित करता है | व्यवसायों को जानने के लिए हमे कुण्डली में सर्वाधिक बलवान ग्रह जो लग्न या लग्नेश अथवा दशम या दशमेश पर प्रभाव दे रहा हो उस के बल स्वरुप के अनुसार व्यवसाय या जीविका का पाता चलता है |
प्रत्येक ग्रह का अपना स्वरुप होता है | उसी अनुसार जीविका अर्जित करता है | यदि लाभ भाव को सभी ग्रह देख रहे हो तो उन लाभ कई श्रोतो से होता है | इन में से सबसे बली ग्रह का प्रभाव सर्वाधिक होता है | लाभ भाव में शुभ ग्रह हो तो उस जातक को शुभ कर्मों द्वारा लाभ होता है | यदि पाप ग्रह हो तो पाप कर्म द्वारा लाभ होता है | यदि लग्नेश व लाभेश दोनों ग्रह मित्र हो तो अच्छे कर्मों द्वारा धन लाभ मिलता है | इसी प्रकार लग्न से चतुर्थ भाव तक शुभ ग्रह हो तो प्रथमावस्था में लाभ होता है | चतुर्थ से द्वादश भाव सभी शुभ ग्रह हो तो वृद्धावस्था में लाभ होता है | यदि इन स्थानों में नीच कोई ग्रह या पाप ग्रह हो तो उस अवस्था में धन हानी भी संभव | लाभ स्थान में जो ग्रह हो उस के वर्ग के पदार्थ से भी धन लाभ होता है या फिर उस वर्ग के जातक तथा मित्र वर्ग के जातको से धन लाभ मिलता है |
दिग्भागतो वाअखिल खेट मध्येबली ग्रहोयस्तु तदीय दिक्तः ||
वर्तमान समय में वृत्ति तथा अधिपत्य एवं अधिकांस क्षेत्र में विस्तृत हो गया है नये नये व्यवसाय एवं वस्तु आज चलन में आ हुए है | जिनकों हम अपने पाठकों के लाभार्थ यहाँ प्रत्येक ग्रहों के अधिकार क्षेत्र में प्रस्तुत कर रहे है |
तत्पाके वा ताध्दृतौ कारकस्य स्वस्थ स्वाप्तिः प्रोच्यते वर्ग मूलात् ||
धन स्थान में स्थित ग्रह, धन स्थान को देखने वाला ग्रह, धनेश इन तीनों की दशा अन्तर्दशा में धन प्राप्ति होती है |
धनस्य लब्धिरीरिता तनूभृताम यत्नतः ||
लग्न में धनेश तथा धन में लग्नेश हो तो बिना यत्न के धन लाभ होता है | लाभेश, लाभकारक, लाभप्रद,लाभ दर्शी, धनेश तथा धनदर्शी इन में से जो सबसे अधिक बली हो तथा जिस का शुभ ग्रहों के साथ सम्बन्ध हो उस ग्रह की दशा तस्थ अन्तर्दशा में धन लाभ कहना चाहिए | धन स्थान में स्थिति ग्रह, धन स्थान को देखने वाला ग्रह, धनेश इन तीनों की दशा अन्तर्दशा में धन प्राप्ति होती है |
लब्धेशे वा विलग्नस्थे बहुनिध्यादिक भवेत ||
धन भाव में लग्नेश एवं लाभ भाव में धनेश लाभेश लग्न में हो तो गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है | पञ्चम भाव में स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि अचानक धन दिलवाती है | द्वितियेश पंचमेश का राशि परिर्वत्तन भी अचानक धन दिलवाता है | द्वितीयेश लग्नेश तथा लाभेश एक दुसरे के भावों में होने पर भी अचानक धन प्राप्ति होती है | लग्नेश धन भाव में हो, धनेश लाभ में हो तथा लाभेश लग्न में होने पर गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है | धनेश के अष्टम भाव में होने पर भी अचानक धन की प्राप्ति होती है | अचानक धन प्राप्ति में नवम, पञ्चम तथा राहू की भी विशेष भूमिका पाई जाति है | यदि एकादशेश चतुर्थ में हो तथा शुभ युक्त या दृष्ट हो तो भी गड़ा हुआ धन पाता है | जन्म समय में जो धन देने वाले हो उन ग्रहों की दिशाओं से धन प्राप्ति कहनी चाहिए |
लग्नानुसार धन योग
मेष लग्न के लिए सूर्य सबसे अधिक धन कारक ग्रह होता है | मंगल, गुरु और शनि भी धनकारक होता है | शुक्र यदि शुभ प्रभाव में हो तो भी धन कारक हो सकता है | यदि इन लग्न वालों का शुक्र बलवान् हो तो इन्हें स्त्री द्वारा धन प्राप्ति होती है | क्योंकि शुक्र यहाँ पर द्वितीय तथा सप्तम भाव का स्वामी होता है, जिसका संबंध विवाह विचार से भी होता है | सूर्य तथा चन्द्र एक साथ होने पर महाधनी होता है | पञ्चम भाव में सूर्य और लाभ भाव में गुरु, चतुर्थ भाव में गुरु मंगल का योग होने पर नीच गलत धन योग बना देता है | क्योंकि नीच भंग राजयोग बना सकता है | मंगल शुक्र के सयोग सप्तम भाव में होने पर स्वयं का कमाया और भाग्य बनाता है | लग्न में सूर्य तथा चतुर्थ में चन्द्र, पञ्चम में चन्द्र और नवम में गुरु, शुक्र शनि और धन भाव में दशम भाव में गुरु के होने पर धनी होता है | शुक्र द्व्द्श भाव में होने पर भी धनी रहता है | यहाँ पर द्वितीय द्वादश में होने पर भी यह धनदायक है | लग्न में सूर्य तथा चतुर्थ में गुरु धन भाव में शुक्र तथा तृतीय भाव में बुध होने पर जातक जन्म से ही धनी होता है |
वृष लग्न के लिए सूर्य, बुध और शनि धन कारक ग्रह है | सूर्य एवं बुध की युति इस लग्न वालों के लिए धनदायक है | शुक्र भी कोई बुरा फल नहीं देता है | षष्ठ भाव में शुक्र होने पर भी शुभ फल ही देखे गए है | शुक्र का बलवान होकर षष्ठ भाव से सम्बन्ध होने के कारण ननिहाल से लाभ मिलता है | लग्न में बुध, शुक्र एवं शनि होने पर भी धनी होता है | लग्न में शुक्र, सप्तम में बुध तथा एकादश भाव में शनि होने पर धनी होता है | गुरु एवं बुध की युति या दृष्टि भी होने पर धनी होता है | परन्तु मंगल से दृष्टि नहीं होना चाहिए | लाभ भाव में या लग्न में या षष्ठ भाव में शुक्र होने पर इसकी दशा भुक्ति में धन पाता है | लग्न में मंगल तथा सप्तम में चन्द्र गुरु होने पर धनी और यह जातक शेयरों द्वारा भी धन कमाता है | पञ्चम और एकादश का संयोग धनी बनाता है और पञ्चम भाव में राहू, शनी, शुक्र तथा मंगल के होने पर धनी होता है |
मिथुन लग्न के लिए शुक्र, बुध, चन्द्र तथा गुरु धनदायक ग्रह होते है | शनि यदि कुण्डली में स्वराशी या मित्र राशि का हो तो धन कारक होता है | उच्च का शनी होने पर अवश्य धन देता है | बुध के बलवान होने पर माता से धन मिलता है | यदि चन्द्र, मंगल तथा शुक्र धन भाव में हो तो शुक्र की दशा धन कारक होती है | चतुर्थ भाव में बुध तथा दशम में गुरु धनवान बनाता है | शनि नवम भाव में हो तथा चन्द्र मंगल एकादश भाव में हो, लग्न में बुध, पञ्चम में शुक्र, तथा धन भाव में गुरु हो और शुभ ग्रहों की दृष्टि होने पर धन योग बनता है | दशम भाव में चन्द्र मंगल का योग होने पर धनी होता है | चन्द्र, शुक्र एवं बुध की युति चतुर्थ भाव में होने पर जातक आजन्म धनी होता है |
कर्क लग्न के लिए सूर्य उच्च या स्वराशि होने पर धन कारक होता है | चन्द्र मंगल का योग बहुत धन कारक होते है | गुरु भी धन कारक होता है | लग्न में चन्द्र, गुरु, मंगल का योग होने पर बहुत धनी होता है | चन्द्र गुरु ही लग्न में हो तो धनी होता है | चन्द्र लग्न में हो मंगल गुरु से दृष्टि होने से धन योग बना देता है | पञ्चम भाव में सूर्य शुक्र हो तथा धन भाव में चन्द्र मंगल गुरु हो या योग हो तो धनी होता है | सूर्य मंगल दशम भाव में होने पर धनी होता है | चन्द्र, बुध तथा शुक्र एकादश भाव में हो गुरु लग्न में तथा सूर्य दशम में होने पर धनी योग बनता है | आप के कुण्डली में एकादश और द्वितीय भाव के स्वामी गुरु से सम्बन्ध बनाने से ही धन योग बनता है | धन भाव और लाभ भाव में सूर्य चन्द्र होने पर धन योग बनता है धन भाव में शुक्र, बुध, या अष्टम में गुरु शुक्र होने से भी धन योग बनता है | चतुर्थ भाव में शुक्र एवं शनि हो तथा लग्न में चन्द्र गुरु होने पर भी धनी होता है |
सिंह लग्न में सूर्य, मंगल और बुध धनदायक ग्रह है | शनि इस लग्न वालों के लिए धन कारक ग्रह होते है | यदी मंगल के साथ द्वादश भाव में स्थित हो तो अपनी दशा अन्तर्दशा में धन दायक होता है | शनि यहाँ पर षष्ठेश होकर द्वादश भाव में स्थित होने पर विपरीत राज्य योग द्वारा धन कारक होता है | इसकी युति योगकारक ग्रह मंगल के साढ़ द्वादश भाव में होने पर धन कारक होती है | लग्न में सूर्य, मंगल, गुरु होने पर पूर्ण महादश में धनवान योग बनता है | धन भाव में बुध हो तथा लग्न या लाभ भाव में सूर्य होने पर धनी, सूर्य, गुरु और बुध का केन्द्र त्रिकोण से संयोग धनदायक बनाता है | यदि गुरु नवम, मंगल दशम में हो तथा बुध एवं शुक्र लग्न या धन भाव में हो तो धनवान योग बनता है | दशम भाव में मंगल के होने से तथा राहू की दृष्टि से सट्टा - शेयर से धन कमाता है | धन भाव में बुध शुक्र की युति और गुरु केन्द्र में या दृष्टि से भी धन योग बनता है |
कन्या लग्न में बुध, शुक्र योग कारक ग्रह होता है | क्योंकि शुक्र द्वितीय नवम भाव का स्वामी होता है | यदि शुक्र बलवान् हो तो पिता से धन मिलता है | आपका सूर्य चन्द्र या शुक्र से प्रभावित होने से भी धन योग बनता है | बुध की दशा भी धनकारक बनता है | लग्न में शुक्र बुधक संयोग से भी, लग्न में बुध और सप्तम भाव में शुक्र होने पर भी, लग्न में राहू, शुक्र, मंगल या शनि होने पर पापी धन योग, धन भाव में शनि होने पर तथा दशम भाव में गुरु एवं एकादश भाव चन्द्र सूर्य होने पर शेयर से धन का योग, पञ्चम में शनि ओअलभ में चन्द्र होने पर भी धन योग, कन्या लग्न में चन्द्र या बुध शुक्र से युति धन योग बनता है | केन्द्र या त्रिकोण आपस में सम्बन्ध होने से धन योग बनता है |
तुला लग्न
भाग्यवांश्चभवत्थे नवांशयो नास्थिवै धुवम ||
अर्थात् तुला लग्न में जन्म लेने वाले जातक प्रायः पराक्रमी, भाग्यशाली एवं धनी होता है | कई इस लग्न वालों से भी उच्चाधिकारी या धनवान जातक से मिला हूँ | इस लग्न वालों के लिए शनि सर्वाधिक धन और योग कारक ग्रह होता है | बुध भी यदि कुण्डली में शुभ हो तो अच्छा धन प्रदान करता है | सूर्य यदि धनदायक ग्रहों के साथ संभव बना रहा है तो धन के सम्बन्ध में शुभ फल प्रदान करता है | इसमें मंगल धन सम्बन्धी फल दायक होता है | यदि बलवान हो तो स्त्री से धन पाता है | लग्न, केन्द्र या त्रिकोण में शुक्र, बुध और शनि आपस में दृष्टि से भी धन योग बनता है | या लग्न में शुक्र, सूर्य एवं बुध होने पर भी धन योग होता है | इस लग्न वालों के लिया सूर्य, शनि और बुध का कोई भी सम्बन्ध मंगल से होने पर वह मंगल धनकारी होता है | यदि सूर्य, शनि तथा बुध मंगल या चन्द्र से युक्त हो तो उत्तम राज योग बनता है | लग्न में शनि तथा दशम में चन्द्रमा होने पर धन योग, अष्टम में गुरु, नवम में शनि, एकादश भाव में मंगल बुध के होने पर उत्तम प्रभाव शाली जातक होते है |लग्न में बुध शुक्र हो तथा धन भाव में गुरु के होने पर भी धन, लग्न में शनि से ही जातक उत्तम जीवन जीते है | दशम में सूर्य चन्द्र मंगल की युति से भी धन योग बनता है, पञ्चम में शनि तथा लाभ भाव में बुध होने से भी धन योग बनता है |
वृश्चिक लग्न वालों के लिए सूर्य चन्द्र गुरु धन देने वाले ग्रह होते है | मंगल शनि अपनी स्थिति के अनुसार ही फल देते है | वृश्चिक लग्न की कुण्डली में बुध गुरु का योग धनी बनाता है लग्न में मंगल हो तथा वह बुध शुक्र या शनि से युल्ट हो | नवम भाव में चन्द्र, गुरु, केतु के होने गुरु की दशा में प्रसिद्धि तथा अधिकार मिलता है | मात्र चन्द्र गुरु होने पर ही धनी बनता है | वह जातक शेयर्स, कपड़ा कारखानों से धन भी कमाता है | पञ्चम भाव में गुरु के होने तथा एकादश भाव में चन्द्र या मंगल के होने पर भी धनी होता है | धन भाव में गुरु बुध के होने पर धनी होता है | इस लग्न वालों के लिए केन्द्र त्रिकोण में सूर्य चन्द्र की युति धनी बनाती है | धन भाव में शुक्र हो तथा अष्टम में बुध हो तो भी धनी बनता है | लाभ भाव में सूर्य एवं बुध की युति धन देती है | तृतीय में शनि नवम में चन्द्र गुरु की युति होने पर धनी बनता है |
धनु लग्न वालों के लिए सूर्य तथा मंगल धन देने वाले ग्रह होते है | सूर्य बुध की युति होने पर बुध भी धन देने वाला ग्रह होता है | गुरु भी अपनी दशा भुक्ति में धन कारक होता है | इस लग्न वालों का शनि धन भाव तथा तृतीय भाव का स्वामी होता है | इस प्रकार इस जातक को छोटे भाई या बहिन से धन मिल सकता है | धन एवं लाभ स्थान में शनि तथा अष्टम भाव में बुध धनी बनाता है | लग्न में चन्द्र,मंगल, गुरु की युति महाधनी बनाती है | सूर्य तथा शुक्र नवम भाव में हो तथा शनि एकादश भाव में होने पर धनी बनाता है | पञ्चम भाव में गुरु तथा एकादश भाव में बुध या शुक्र के होने पर भी धनी होता है यदि यह दोनों ग्रह हों तो धनी होता है | दशम में सूर्य बुध, पञ्चम में सूर्य चन्द्र, एकादश भाव में शुक्र शनि, लग्न में गुरु शनि हो और चतुर्थ भाव में सूर्य के होने से धनी बनता है | कुण्डली में सूर्य गुरु की युति केन्द्र त्रिकोण में होने पर धनी बनाती है | संस्कार और धर्म के पालन से, जैसे यज्ञोपवीत संस्कार, धनु लग्न वालों के भाग्य में वृद्धि होती है।
मकर लग्न की कुण्डली में मंगल शुक्र तथा शनि धन देने वाले ग्रह होते है | इस लग्न वाला व्यक्ति प्रायः अपने ही धन कमाते है या फिर नीच प्रकृति वाले व्यक्तियों से धन पाते है | इस कुण्डली में पञ्चम में शुक्र तथा लाभ भाव में शनि से धन योग बनता है | लग्न में गुरु तथा लाभ में मंगल एवं शुक्र के होने पर गुरु की दशा में भाई से धन पाता है |लग्न में सूर्य बुध चन्द्र हो तथा लाभ में मंगल शुक्र का संयोग बनने से भी धन योग, मंगल शुक्र का संयोग केन्द्र त्रिकोण के स्वामी से होने पर धन योग बनता है | शुक्र शनि का भी संयोग केन्द्र त्रिकोण के स्वामी के साथ होने से भी धन योग बनता है | लग्न में मंगल, गुरु तथा सप्तम में चन्द्र धनवान, शनि मंगल की युति भी, इसमें राहू पञ्चम होने से जुआ शेयेर्स से धन योग या द्वादश भाव में राहू गुरु हो तो भी धन योग बनता है | पञ्चम में शुक्र तथा लाभ में शनि हो तथा गुरु की दृष्टि महाधनी होता है |
कुम्भ लग्न इस लग्न की कुण्डली में शुक्र शनि तथा गुरु धन देने वाले ग्रह होते है | बुध भी धन कारक होता है | गुरु धन तथा लाभ भाव का स्वामी होता है अतः भाई द्वारा लाभ हो सकता है | इसमें सूर्य बुध तथा गुरु तृतीय में या संयोग से भी राजनीतिक शक्ति प्रदान करता है | यदि धन भाव में शुक्र हो तथा अष्टम में बुध हो तो धनवान, सूर्य बुध या मंगल शुक्र की युति भी धनी, दशम भाव में सूर्य, गुरु या शनि गुरु की युति भी धनी, गुरु इस कुण्डली में धन, लाभ या लग्न में होने से धन योग बनता है | मंगल की इससे युति भी लाभ देने वाली होता है | धन भाव में चन्द्र, गुरु हो तथा शुक्र द्वारा दृष्टि से भी जातक सरकार से सम्मान पाता है | पञ्चम भाव में बुध गुरु हो एकादश भाव में चन्द्र मंगल रहने पर भी धनवान, नवम भाव में शुक्र तथा शनि के रहने पर धन योग बनता है | केन्द्र त्रिकोण में गुरु की युति होने पर शीघ्र धन योग बनता है | बुध, गुरु तथा शुक्र का सम्बन्ध यदि बन रहा हो तो धन बनता है | अगर धन भाव में एक साथ हो तो महाधानी योग बनता है |
मीन लग्न इस लग्न वालों को चन्द्र मंगल गुरु तथा बुध धन देने वाले ग्रह होते है | इनकी दशा अन्तर्दशा धन कारक होती है | चन्द्र, मंगल गुरु के लग्न में होने पर धन, चन्द्र मंगल बुध यदि मकर राशि में हो तो भी बहुत धन पाता है | यदि चन्द्र धन भाव में हो तथा मंगल पञ्चम में हो चन्द्र की दशा में धन मिलता है | शनि द्वादश भाव में शुभ फल देता है | मंगल यदि लाभ भाव में हो तो जातक धनी होता है | यदि नवम भाव में मंगल तथा तितीय भाव में शुक्र हो तो धन सम्बन्धी फल देता है | नवम में गुरु मंगल हो तो शीघ्र धनी होता है | पञ्चम में चन्द्र हो तथा लग्न में शुक्र शनि या मंगल के होने पर धनी होता है पञ्चम भाव में चन्द्र गुरु हो तथा एकादश में मंगल होने पर धनी होता है | लग्न में मंगल शनि के होने पर धनी योग बनता है |
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| सही करियर का चुनाव: सूर्य, बुध या शनि—जानिये कौन सा ग्रह आपको सरकारी नौकरी, शेयर बाजार या कला के क्षेत्र में ले जाएगा। |
दशम भावगत राशि फल
आपके कुण्डली में दशम भाव में जो राशि या ग्रह स्थिति हो जातक की वृत्ति पर विशेष प्रभाव डालता है | यह फल जातक के लग्न, जन्म राशि एवं धन भाव में स्थित राशि द्वारा भी कहा जा सकता है | क्योंकि धन भाव में स्थित राशि एवं ग्रहों के अनुसार ही जातक को धन प्राप्ति होती है | यदि दशम भाव में कोई ग्रह स्थित होता है तो हमे यहाँ उस ग्रह के अनुसार तथा दशम भाव में स्थित राशि के अनुसार आजीविका मिलती है |
दशम भाव में मेष राशि होने से जातक फ़ौज, पुलिस, डॉक्टर, फायर, ब्रिगेड, सिक्यो रिटी सर्विस, कारखानों का कार्य, केमिस्ट एवं रसायन, लोहे से सम्बन्धित, मैके निकऔर सहस सम्बंधित कार्य, बेकरी का कार्य, होटल खाने- पीने, दर्जी, दुकान, खेलाड़ी, चुने ईट के भट्टे में कार्य या खेल का सामान से आजीविका होती है |
वृष राशि होने से जातक खेती, नेसरी, कला, संगीत, सिनेमा, ड्रामा, रेवेन्यू एवं कृषि विभाग की नौकरी, ड्रेस डिजाइनर, पेंटर, फर्नीचर, डेकोरेटर, इन्शोरेन्स, ट्रांसपोर्ट, सेल्स - इन्कम टैक्स, खजांची, स्टॉक ब्रोकर, सट्टेबाज, ज्वेलर, सिल्क, शीशे, प्लास्टिक आदि का कार्य साथ में आइसक्रीम, डेयरी दूध-पनीर, चमड़े से सम्बन्धित कार्य करने वाले होते है |
मिथुन राशि वाले अकाउंटेंट, क्लर्क, सेल्समैन, एजेंट, पत्रकार, संपादक, लेखक, अध्यापक, अनुवादक, व्यापारी, स्टेशनरी, यात्रा सम्बन्धी में कार्य,इंजीनियर, सेक्रेटरी, समीक्षक, ट्रेडिंग, कम्पूटर, कोरियर, प्रिंटिंग आदि सम्बंधित कार्य करते है |
कर्क राशि वाले कला, व्यापारी, अस्पताल, पानी सम्बंधित कार्य, मौसम विभाग, खाने पिने सम्बंधित, होटल, सर्विस सेंटर, कीमती पुराने सामान का कार्य, प्लास्टिक का कार्य, सोनार का कार्य आदि कार्य करते है |
सिंह राशि वालों के लिए राज्य एवं उच्च सस्थानों की नौकरी, सेल्स मैनेजर, उच्च पदाधिकारी, ज्वैर्ल्स, सट्टा, शेयर बाजार बैंक का कार्य, वकालत, दवाई, रसायन, ताम्बा एवं सोने की वस्तुए, धन विभाग की नौकरी, फाइनेंस डिपार्टमेंट में कार्य, प्रशासन की कार्य, सिनेमा, सीरियल ड्रामा का निर्देशक का भी कार्य कर सकते है |
कन्या राशि वाले कला, संपादक, पत्रकार, कंप्यूटर का कार्य करने वाले, कैशियर, अकाउन्टेंट, टाईपिस्ट,क्लर्क, ड्राईवर, पोस्टमैन, लाईब्रेरियन, स्टेशनरी, का कार्य, टैक्स डिपार्टमेंट की नौकरी, सेल्समैन, कमीशन का कार्य, व्यापारी, इन्जीरियर, अध्यापन, ऐसा कार्य जहाँ बुद्धि की आवश्यकता हो |
तुला राशि वाले कोर्ट कचहरी, सिनेमा, मनोरजन, क्षेत्र में कार्य, मॉडलिंग, फोटो ग्राफी, टेक्सटाइल का कार्य, एडवाईजर, इन्टीरियर,डेकोरेशन, पब्लिक रिलेशन व राजदूत, व्यापारी, फर्नीचर का कार्य, ब्यूटीपार्लर, जज, कम्पनी, सैक्रेटरी, लॉ आफ़ीसर, समाज सेवा, फ़ास्ट फ़ूड रेस्टोरेंट्स आदि क्ष्रेत्र में सफलता |
वृश्चिक राशि वाले ज्योतिष, तांत्रिक, जासूस, नर्स, केमिस्ट, डॉक्टर, मैकेनिक, पुलिस, फ़ौज, इन्श्योरेन्स, खदान, भूसर्वेक्ष्ण, रिसर्च, लेबर डिपार्टमेंट, लोहे से सम्बन्धित, खाने पीने सम्बन्धित कार्य आदि |
धनु राशि वाले अध्यापक, जज, वकील, कोर्ट कचहरी, दार्शनिक, धर्मप्रचारक, प्रबंधक, जुआरी, चमड़ा जूता, होलसेल, प्रकाशन, संपादकका कार्य, सैल्समैन, बैंक फाइ नेंस, कम्पनी की नौकरी, सैक्रेटरी और विज्ञापन आदि क्षेत्र में कार्य करने वाले होते है |
मकर राशि वाले राजनीति, भूमि से सम्बन्धित कार्य, लकड़ी से सम्बन्धित, म्युनिसिपाल्टी, होलसेल, खान पान, खनिज पदार्थ, बड़े उद्योग और कित्य द्वारा भी आजीविका चलाते है |
कुम्भ राशि वाले नई खोज, एडवाइजर्स कानून एवं सामाजिक क्षेत्र से सम्बन्ध, इलेक्ट्रीसिटी,परमाणु शक्ति, कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी, औटोमोबाईल, एरोनोटिक, इंजीरियरिंग, ज्योतिष, वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं एक्सरे का कार्य और अस्पताल आदि से अक़जिविका चलाते है |
मीन राशि वाले जातक प्रबंधक, डॉक्टर, बैंक, पानी से सम्बन्धित, आयात निर्यात, साधू, सन्यासी, ज्योतिषी, शिपिंग या क्लीयरिंग एजेंट, कस्टम विभाग में कार्य, कोर्ट, ट्रावेल एजेंट, अध्यापन, जेल से सम्बंधित कार्य, नर्स, आदि क्षेत्र में सफलता मिलता है |
ग्रहों का प्रभाव
सूर्य सात्त्विक ग्रह अग्नि रुप और सर्वश्रेष्ठ राजा है | सूर्य का राज्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है | यदि सूर्य का लग्न, लग्नेश, कर्म, कर्मेश या राशि भाव आदि से अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक सम्बन्ध, युति या दृष्टि द्वारा सूर्य इन लग्नादि पर प्रभाव डाल रहा हो तो सूर्य धंधे की दिशा को जतलाता है | सूर्य अग्निरुप, वैद्य का द्योत्तक भी माना जाता है | वैसे वैद्य का द्योत्तक ग्रह शनि और राहु | यदि सूर्य बहुत बलवान् हो तो राज्याशासन द्वारा धन दे देता है | मध्यम बली हो तो बड़ा राज्याधिकारी बना देता है और यदि साधारण रुप से बलवान् हो तो जातक को साधारण राज्य कर्मचारी बना देता है | यदि द्वीतियेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, एकादशेश हो कर बलवान् हो तो जातक को दूसरों पर शासन करने वाला राजा, गवर्नर, मंत्री, प्रेसिडेन्ट, नवाब आदि उच्च पद वाला शासक बना देता है | सूर्य जब गुरु, नवमेश चतुर्थ भाव आदि धार्मिक ग्रहों को साथ लेकर धंधा- द्योत्तक ग्रहों पर प्रभाव करता है | तो जातक धर्म से धन कमाता है अर्थात् किसी मन्दिर के पुजारी के रुप में, किसी मठ के अधिश के रुप में, किसी संस्था के पुरोहित के रुप में उसको धन, वेत्तन दान की प्राप्ति होती है | शिव उपासना और शिवलिंग (Shivling) पूजन से सूर्य जनित दोष कम होते हैं।
चन्द्र ग्रहों में जलीय है शुक्र भी जलीय है | चतुर्थेश, अष्टमेश और द्वादशेश भी जलीय प्रभाव रखते है | चन्द्र शुक्र स्त्री ग्रह है | जब यह ग्रह दुसरे स्त्री ग्रहों शुक्र बुध शनि आदि को लेकर धंधे जातक को स्त्रियों के साथ मिलकर धंधा करने का अवसर प्राप्त होता है | चन्द्र और शुक्र संयोग से जलीय धंधा द्योत्तक ग्रह पर जलीय कार्यों द्वारा धनोपार्जन करता है | शुक्र स्त्री ग्रह है तो स्त्री अभिनेता अभिनेत्री फिल्म जगत में जा सकते है | चन्द्र रानी है अतः राज्य से भी इसका सम्बन्ध है अतः जब यह ग्रह राज्य द्योत्तक सूर्य, गुरु आदि ग्रहों के साथ मिलकर (जैसे Brihat Parashara Hora Shastra में वर्णित है) धन्धे का द्योत्तक होता है | तो राज्य सम्बन्धी कार्य जैसा शासन कार्य, राज्य अधिकारी कार्य, राज्य कर्मचारी कार्य करवाता है |
चन्द्र जब राहू से सम्बन्ध बनाता हो तो जातक शराब बेचने का कार्य करता है क्योंकि शराब विष जलीय पदार्थ का ही रुपांतर मात्र है और राहू विष तथा मलिनता का द्योत्तक है | चन्द्र मन का कारक है | ये सुगन्धित ग्रह है | यानीं चन्द्र इस तरह के कई धन्धे करवाते है |
मंगल भूमिपुत्र है अर्थात् इस ग्रह प्रधान जातक का भूमि, मकान आदि से घनिष्ठ सम्बन्ध है | मंगल पुरुषार्थ प्रिय,क्रिया प्रिय कर्मठ ग्रह है | इससे जातक में प्रबंध की योग्यता आ जाती है और वह दूसरों से कार्य लेने में समर्थ रहता है | मंगल हेतु प्रिय लॉजिकल ग्रह है यह जातक में बुद्धि को तथा उहापोह शक्ति को बढ़ता है अतः जब यह ग्रह बुद्धि स्थान का स्वामी होकर बलवान् तथा धन्धे का द्योत्तक होता है तो जातक को शासक तथा मंत्री बना देता है | मंगल की पञ्चम भाव में या पर दृष्टि से जातक को तीव्र बुद्धि वाला बनाती है |
मंगल अग्निमय ग्रह है जो धन्धे का स्वयं अथवा केतु सूर्य आदि अग्निद्योत्तक ग्रहों को साथ लेकर धन्धे का द्योत्तक होता है तो अग्नि सबन्धित भठी, बिजली, खाद्य फैक्ट्री कार्यो द्वारा धनोपार्जन करवाता है | मंगल साहस तथा हिंसा प्रिय है | अतः मिलिटरी अथवा रक्षा विभाग से इस का धनिष्ट सम्बन्ध है | जब यह धन्धे का द्योत्तक होता है तो जातक रक्षा विभाग में औफिसर अथवा कर्मचारी अथवा उस विभाग से सम्बंधित कार्य करने वाला होता है | मंगल एक क्षत्रिय ग्रह है सूर्य भी क्षत्रिय ग्रह है | जब सूर्य से प्रभावित मंगल धन्धे होता है तो जातक को राज्य के रक्षा से सम्बंधित कार्य करने वाला होता है | मंगल को चोरी की भी आदत है | जब यह ग्रह चोर स्थान का स्वामी हो अथवा षष्ठ से षष्ठ एकादश भा का स्वामी हो तो इस में चोरी भाव होता है | यदि ऐसा मंगल पापी हो तो बड़े अधिकारी, व्यापारी भी चोरी आदि धन्धे से धन प्राप्त करता है | मंगल यदि चन्द्र तथा शुक्र से प्रभावित होता हुआ चतुर्थेश होता हुआ धन्धे का द्योत्तक हो तो जातक घर,लाउंज द्वारा धन कमाता है | चन्द्र जनता है, शुक्र इकट्ठा करता है तथा मंगल भूमि से तथा जायदाद से लाभ का प्रतीक है |
बुध बुद्धि का ग्रह है यदि यह ग्रह द्वितीय, पञ्चम नवम आदि बुद्धि स्थानों का स्वामी होता हुआ धन्धे का द्योत्तक हो अर्थात् लग्न लग्नेश,चन्द्र राशि स्वामी, सूर्य सूर्येश को अधिकत्तम प्रभावित करता हो तो जातक बुद्धिजीवी होता है अर्थात स्कुल, कॉलेज, मॉस्टर प्रोफ़ेसर, प्रवचन आदि के द्वारा धनोपार्जन करता है | बुध वाणी भाषण का कारक ग्रह है और शरीर में नाड़ी तंत्र (Nervous System) को भी नियंत्रित करता है | अतः यदि यह ग्रह द्वितीयेश, पंचमेश होता हुआ गुरु के साथ धन्धे का द्योत्तक हो तो जातक व्यापारी होता है | बुध के बलवान् होने की दशा में वह कपड़े का व्यापार करता है क्योंकि बुध का कपड़े से घनिष्ठ सम्बन्ध है | बुध लेखक है जब वह धन्धे का द्योत्तक है और राज्य द्योत्तक ग्रहों सूर्य आदि से भी प्रभावित होता है तो जातक राज्य के किसी विभाग में लिखने का लारी करने वाला यथा क्लर्क अथवा, स्टेनों का कार्य करता है | यदि बहुत बलवान् हो तो लेखा औफ़िसर बना देता है |
बुध मंगल के साथ बली हो और धन्धे का द्योत्तक हो तो Mathematics Lecturer बना देता है | बुध यदि तृतीयाधिपति हो और बलवान होकर धन्धे का द्योत्तक हो अर्थात् लग्न लग्नेश आदि लग्नों पर अपना प्रभाव अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक डाल रहा हो तो जातक अपने लेखों द्वारा आजीविका का उपार्जन करता है, जैसे साहित्य (Literature) और लेखन में रूचि | क्योंकि बुध लेखक है और तृतीय स्थान भी हाथ होने से लिखने ही को दर्शाता है | बुध विनोद प्रिय होते है जब वह चतुर्थ पञ्चम में या स्वामी तथा शुक्र से सम्बन्ध करता है तो धन्धे का द्योत्तक होता है हास्य कलाकार के रुप में प्रस्तुत होते है | बुध गुमाश्ता एजेंट के रुप में भी है यदि यह चतुर्थेश से सम्बन्ध रखता हो और मंगल से भी प्रभावित हो तो जायदाद Property का एजेन्ट होता है |
गुरु ज्ञान का कारक ग्रह है | गुरु को कानून लॉ से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है | अतः यदि अष्टमेश एकादशेश या शुभ बुध शुक्र को साथ लेकर धन्धे का द्योत्तक हो अर्थात लग्न लग्नेश आदि लग्नों पर अपना प्रभाव डालता हो तो जातक को वकील, एडवोकेट या जज या उच्च कोटि के सलाहकार के रुप में अपना जीवन व्यतीत करते है | द्वितीय पञ्चम का स्वामी होता हुआ अगर बुध गुरु में उत्तम संयोग से अच्छा भाषण लिखने वाला या बोलने वाले होते है | ऐसे जातक वकील या अध्यापक भी होते है | यदि गुरु नवमेश, द्वादशेश या पंचमेश से सम्बन्ध होने से जातक धर्म क्षेत्र से धनोपार्जन करता है | Vedic Astrology में गुरु को जीव कारक भी माना गया है।
गुरु धन का भी कारक होता है जब द्वितीयेश या एकादशेश से सम्बन्ध हो तो सूद व्याज, किराया से बैंक की नौकरी से धनोपार्जन करता है | गुरु बलवान होकर एकादश बड़े भाई से या राज्य कृपा से राज्य की प्राप्ति होती है और उससे धन मिलता है अथवा किसी महान् राज्याधिकार द्वारा आजीविका प्राप्त होती है |
शुक्र भी कानून से सम्बन्ध रखता है क्योंकि शुक्र गुरु के साथ मिलकर यह ग्रह लग्न,लग्नेश आदि लग्नों पर अपेक्षाकृत अधिकतम प्रभाव डालता है तो व्यक्ति को को कानून से सम्बन्धित काम धंधों में लगता है | शुक्र स्त्री ग्रह है जब यह ग्रह चन्द्र, बुध, शनि आदि स्त्रियों के संपर्क से फिल्म, नाटक अभिनय करके धनोपार्जन करता है | शुक्र जलीय ग्रह भी है चन्द्र के साथ संयोग होने पर तरल द्रव्य, जल से सम्बंधित आदि धनोपार्जन करता है |
शुक एक सौन्दर्य प्रिय ग्रह है सुन्दरता तथा भोगविलास से सम्बन्ध रखने वाले जितने धन्धे है सब का सम्बन्ध शुक्र से है | शुक्र संगीत भाषण तथा वाद्ययंत्र बुध से सम्बन्ध करता हुआ शुक्र धन्धे का द्योत्तक हो तो गाने बजाने सम्बन्धित वस्तु या कार्यक्रम से धनो पार्जन कराता है, जैसे कि मैथिली कविता (Maithili Poetry) और कला | शुक्र वाहन का भी कारक है | यदि शुक्र और चतुर्थ भाव से शुभ सम्बन्ध होने से वाहन के माध्यम ड्राइवर, pilot, कैब या कोई अन्य साधन से धनार्जन कराता है | शुक्र चन्द्र और शनि संयोग से कविता करने की शक्ति उत्पन्न करता है ऐसे शुक्र यदि धन्धे का द्योत्तक हो तो जातक को कविताओं आदि से धन की प्राप्ति होती है (English Literature जैसे क्षेत्रों में भी) | शुभ शुक्र जब सप्तमाधिपति या लग्नाधिपति अथवा गुरु से प्रभावित होता हुआ धन्धे का द्योत्तक हो तो सर्राफ ज्वैर्स होता है | तृतीयेश शुक्र चन्द्र से प्रभावित होता हुआ यदि धन्धे का द्योत्तक हो तो व्यापार करने वाला होता है शुक्र से फल, चन्द्र से खाद्य पदार्थ से धनोपार्जन कराता है |
शनि पत्थर माना गया है | यदि इस ग्रह का चतुर्थ चतुर्थेश या सप्तम सप्तमेश से घनिष्ठ सम्बन्ध हो तो यह ग्रह पत्थर का प्रतिनिधि हो जाता है | यदि ऐसे शनि का प्रभाव लग्न लग्नेश आदि लग्नों पर हो तो जातक सड़क आदि बनवाने तथा पत्थर सप्लाई करने वाला होता है | दशमेश शनि भी पत्थर का द्योत्तक है, क्योंकि दशम उच्च स्थान यानि पहाड़ है यदि दशमेश शनि धन्धे का द्योत्तक हो तो भी पत्थर, सीमेंट आदि का काम करने वाला होता है |
शनि का भूमि से विशेष सम्बन्ध है, बल्कि इस का शनि कारक है अतः शनि चतुर्थेश अथवा योगकारक होता हुआ बलवान हो और धन्धे का द्योत्तक हो तो जातक की बहुत भूमि की प्राप्ति होती है | शनि अधोमुखी ग्रह है अतः पृथ्वी केभीतर रहने वाले पदार्थों लोहा, कोयला, भूमि, तेल का कारक है जब शनि चतुर्थेश होकर धन्धे का परिचायक होता है तो इन पदार्थों से धन का लाभ देता है | शनि भूमि कृषि से सम्बंधित से भी लाभ मिलता है | शनि चमरा से घनिष्ठ रखता है अतः चमड़े से सम्बन्धित धन्धे से लाभ प्राप्त करता है | शनि से डॉक्टर वैद्य होते है | अतः जब यह ग्रह सूर्य राहू आदि ग्रहों के प्रभाव से इसका धन्धे अस्पताल किल्निक करते है | अधिक जानकारी के लिए Dr. B.V. Raman's articles देखें।
यस्मिन् राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत् सः खेटः क्षोणिपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेत्त् किं पुनः पार्थिवेन्द्रः | अर्थात् ग्रह जिस राशि में स्थित हो यदि उसी राशि के स्वामी से दृष्ट हो तो जातक धन यशस्वी होता है और यदि उस राशि का स्थान जिसमें कि ग्रह केन्द्र त्रिकोण में स्थित हो तो फिर बात ही कुछ और होता है | अर्थात् स्वामी दृष्टि से भाव सर्वदा वृद्धि होती ही है | योः योः स्वामियुक्तो दृष्टो वा तस्य तस्यास्ति वृद्धिः | यह एक मौलिक तथा बहुत मूल्यवान सिद्धान्त है |
जातकों के कुण्डली में धन भाव में मेष राशि हो तो कई प्रकार के धन से परिपूर्ण, कुटुम्ब युक्त, चतुष्पदों से युक्त, भाग्यशाली तथा कई विद्याओं का जानने वाला होता है | द्वितीय धन भाव में वृष राशि हो तो जातक कृषि, विद्या, राजनीति आदि से सर्व सुख भोगने वाला होता है | आपके कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश के सम्बन्ध होने पर स्त्री द्वारा धन प्राप्ति होता है द्वितीय स्थान में सप्तमेश के होने तथा शुक्र की इस पर युति या दृष्टि होने पर भी स्त्री द्वारा धन लाभ होता है | सप्तमेश तथा शुक्र के चतुर्थ भाव में होने पर भी स्त्री द्वारा लाभ कहा गया है | गोचर में पञ्चम भाव स्थित चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि अचानक धन लाभ है | द्वितीयेश पंचमेश का राशि परिवर्तन भी अचानक धन दिलवाता है | द्वितीयेश लग्नेश तथा लाभेश एक दुसरे के भावों में होने पर भी अचानक धन प्राप्ति होती है | लग्नेश धन भाव में हो धनेश लाभ में हो तथा लाभेश लग्न में होने पर गड़े हुए या लॉटरी धन की प्राप्ति होती है | धनेश अष्टम भाव में होने पर भी अचानक धन की प्राप्ति होती है | अचानक धन प्राप्ति में नवम,पञ्चम तथा राहू की भी विशेष भूमिका पाई जाति है | यदि एकादशेश चतुर्थ में हो तथा शुभ युक्त या दृष्टि हो तो भी गड़ा हुआ धन योग बनता है |
प्रवर महर्षि पाराशर ने केन्द्र त्रिकोण के संयोग को ही विष्णु लक्ष्मी योग को धन राजयोग मानते है | इस योग अथवा सम्बन्ध के फलस्वरूप उच्च पदवी,मान, यश तथा विशेष धन की प्राप्ति होती है | ये विशेषतया अपनी दशान्तार्द्शा में निश्चित रुप से धन, पदवी तथा मान में वृद्धि करने वाला होता है | निष्कर्ष यह है कि शुभ भावाधिपति हो और बलवान् हो तो अवश्य धनदायक होता है ➖तत्रैकोऽपि सुहृद्गृहेक्षितयुतः स्वोच्चोऽर्थ युक्तं नृपम् |
निष्कर्ष (Conclusion)
अंततः ज्योतिष शास्त्र यह स्पष्ट करता है कि धन और व्यवसाय केवल भाग्य का खेल नहीं है, बल्कि ग्रहों की स्थिति और हमारे कर्मों का परिणाम है। आपकी कुंडली में विद्यमान 'धन योग' और 'राजयोग' तभी फलीभूत होते हैं जब आप सही दिशा में प्रयास करते हैं।
चाहे आप पराशर ज्योतिष के सिद्धांतों का पालन करें या आधुनिक वित्तीय प्रबंधन का, ग्रहों का सही विश्लेषण आपको करियर की ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है। अपनी कुंडली का गहन विश्लेषण करवाकर आप अपने लिए अनुकूल व्यवसाय और धन संचय के मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कुंडली में आजीविका (Career) के लिए कौन सा भाव देखा जाता है?
ज्योतिष शास्त्र में आजीविका और कर्म के लिए मुख्य रूप से दशम भाव (10th House) का विश्लेषण किया जाता है। इसके साथ ही आय के लिए एकादश भाव (11th House) और धन संचय के लिए द्वितीय भाव (2nd House) का विचार आवश्यक है।
2. कौन से ग्रह धन प्राप्ति में सहायक होते हैं?
बृहस्पति (Guru) और शुक्र (Venus) प्राकृतिक रूप से धनकारक ग्रह माने जाते हैं। हालांकि, कुंडली के लग्नानुसार धनेश और लाभेश की स्थिति यह तय करती है कि धन कब और कितना प्राप्त होगा।
3. क्या कुंडली से सरकारी नौकरी का विचार किया जा सकता है?
जी हाँ, सूर्य और मंगल का दशम भाव से संबंध, या अमात्यकारक का बलि होना सरकारी नौकरी और उच्च पद प्राप्ति का संकेत देता है।
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